उत्तर प्रदेश: किसान दे रहे जान और विधायक खुद पर मेहरबान

3:39 pm or March 30, 2015
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—कृष्ण प्रताप सिंह—

सांसदों व विधायकों द्वारा जब भी मन हो, खुद पर मेहरबान होकर अपने वेतन भत्ते बढ़़ा लेना देश में अब शायद ही किसी को चैंकाता हो। सदनों में और उनके बाहर आमतौर पर चलती रहने वाली तू तू-मैं मैं में एक दूजे पर गला फाड़ते रहने वाले ये जनप्रतिनिधि इस बाबत सत्तापक्ष व विपक्ष का भेद भुलाकर एक दूजे के सुर में सुर मिलाते व एक होते नहीं लजाते, तो भी किसी को अचरज नहीं होता। यह देखकर भी नहीं कि अब सदनों में कोई यह पूछने वाला भी नहीं बचा कि-हमीं जब न होंगे तो क्या रंगे महफिल, किसे देखकर आप शरमाइयेगा?-और इसलिए जो हैं, वे सारी लाज-शरम से एकमुश्त छुट्टी पा गये हैं।

महज दोे साल बाद अपनी उम्र के सात दशक पूरे करने जा रही आजादी की छांव में संसद से लेकर विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं तक में ऐसा होते हम इतनी बार देख चुके हैं कि अब उसकी आवृत्तियां गिनना असुविधाजनक और उनके औचित्य-अनौचित्य पर बहस-मुबाहिसा या तर्क-वितर्क व्यर्थ लगता है। लगे भी क्यों नहीं, हम राजनीति के उस दौर में जा पहुंचे हैं जिसमंे सांसदों व विधायकों के पास विधायी अधिकारों के साथ ‘निधियां’ भी होती हैं और उनमंे स्याह सफेद करने के ‘अधिकारों’ के आगे वेतन भत्तों के कम या ज्यादा होने के प्रश्न गौण होकर रह गये हैं।

इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के विधायकों ने विधानमंडल के गत बजटसत्र के अंतिम दिन सर्वसम्मति से अपने वेतन भत्तों में मनमानी वृद्धि के साथ खुद पर सहूलियतों की बरसात करने में जैसी हड़बड़ी प्रदर्शित की, वह हैरत में डालने वाली है। खासकर इसलिए कि जो अखिलेश सरकार उनकी ओर से इन वृद्धियों का विधेयक ले आई, उसके पास पूरा बहुमत है और उसे मालूम था कि उसके विरोध में एक भी आवाज नहीं उठने वाली। फिर भी उसने उसे पारित कराने में ऐसी अफरातफरी मचाई जैसे न उसे संसदीय नियम-कायदों व परम्पराओं की परवाह हो और न एक मिनट की भी देरी बरदाश्त हो।

स्वाभाविक ही विपक्षी विधायक भी इतने ‘अहसान फरामोश’ नहीं थे कि वे इसके लिए उसके कृतज्ञ न होते। उन्होंने विधेयक पर औपचारिक चर्चा तक की जरूरत नहीं महसूस की और उसे बिना किसी व्यवधान के आमसहमति से पारित कराने के लिए भारत के महालेखा नियंत्रक व परीक्षक यानी कैग की एक दिन पहले आई उस रिपोर्ट की ओर से भी नजरें फेर लीं, जिसमें प्रदेश के हाईस्कूल व इंटर पास छात्रों को टेबलेट व लैपटाॅप वितरण की प्रदेश सरकार की योजना के कार्यान्वयन व बन्दी के संदर्भ में कई अनियमितताओं व घपलों को उजागर किया गया था। और दिन होते तो ये विधायक सरकार पर खासे हमलावर होते और उससे जवाब मांगते। लेकिन वेतनवृद्धि पर आमसहमति कहीं भंग न हो जाये, इसकी परवाह करते हुए उन्होंने अनुकूलित तर्कों के सहारे उस रिपोर्ट का महज औपचारिक संज्ञान ही लिया।

