जनता का धन और सरकारों का विवेक

2:23 pm or March 27, 2015
Madhya Pradesh CM Shiraj Singh Chauhan

—सुनील अमर—

निर्वाचित और लोकप्रिय कही जाने वाली सरकारों द्वारा बहुत सी ऐसी योजनाऐं चलायी जाती या खर्चे किए जाते हैं जिनके औचित्य पर शंका और सवाल उठते रहते हैं। कई बार ये खर्चे इस हद तक मनमाने होते हैं कि उन पर न्यायालयों को भी ऊॅंगली उठानी पड़ती है। केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों तक ऐसी योजनाओं और खर्चाें के उदाहरण भरे पड़े हैं। ताजा मामला मध्यप्रदेश का है जहाॅं मुख्यमन्त्री ने गत सप्ताह प्रदेश के 1000 पत्रकारों को लैपटाॅप खरीदने के लिए 40,000 रुपए की दर से चेक प्रदान किया है। इससे पहले भी देश के तमाम राज्यों में लोगों को प्रभावित करने के लिए इस तरह से जनता के धन को लुटाया गया है। तमिलनाडु तो इस मामले में खासा कुख्यात रहा है। सरकारों द्वारा जब भी इस तरह के मनमानीपूर्ण कृत्य किए जाते हैं तो यह सवाल उठता है कि सत्ता में आने के बाद क्या किसी राजनीतिक दल को यह अधिकार मिल जाता है कि वह जनता के धन का बन्दरबाॅंट कर सके? सत्तारुढ़ दल का यह तर्क होता है कि योजना कैबिनेट से मन्जूर है और कैबिनेट को जनता ने चुना हुआ है लेकिन सवाल धन के सदुपयोग का होता है।

वर्ष 2007 में उत्तर प्रदेश की सत्ता में आई बहुजन समाज पार्टी की सरकार ने जनता की जरुरत की तमाम योजनाओं के धन में कटौती कर अपनी तथाकथित विचारधारा के पोषण में पार्कों, मूर्तियों और ऐसे ही अन्य कामों पर अन्धाधुन्ध अरबों रुपया खर्च करना शुरु किया। नौबत यहाॅं तक आ पहुॅंची कि माननीय उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेकर सरकार से ऐसे खर्चों का औचित्य पूछा। मायावती सरकार का जवाब था कि ये खर्चे कैबिनेट से मन्जूर किए गए हैं, इसलिए वैध हैं। इस पर माननीय न्यायालय का कहना था कि सरकार इस तरह से जनता के धन का मनमाना उपयोग करेगी तो हम क्या चुपचाप देखते रहेेंगें। लेकिन जैसा कि लोकतन्त्र में सबसे बड़ी अदालत जनता होती है, अगले चुनाव में जनता ने मायावती की बसपा को हराकर बता दिया कि कैबिनेट का ऐसा मनमानापन उसे पसन्द नहीं।

सरकारें, दो तरह के कार्य करती हैं। एक तो जनता के लिए और दूसरा, अपनी राजनीतिक पार्टी का आधार मजबूत करने के लिए। एक निर्वाचित सरकार जब ‘सर्वजन हिताय’ की कोई योजना चलाती हैं तो वह राज्य के हित में होती है लेकिन जब वह समाज के किसी खास वर्ग के हितपोषण में धन खर्च करती है तो प्रकारान्तर से वह अपना निजी हित साध रही होती है। दशकों पहले उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमन्त्री मुलायम सिंह यादव ने विवेकाधीन कोष से अपने चहेते लोगों को अन्धाधुन्ध धन बाॅंट कर एक विवाद खड़ा कर दिया था। उन्होंने बिना किसी ‘क्राइटेरिया’ के धन बांॅटा और अपने चहेते पत्रकारों को लाखों रुपये देकर उपकृत किया था और तब मजाक में कहा जाने लगा था कि उत्तर प्रदेश में दो तरह के पत्रकार हैं- एक विवेकाधीन (विवेकाधीनकोष से धन लेने वाले) और दूसरे, विवेकहीन। कहने की जरुरत नहीं कि इस तरह के विवेकाधीन कोषों से धन लेने वाले पत्रकारों-साहित्यकारों को अपना विवेक सरकारों के पास गिरवी रखना पड़ता है। सरकारों की खुली मन्शा भी यही होती है।

