विभाजन की राजनीति

3:55 pm or March 30, 2015
Religious Fundamentalism India

—जावेद अनीस—

सआदत हसन मंटो की मशहूर रचना ‘टोबा टेक सिंह’ से में एक  मेंटल अस्पताल का जिक्र है, जिसमें बताया गया है कि सन 47 में  सिर्फ हिन्दुस्तान के लोग और ज़मीन नहीं  बटें थे बल्कि मानसिक रोगियों का भी विभाजन हुआ था, दरअसल ये मानसिक रोगी  तथाकथित होशमंदों के प्रतीक थे .भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन को 66 साल  बीत चुके हैं जिसके नतीजे में  भारत और पाकिस्तान नाम के दो  राष्ट्र अस्तित्व में आए । यह 2015 है जब विभाजन के दौर के नफरत के राजनीति की  संतानें अपने उम्र के अंतिम पड़ाव पर हैं । तो क्या समय तीन सौ साठ डिग्री घूम कर वहीँ पहुच गया है जहाँ हम उसे 1947 में छोड़ कर आगे बढ़ आये थे और  ‘टोबा टेक सिंह” के नफरती मेंटलों के भूतों की वापसी हो गयी है ?

विभाजन का सोया हुआ जिन्न जाग गया लगता है, हिन्दू और मुस्लिमों के नाम पर बनीं सियासी जमात की राजनीति की मुख्यधारा में आने के संकेत बन रहे हैं, पंथनिरपेक्ष, बहुलतावादी और सहास्तित्व के विचार हाशिये पर पंहुचा दिया गये  हैं । जहाँ एक तरफ मुल्क के राजनीतिक पटल पर एक  ऐसी राजनीतिक विचार  सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है जो बहुसंख्यकवाद की  पैरोकार है और ऐसे  दृष्टिकोण को बढ़ावा दे रही है जिससे  राष्ट्र की एकता खतरे में पड़ सकती है ,  वहीँ दूसरी तरफ एक ऐसी सियासी जामत पटल पर प्रवेश कर चुकी है जो चारमीनार के परछाईयों को दूर छोड़ते हुए पूरे देश के मुसलमानों के राजनीतिक  गोलबंदी की दिशा में आगे बढ़ रही है ।

एक तरफ लव जिहाद , धर्मांतरण और हिन्दू राष्ट्र का  शोर है तो  दूसरी तरफ यह ऐलान किया जाता है कि “,इस्लाम सभी धर्मों का वास्तविक घर है और जब सभी धर्मों के लोग इसे अपनाएंगे, तब यह वास्तविक ‘घर वापसी’ होगी।“

दरअसल यह दोनों विचारधारायें परजीवी हैं और एक दुसरे को फलने-फूलने के लिए खाद-पानी सप्लाई करने का काम करती हैं, इसीलिए हम देखते हैं कि आदित्यनाथ का  ओवैसी को यह जवाब आने में देर नहीं लगता है कि “हिंदुस्तान में पैदा होने वाला हर बच्चा हिंदू है”।  ध्यान रहे कि   ओवैसी और आदित्यनाथ दोनों सांसद सदस्य भी  हैं ।

उस वक्त बंटवारे से पहले  भी यही खेल खेला गया था जब हिन्दू महासभा ने कहा था कि ,  भारत एक राष्ट्र नहीं है, यहाँ पर दो राष्ट्र हैं-हिन्दू और मुसलमान , इसपर  मुस्लिम लीग ने उसकी सुर में सुर मिलाते हुए कहा था कि, “हिन्दुओं और मुसलमानों के धर्म, विचारधाराएँ, रीति-रिवाज़ और साहित्य बिलकुल अलग-अलग हैं”। एक राष्ट्र बहुमत में और दूसरा अल्पमत में, ऐसे दो राष्ट्रों को साथ बाँध कर रखने से असंतोष बढ़ कर रहेगा और अंत में ऐसे राज्य की बनावट का विनाश हो कर रहेगा।”

