देशी जीपीएस की तरफ बढ़ते कदम

4:00 pm or March 30, 2015
IRNSS1D

—शशांक द्विवेदी—

नेवीगेशन सैटेलाइट की कामयाबी

अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए इसरो ने श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से भारत के चौथे  नेवीगेशन सैटेलाइट आईआरएनएसएस-1 डी  का पीएसएलवी-सी 27   के जरिए सफल प्रक्षेपण कर दिया । आईआरएनएसएस-1 डी   नौवहन प्रणाली के तहत छोड़े जाने वाले कुल सात उपग्रहों में से एक है। इसे सफलता पूर्वक कक्षा में स्थापित करने के साथ ही देश कुछ गिने-चुने देशों में शामिल हो गया है, जिसके पास इस तरह की प्रणाली है। अमेरिका के जीपीएस यानी ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम की तरह भारत ने खुद का नेवीगेशन सिस्टम स्थापित करने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ा दिया है । यह अभियान देश के अंतरिक्ष कार्यक्रमों को नई दिशा प्रदान कर रहा है । इससे देश का नेवीगेशन सिस्टम मजबूत होगा जो परिवहनों तथा उनकी सही स्थिति एवं स्थान का पता लगाने में यह सहायक सिद्ध होगा ।  इस प्रक्षेपण से देश इंडियन रीजनल नेविगेशनल सैटेलाइट सिस्टम आईआरएनएसएस शुरू करने के लिए तैयार हैं क्योंकि भारत ने सात उपग्रहों के समूह में से चार उपग्रहों को उनकी कक्षा में स्थापित कर दिया है।  परियोजना निदेशक पी कुन्हीकृष्णन ने कहा, “यह मिशन इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि हम नेविगेशनल प्रक्रिया शुरू करने के लिए कक्षा में चार उपग्रह की न्यूनतम जरूरत को पूरी कर रहे हैं।”

पीएसएलवी सी27  ने कुल 1425 किग्रा वजन वाले नौवहन उपग्रह आईआरएनएसएस 1 डी  को उसकी निर्दिष्ट कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया ।  आईआरएनएसएस 1 डी नेविगेशनल, ट्रैकिंग और मानचित्रण सेवा मुहैया कराएगा और इसका जीवन 10 वर्षों का होगा। एक बार सभी उपग्रह प्रक्षेपित होने के बाद आईआरएनएसएस अमेरिकी जीपीएस नेवीगेशनल प्रणाली के समकक्ष होगा।  चार उपग्रह आईआरएनएसएस का काम शुरू करने के लिए पर्याप्त होंगे, बाकी तीन उपग्रह उसे और सटीक एवं कुशल बनाएंगे। इस मिशन में पीएसएलवी के एक्सएल संस्करण का इस्तेमाल किया गया जो कि इस रॉकेट का 28वां सफल प्रक्षेपण था।

आईआरएनएसएस प्रणाली को इस वर्ष तक पूरा करने की योजना बनायी गई है जिस पर कुल 1420 करोड़ रूपये का खर्च आएगा। यह दक्षिण एशिया पर लक्षित होगा और इसे देश के साथ ही उसकी सीमा से 1500 किलोमीटर तक के उपयोगकर्ताओं को सटीक स्थिति की सूचना मुहैया कराने के लिए डिजाइन किया गया है।  इसके जरिये स्थलीय और समुदी नेविगेशन, आपदा प्रबंधन, वाहन ट्रैकिंग और बेड़ा प्रबंधन, पर्वतारोहियों और यात्रियों के लिए दिशासूचक सहायता तथा गोताखोरों के लिए दृश्य एवं आवाज नेविगेशन सुविधा मुहैया करायी जाएगी।  आईआरएनएसएस श्रृंखला के पहले तीन उपग्रहों का प्रक्षेपण क्रमशः एक जुलाई 2013, पिछले वर्ष चार अप्रैल और 16 अक्तूबर को किया गया था।

आईआरएनएसएस प्रणाली दो तरह की सेवाएं मुहैया कराएगा जिसमें एक मानक पोजीशनिंग सेवा जो कि सभी उपयोगकर्ताओ के लिए उपलब्ध होगी तथा सीमित सेवा जो कूट सेवा होगी एवं केवल अधिकृत उपयोगकर्ताओं को ही मुहैया होगी। भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली इंडियन रीजनल नेविगेशनल सैटेलाइट सिस्टम (आईआरएनएसएस) इसरो की एक महत्वाकांक्षी योजना है। इसके तहत सात उपग्रहों को स्थापित किया जाना है। इसरो ने आइआरएनएसएस का विकास इस तरह किया है कि यह अमेरिका के ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम जीपीएस, के समकक्ष खड़ा हो सके। यह अमेरिका के जीपीएस, रूस के ग्लोनास ,यूरोप के गैलिलियो , चीन का बीदयू सेटेलाइट नेवीगेशन सिस्टम और जापान के क्वासी जेनिथ सेटेलाइट सिस्टम की तरह ही है।

कैसे काम करता है जीपीएस?