देश की तमाम राज्य सरकारें टीवी सेट, साड़ी, बिन्दी, टैबलेट-लैपटाॅप, कम्बल, सायकिल और जाने क्या-क्या बाॅंटती रहती हैं लेकिन ऐसा नहीं होता कि यह प्रत्येक जरुरतमन्द को मिल जाय। सरकारों का एक आॅंकलन होता है कि इतने प्रतिशत लोगों को अगर मिल जाएगा तो हमारी पार्टी को वोटों का लाभ होगा। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है- उत्तर प्रदेश में सत्तारुढ़ समाजवादी पार्टी की सरकार ने हाई स्कूल उत्तीर्ण करने वाले छात्रों को टैबलेट और इण्टरमीडिएट के छात्रों को लैपटाॅप देने का चुनावी वादा किया था। यह अन्देशा तभी था कि इतनी विशाल संख्या में उत्तीर्ण छात्रों को टैबलेट और लैपटाॅप देने का मतलब यह होगा कि प्रदेश की अन्य तमाम कल्याणकारी योजनाओं को या तो ठप कर देना या इस योजना को आधा-अधूरा छोड़ देना। दोनों प्रकार की आशंकाऐं सच साबित हुईं। सरकार ने थोड़ा बहुत लैपटाॅप बाॅंटकर घोषित कर दिया कि अब यह योजना बन्द की जा रही है। टैबलेट बाॅटने की योजना तो शुरु ही नहीं हो सकी है। लैपटाॅप ने भी अधिकांश छात्रों को फायदे के बजाय नुकसान ही पहॅंुचाया है क्योंकि वे इसके इस्तेमाल की विधि तो जानते नहीं थे और न उनके पास इन्टरनेट के संसाधन थे। ऐसे में ये लैपटाॅप महज सिनेमा देखने की मशीन बनकर रह गए। सरकार की मंशा भी महज नौजवानों को खुश करने की थी। एक बार वोट पा जाने के बाद ऐसी कई योजनाओं को धन की कमी का बहाना बनाकर निर्लज्जता से बन्द कर दिया गया।

मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह सरकार भी यही काम कर रही है। पत्रकारों को अपनी मर्जी का लैपटाॅप खरीदने के लिए 40,000 रुपए देना, उन्हें अपने पाले में करना तथा उनके प्रतिरोध की धार को भोथरा करना ही है। कहा जा सकता है कि ऐसे पत्रकार दरबारी हो जाऐंगें। यह एक गम्भीर मसला है। मध्य प्रदेश सरकार को अगर पत्रकारों से इतनी ही हमदर्दी थी तो उन्हें कर मुक्त और आसान किश्तों पर लैपटाॅप दिला सकती थी। पत्रकारों की और भी बहुत सारी समस्याऐं हैं। उनके राज्य से प्रकाशित-प्रसारित होने वाले तमाम अखबारों-चैनलों में भी वेतन आयोग की सिफारिशें लागू नहीं हैं, अंशकालिक या संविदा पर काम कर रहे पत्रकारों को जीवन के उत्तरार्ध में सुरक्षित ढ़ॅग से जीने की कोई गारन्टी नहीं है। जो पत्रकार समाचार संस्थानों में नौकरी कर रहे हैं उनकी नौकरी की ही गारन्टी नहीं हैं और वे कभी भी निकाल बाहर कर दिए जाते हैं। लेकिन इन सब समस्याओं को हल करने में लगने का मतलब समाचार-संस्थाओं के सशक्त मालिकों से पंगा लेना होगा। ऐसे में चार-छह करोड़ रुपया फेंक कर सही-सही जगह मौजूद पत्रकारों को काबू में कर लेना ज्यादा आसान काम लगता है और उनके मालिक लोग तो पहले से ही काबू में हैं। अखबार जिस तरह से भारी पूॅंजी का व्यवसाय हो चला है और अखबार मालिकों के अन्य उद्योग-धन्धे भी चल रहे हैं उसमें उनका सरकार से पंगा लेना नामुुमकिन है। सरकार का लैपटाॅप बाॅटना या विवेकाधीन कोष से कुछ लाख रुपये देना तो छोटी बातें हैं, राजनीतिक दल तो अपने कोटे से चहेते पत्रकारों को विधान परिषद, राज्यसभा और न जाने कहाॅं-कहाॅं समायोजित कर रहे हैं। यही कारण तो है कि एक समय के वामपन्थी ध्वजाधारी पत्रकार ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष में अपनी नियति तलाश लिए।

जनता के धन के उपयोग में सरकारों के विवेक और उनकी स्वच्छन्दता की सीमा निर्धारित होनी ही चाहिए। जिलाधिकारियों का भी विवेकाधीन कोष होता है लेकिन वे उस कोष से किसी को लैपटाॅप, कार या मोटरसायकिल नहीं बाॅंट सकते। वह प्रायः आपात स्थिति या प्राकृतिक आपदा को नियन्त्रित करने के लिए होता है। एक निर्वाचित सरकार जनता के धन की संरक्षक होती है, उस धन का राजा नहीं। अफसोस तो यह है कि यह परम्परा शिवराज सिंह, अखिलेश यादव, मायावती, मुलायम सिंह, जयललिता या करुणानिधि तक ही नहीं जाती। यह काॅंग्रेसी शासन से उपजी है। जनता को फुसलाने की यह विधि पुरानी है। राजसत्ताऐं इसी विधि से मुॅंह भी बन्द करती रही हैं ताकि प्रतिरोध को निष्क्रिय किया जा सके। इसलिए लैपटाॅप के लाॅलीपाॅप को समझने की जरुरत है।

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