निर्भया के बहाने बीबीसी का बिजनेस एंजेडा ………?

5:25 pm or March 26, 2015
nirbhaya ban

—डाॅ अजय खेमरिया—

बीबीसी द्वारा निर्भया कांड पर बनायी गयी फिल्म के अमेरिका और दुनिया भर में प्रसारण के बाद विदेशी मीडिया में भारत की छवि कुछ इस तरह से स्थापित करने की कोशिश हो रही है मानो भारत में महिलाएं खतरनाक हद तक असुरक्षित है और नई दिल्ली देश की राजधानी ने होकर बालतकारधानी है। जरा व्हाइट हाउस की पावरफुल लेडी नैन्सी पावेल के कथन सुनिए “ रेप के डर से भारत नही आना चाहती है अमेरिकी लडकियां ” दुनिया भर में घूमने वाली नैन्सी पावेल को यह ज्ञान बीबीसी की निर्भया पर आधारित फिल्म को देखने के बाद ही हुआ है ? वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयार्क टाईम, डीलीमेल जैसे विदेशी अखबारों में भारत सरकार के इस निर्णय की कडी आलोचना की गयी जिसमें इस फिल्म के भारत में किसी भी तरह के प्रदर्शन पर रोक लगायी गयी थी। क्या बाकई भारत में महिलायें इतनी असुरक्षित है कि दुनिया के लोग यहां आने पर विचार करें ? पश्चिमी मीडिया का प्रलाप सुनें और पढे तो इससे तो यही प्रतीत होता है।

इस पूरे मामले पर असल में पश्चिमी देशो का भारत के प्रति दुराग्रह और जलन साफ समझी जा सकती है। पिछले 25 वर्षो में भारत ने जिस तेज रफ्तार से आर्थिक मामलों में प्रगति की है वह दुनिया के दरोगा टाईप देशों को फूटी आंख नही सुहाता है. जिस निर्भया कांड को वैश्विक स्तर पर भारत के विरूद्व दुष्प्रचार का उपकरण बनाया जा रहा है उसके आइने में हम अमेरिका और इग्लैंड के महिला सुरक्षा से जुडे आंकडों को संभालने का प्रयास करते है। भारत में निर्भया बलात्कार कांड के सभी आरेापी 48 घंटे में पकड लिए गये और रिकार्ड 10 माह में सजा सुना दी गयी। नेशनल ब्यूरो आॅफ क्राइम की बेवसाइट से स्पष्ट है कि भारत में महिला हिंसा, यौन उत्पीडन, और बलात्कार के मामलों में न्यायालय से दोष सिद्वी का प्रतिशत 31 फीसदी है। बलात्कार के मामलों में फांसी तक की सजा भारत में न्यायाधिशो ने स्वविवेक से रेपेरेस्ट मानकर दी है. पश्चिम बंगाल के धनंजय का मामला सभी के स्मरण में है। के.पी.एस. गिल जैसे ताकतवर पुलिस अफसरों को यहां सजा होती रही है। लेकिन बीबीसी को कभी अपने घर इग्लैंड की निर्भया नजर नही आती जहां पूरे देश में हर साल 95 हजार महिलाओं से रेप होता है और सिर्फ 1070 मामलों में आरोपियों को सजा होती है। यानि भारत में जहां दर्ज मामलो में से 31 फीसदी में सजा होती है वहीं इग्लैंड में यह आंकडा सिर्फ 1 फीसदी ही है। इग्लैंड सरकार के आंकडे अधिकृत बेबसाइट पर देखे जा सकते है. इसके अलावा इग्लैंड में 70 से 90 फीसदी महिलायें यौन उत्पीडन, यौन हमलो, की शिकायतें रजिस्टर नही कराती है. सरकारी आंकडो पर ही बात करें तो इग्लैंड में हर छः मिनिट में एक बलात्कार हो रहा है हर पांचवी महिला इन हमलों की शिकार रहती है. 2013 में वहां 85 हजार बलात्कार के मामले दर्ज हुये तो 2014 में यह आंकडा 95000 रहा। भारत आकर निर्भया के नाम पर डाक्यूमेंटरी बनाने वाली बीबीसी से यह नही पूछा जाना चाहिए कि क्या उनके खुद के देश में जब हर पांचवी महिला निर्भया बनने पर विवश है तब इस तरह की फिल्म बनाने और दिखाने की आवश्यकता क्यों महसूस नही की गयी ? सच तो यह है जिस बीबीसी ने यह फिल्म बनाकर भारत को बदनाम करने की साजिश की है उसका खुद का दामन इतना दागदार है जिस पर कई ग्रन्थ लिखे जा सकते है. बीबीसी के एक जिम्मेदार अधिकारी 30 साल तक वहां काम करने वाली महिला कर्मियों का यौन शोषण करता रहा और बाद में विशेषाधिकार के नाम पर छोड दिया गया क्या ऐसे दागदार समाचार संगठन को भारत के संदर्भ में यह दुष्प्रचार शोभ देता है। अब यदि नैनसी पावेल बात करें जो इस डाक्यूमेंटरी को देखने के बाद अमेरिकी महिलाओं को एडवायजरी जारी कर एहतिहात बरतने की सलह दे रही है यदि वे भारत जा रही हो तो।

अमेरिकी सरकार के आंकडे बताते है कि वहां हर 25 सेकेण्ड में एक महिला पर यौन हमला होता है. अपने जिस महिला आर्मि कमीशन पर अमेरिका गर्व करता है वहां 30 से 40 प्रतिशत महिलायें यौन शोषण का शिकार होती है।