सदियाँ लग गयी थीं जब इस देश के हिंदुओं और मुसलमानों ने एक साथ मिलकर  मिश्रित सभ्यता बनाई थीं , यह एक ऐसा खूबी थी  जिसे दुनिया की दूसरी सभ्यतायें हम से सीख सकती थीं ।  लेकिन ब्रिटिश शासकों ने भारत में आज़ादी की लड़ाई को नियंत्रित करने के लिए दोनों संप्रदायों के नेताओं में होड़ को पैदा करते हुए “फूट डालो और राज्य करो” की नीति पर अमल किया, और  योजनाबद्ध रूप से हिन्दू और मुसलमान दोनों संप्रदायों के प्रति शक को बढ़ावा दिया , अब आज हमारे अपने ही लोग ठीक वही  काम कर रहे हैं और सांझेपन की  इस बहुमूल्य पूँजी  को तार – तार किये जा रहे हैं ।

हमारे समय में हिन्दू कट्टरपंथ के  सबसे बड़े  आवाज मोहन  कहते हैं कि, “भारत एक हिंदू राष्ट्र है , संघ राष्ट्र निर्माण करने वाला संगठन है और वह देश के लोगों में राष्ट्रवाद की भावना भर रहा है, हमें अनुकूल परिस्थितियों का फायदा उठाना है” । आज  आरएसएस के लोग देश और कई राज्यों की सरकारों को चला रहा हैं और बहुत की करीने और योजनाबद्ध तरीके से संघ की विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं ।   इसके बरअक्स  ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम)जैसे सियासी जमात सामने आ रहे हैं, एआईएमआईएम अब केवल हैदराबाद में असर रखने वाली पार्टी नहीं रह गई है, उसका राजनीतिक दायरा महाराष्ट्र विधानसभा तक भी पहुँच गया है.पार्टी ने महाराष्ट्र विधान सभा चुनावों में अपने 31 उम्मीदवार खड़े करते हुए  मुंबई में भायखला सीट एवं औरंगाबाद मध्य की सीटों पर जीत दर्ज की है। यही नहीं कई सीटों पर उसने  कांग्रेस, राकांपा और समाजवादी पार्टी जैसे दलों को नुकसान भी पहुंचाया है , अगले सालों  में ओवैसी की पार्टी मगरिबी बंगाल ,यूपी, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में अपने विस्तार को लेकर काम कर रही है ।

1947 में भारत विभाजन के बाद के  बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक संघर्षों और देश भर में रक्तपात को देखा गया था ।  लेकिन पकिस्तान के विपरीत भारत ने धर्मनिरपेक्ष रास्ते को चुना, जिसकी मिसाल भी दी जाती है , हालांकि इसबीच दोनों समुदायों के बीच तनाव को उभारने की कोशिश भी  जारी रहीं , चौरासी दंगे ,बाबरी  विध्वंस गोधरा और उसके बाद की   घटनायें  सामने आयीं,    आज  हिन्दू राष्ट्रवाद का उभार अपने चरम पर है और हमारे धर्मनिर्पेक्ष और समावेशी होने का दावा फीका पड़ने लगा , हिंदू और मुसलामान  बसाहटों के  मिश्रित क्षेत्र खत्म से हो गये  हैं जो कि  सामने आने वाले गंभीर  खतरे की चुनौती की तरफ इशारा है ।

पाकिस्‍तान के बनने के एक साल बाद मौलाना आज़ाद ने एक पत्रिका को इंटरव्‍यू देते हुए पाकिस्‍तान के लिए एक अंधकारमय समय की भविष्‍यवाणी की थी जो की आज यह सच साबित हो रही है । उन्होंने कहा था ‘‘सिर्फ इतिहास यह फैसला करेगा कि क्‍या हमने बुद्धिमानी और सही तरीके से बंटवारे का प्रस्‍ताव मंजूर किया था।’’ पकिस्तान का वर्तमान उनके इस भविष्‍यवाणी को सही साबित कर चूका है  । लेकिन आज  हम इससे सबक सीखने को राजी  नहीं है और  उसी आग से खेल रहे हैं जिनके लपटों में हम पहले भी झुलस चुके हैं, इस बार का जख्म ज्यादा  गहरा  हो सकता है क्यूंकि इस बार इस  आंच को कम करने के लिए  हमारे साथ  कोई गाँधी, नेहरु और आजाद मौजूद नहीं है ।

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