सम्बन्धित विधेयक चूंकि वित्तविधेयक की श्रेणी में आता था, उसे सदन में पेश करने से पहले राज्यपाल की अनुमति आवश्यक थी। सरकार की ओर से अनुमति के अनुरोध के साथ उसे पूर्वाह्न ग्यारह बजे राजभवन पहुंचाया गया और राज्यपाल राम नाइक से तुरंत अनुरोध पूरा करने की अपेक्षा की गई। राज्यपाल ने ऐसा करने के बजाय पूछ लिया कि ऐसी कौन-सी आकस्मिकता आ पड़ी है कि उनसे ठीक से पढ़े या विचार किसे बिना ही विधेयक को अनुमति की अपेक्षा की जा रही है, तो सरकार ने चुप्पी साध ली। क्योंकि उसके पास एक ही जवाब था और उसे वह देना नहीं चाहती थी। यह कि वह बजट सत्र का आखिरी दिन था और वह विधायकों को उपकृत करने के लिए अगले सत्र तक प्रतीक्षा करने अथवा महज यही विधेयक पास कराने के लिए मौजूदा सत्र की अवधि बढ़वाकर आलोचना की शिकार होने को तैयार नहीं थी। राज्यपाल ने औपचारिक तौर पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को अपनी अप्रसन्नता और आपत्ति से अवगत कराया, तो भी सरकार में कोई शरमिन्दगी का भाव नहीं दिखा।

यों, सरकार को जगहंसाई का जरा भी डर होता तो वह इस विधेयक को विधानमंडल के सदस्यों को समय से उपलब्ध कराने के नियम का पालन तो करती ही। महत्वपूर्ण वित्त विधेयकों की बाबत यह नियम इसलिए है कि सदस्यों को उनके अध्ययन का समय मिल सके और वे उसकी संवैधानिकता वगैरह को लेकर सवाल करना चाहते हों तो उसके प्रस्तुत होते समय करें। किसी सवाल की कोई आशंका न होने के बावजूद सरकार ने ऐसा क्यों किया, यह राज्यपाल के अलावा भी बहुत से लोगों को समझ में नहीं आ रहा। विधायकों में कोई इक्का-दुक्का वेतन भत्ते बढ़ाने का विरोध करता भी तो उससे तो लोकतंत्र की गरिमा ही बढ़ती। हालांकि एक बार ऐसा भी हो चुका है कि एक विधायक प्रदेश के निवासियों की गरीबी के हवाले से वेतनवृद्धि का विरोध करने उठे तो अन्य विधायकों ने उन्हें यह कहकर बैठ जाने को मजबूर कर दिया कि आपको गरीबों से इतनी ही हमदर्दी है तो खुद बढ़ा हुआ वेतन लेने से मना कर दीजिएगा, मगर हमें लेने दीजिए। शायद इस बार सरकार ऐसा एक भी तर्क नहीं आने देना चाहती थी। उसे डर था कि बात निकलेगी तो सदन में न सही, उसके बाहर दूर तक चली जायेगी। कम से कम इतना तो पूछ ही लिया जायेगा कि क्या अभी जब प्रदेश के किसान बेमौसम बारिश व ओलावृष्टि जैसी दुस्सह आपदाओं के कहर से जूझकर ताबड़तोड़ आत्महत्याएं कर रहे हैं और केन्द्र व प्रदेश सरकारें उनको राहत देने के बजाय आरोप प्रत्यारोप में मगन हैं, तभी यों वेतनवृद्धि का बोझ डालकर उनके जले पर नमक छिड़कने का शुभ मुहूर्त भी निकला है?

विधायकों पर इस नजर-ए-इनायत को उन्हें अखिलेश सरकार के तीन साल पूरे होने का उपहार माना जाये तो याद आता है कि इस सरकार ने आते ही, जब वह प्रदेश की खस्ताहाली दूर करने के लिए केन्द्र से तिरानवे हजार करोड़ रुपयों के पैकेज के लिए बेकरार थी, विधायकों को उनकी सरकारी निधियों से बीस-बीस लाख रुपये लग्जरी कारें खरीदने के लिए गिफ्ट करने का एलान कर दिया था। उसका कहना था कि ऐसा वह उन गरीब विधायकों की मदद के लिए कर रही है, जो गरीब हैं और खुद की कमाई से कारें नहीं खरीद सकते। लेकिन जांच में पता चला कि गरीब विधायकों की प्रजाति तो कब की लुप्त हो चुकी। प्रदेश के 403 विधानसभा सदस्यों में सिर्फ छः ऐसे हैं जिनकी कमाई पचास हजार रुपये महीना से कम है। बाद में व्यापक आलोचनाओं के बीच सरकार को अपना वह इरादा बदलना पड़ा था।

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