दुनिया भर के अखबारो में गत वर्ष आम्र्स फोर्स में महिलाओं के यौन शोषण का मामला छाया रहा था कभी बीबीसी ने किसी महिला सैन्य अफसर पर इस तरह की स्टोरी की हो किसी को याद नही ? अमरिका में हर साल 10 लाख महिलायें छेडखानी, यौन हमला, बलात्कार का शिकार होती है. वहां हर 22 मिनिट में एक महिला बलात्कार का शिकार होती है। भारत पर अंगुली उठाने वाली नैन्सी पावेल को शायद नही पता क उनके देश में बलात्कार के मामले में आॅसतन 702 दिन लगते है कोर्ट का फैसला आने में जबकि भारत में पिछले चार वर्षो में अवधि 10 से 12 महीने आॅसतन रह गई है। यही नही अमेरिका और इग्लैंड में जो रेप केस रजिस्टर होते है उनके 14 प्रतिशत तो आरोपी अज्ञात होते है यानि वहां की पुलिस 100 में से 14 आरोपियो को पकड ही नही पाती है। हम समझ सकते है अमेरिका इग्लैंड जैसे देश भारत के विरूद्व यह दुष्प्रचार क्यों फैलाना चाहते है। असल में भारत आज मजबूत नेतृत्व के साथ दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनने की सशक्त स्थिति में है. भारत की छवि कभी सपेरे और जादूगरों के देश की थी. सदियों तक पश्चिमी जगत में जादू टोना वालों के रूप में हमारी छवि बनाने वाले इस वर्ग को कैसे स्वीकार हो सकता है कि भारत की सैकडो विजनेस कंपनियों का टर्न ओवर मिलियन डाॅलरो में है। सपेरों के देश में नाम मात्र के खर्चे पर उपग्रह, बनाये जाने लगे है जहां का युवा अमेरिका की आई टी पावर की धुरी बन गया है। भारत की आर्थिक, वैज्ञानिक, सामजिक सामरिक चुनौती से पश्चिम की व्यापारिक कंपनियां भयभीत है। जी बिजनेज की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीबीसी की निर्भया पर डाक्यूमेंटरी का प्रसारण भारत के पर्यटन व्यापार को सीधे नुकसान पहुचाने का रहा है. ऐसोचेम के अध्ययन के अनुसार भारत में पर्यटन से मौजूदा राजस्व 1 लाख करोड वार्षिक है. भारत का मेडीकल टूरिज्म 15 हजार करोड वर्षिक है क्योकि पूरी दुनिया में सबसे सस्ती स्वाथ्य सुविधायें वर्तमान में सबसे भारत में ही है. इसी अध्ययन का अनुमान है कि 2016 में मेडीकल टूरिज्म से भारत का राजस्व डेढ गुना बढ सकता है. दुनिया के देशा मंे भारत टूरिज्म से कमाई करने वाले एशियाई देशो में 7 वे स्थान पर है। एसोचेम ही बताता है कि निर्भया कांड के बाद विदेशी पर्यटकों की संख्या में 20 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी है. पर्यटन में दृष्टी से भारत इंटरनेशनल टूरिस्ट एरावइल के मामले में 41 फीसदी पसंद है। खास बात यह है कि विदेशो से आने वाले पर्यटकों में सर्वाधिक संख्या अमेरिका और इग्लैंड की होती है। जाहिर है निर्भया डाक्यूमेंटरी का निर्माण और प्रसारण इस आर्थिकी से भी जुडा है। यदि बीबीसी की इस फिल्म को देखकर भारत से 10 फीसदी पर्यटक ही कम हुये तो राजस्व का आंकडा 10 हजार करोड पहुंचती है। हजारो करोडो की इस आर्थिकी के गणित का सहसंबंध पश्चिमी मीडिया से आसानी से समझा जा सकता है. लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारी मीडिया इस पश्चिमी षडयंत्र को बेनकाव करने की जगह देश की छवि बिगाड अभियान में कहीं न कहीं शामिल नजर आया। अकेली वरिष्ट टी.व्ही पत्रकार नलिनी सिंह ने इस षडयंत्र को बेनकाव करते हुये जरूर इस डाक्यूमेंट्री पर सवाल उठायें और बताया कि डाॅक्यूमेंट्री के समापन पर सिर्फ भारत से जुडे यौन हमले, अपराधो के आंकडे दिखाये गये और जान बूझकर अन्य देशो के अपराध आंकडे हटा दिए गए। लेकिन किसी टी.व्ही चैनल या राष्ट्रीय मीडिया ने नलिनी सिंह की बात का समर्थन नही किया। इस पूरे प्रहसन में हमारी एक व्यवस्थागत कमी सूचना प्रसारण में उजागर हुयी है। नयी सरकार को इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्यूं 60 साल बाद भी हमारा सरकारी प्रसारण दूरदर्शन सिर्फ सरकार का भोंपू बनकर रह गया है. वैश्विक स्तर पर बीबीसी की तर्ज पर हमारा दूरदर्शन प्रसारण और स्वीकार्यता स्थापित करने में नाकाम रहा है सरकारी खर्च पर चलता दूरदर्शन कब हमारी छवि बनाने के काम में सक्षम होगा यह भी विचारणीय प्रश्न है ?

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