जीपीएस (ग्लोबल पॉजिशनिंग सिस्टम)  एक उपग्रह प्रणाली पर काम करता है। जीपीएस सीधे सेटेलाइट से कनेक्ट होता है और उपग्रहों द्वारा भेजे गए संदेशो पर काम करती है। जीपीएस डिवाइस उपग्रह से प्राप्ता सिंगनल द्वारा उस जगह को मैप में दशार्ती रहती है। वर्तमान में जीपीएस तीन प्रमुख क्षेत्रों से मिलकर बना हुआ है, स्पेस सेगमेंट, कंट्रोल सेगमेंट और यूजर सेगमेंट। जीपीएस रिसीवर अपनी स्थिति का आकलन, पृथ्वी से ऊपर रखे गए जीपीएस सेटेलाइट द्वारा भेजे जाने वाले सिग्नलों के आधार पर करता है। प्रत्येक सेटेलाइट लगातार मैसेज ट्रांसमिट करता रहता है। रिसीवर प्रत्येक मैसेज का ट्रांजिट समय नोट करता है और प्रत्येक सेटेलाइट से दूरी की गणना करता है। ऐसा माना जाता है कि रिसीवर बेहतर गणना के लिए चार सेटेलाइट का इस्तेमाल करता है। इससे यूजर की थ्रीडी स्थिति (अंक्षाश, देशांतर रेखा और उन्नतांश) के बारे में पता चल जाता है। एक बार जीपीएस की स्थिति का पता चलने के बाद, जीपीएस यूनिट दूसरी जानकारियां जैसे कि स्पीड, ट्रेक, ट्रिप, दूरी, जगह से दूरी, सूर्य उगने और डूबने के समय के बारे में जानकारी एकत्र कर लेता है।

आइआरएनएसएस के तहत भारत अपने भौगोलिक प्रदेशों तथा अपने आसपास के कुछ क्षेत्रों तक नेविगेशन की सुविधा रख पाएगा। इसके तहत भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा कुल 7 नेविगेशन सैटेलाइट अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किए जाने है, जोकि 36000 किमी की दूरी पर पृथ्वी की कक्षा का चक्कर लगाएंगे। यह भारत तथा इसके आसपास के 1500 किलोमीटर के दायरे में चक्कर लगाएंगे। जरूरत पड़ने पर उपग्रहों की संख्या बढ़ाकर नेविगेशन क्षेत्र में और विस्तार किया जा सकता है। आइआरएनएसएस दो माइक्रोवेव फ्रीक्वेंसी बैंड एल 5 और एस पर सिग्नल देते हैं। यह स्टैंडर्ड पोजीशनिंग सर्विस तथा रिस्ट्रिक्टेड सर्विस की सुविधा प्रदान करेगा। इसकी स्टैंडर्ड पोजीशनिंग सर्विस सुविधा जहां भारत में किसी भी क्षेत्र में किसी भी आदमी की स्थिति बताएगा, वहीं रिस्ट्रिक्टेड सर्विस सेना तथा महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालयों के लिए सुविधाएं प्रदान करेगा ।

जीपीएस से बेहतर आइआरएनएसएस

भारतीय आइआरएनएसएस अमेरिकन नेविगेशन सिस्टम जीपीएस से बेहतर है। मात्र 7 सैटेलाइट के जरिए यह अभी 20 मीटर के रेंज में नेविगेशन की सुविधा दे सकता है, जबकि उम्मीद की जा रही है कि यह इससे भी बेहतर 15 मीटर रेंज में भी यह सुविधा देगा। जीपीएस की इस कार्यक्षमता के लिए 24 सैटेलाइट काम करते हैं, जबकि आईआरएनएसएस के लिए मात्र सात सैटेलाइट जरूरी है लेकिन यहाँ यह ध्यान रखना जरूरी है कि जीपीएस की रेंज विश्व व्यापी है जबकि आईआरएनएसएस की रेंज भारत और एशिया तक ही सीमित है । सुरक्षा एजेंसियों और सेना के लिए सुरक्षा की दृष्टि से भी आइआरएनएसएस काफी बेहतर है । ये प्रणाली देश तथा देश की सीमा से 1500 किलोमीटर की दूरी तक के हिस्से में इसके उपयोगकर्ता को सटीक स्थिति की सूचना देगी। यह इसका प्राथमिक सेवा क्षेत्र भी है। नौवहन उपग्रह आईआरएनएसएस के अनुप्रयोगों में नक्शा तैयार करना, जियोडेटिक आंकड़े जुटाना, समय का बिल्कुल सही पता लगाना, चालकों के लिए दृश्य और ध्वनि के जरिये नौवहन की जानकारी, मोबाइल फोनों के साथ एकीकरण, भूभागीय हवाई तथा समुद्री नौवहन तथा यात्रियों तथा लंबी यात्रा करने वालों को भूभागीय नौवहन की जानकारी देना आदि शामिल हैं। आईआरएनएसएस के सात उपग्रहों की यह श्रृंखला स्पेस सेगमेंट और ग्राउंड सेगमेंट दोनों के लिए है। आईआरएनएसएस के तीन उपग्रह भूस्थिर कक्षा जियोस्टेशनरी ऑर्बिट के लिए और चार उपग्रह भूस्थैतिक कक्षा जियोसिन्क्रोनस ऑर्बिट के लिए हैं। सातों उपग्रह इस साल के अंत तक कक्षा में स्थापित कर दिए जाएंगे और तब आईआरएनएसएस प्रणाली शुरू हो जाएगी।

1425 किलो ग्राम वजन के आईआरएनएसएस-1 डी   उपग्रह के माध्यम से धरती, आकाश, जल में दिशासूचक, आपदा प्रबंधन, वाहनों की खोज, जहाजी बेड़े का प्रबंधन, मोबाइल फोन के साथ संपर्क, मैपिंग और भूगणित आदि कार्य किये जा सकेंगे। इस उपग्रह में  दो सौर पैनल हैं। परमाणु घड़ी सहित नाजुक तत्वों के लिए विशेष तापीय नियंत्रण व्यवस्था डिजाइन और क्रियांवित की गई हैं। इसरो के अनुसार इस बार भी पीएसएलवी के एक्सएल वर्जन का प्रयोग किया गया। इसरो ने भारी बारिश के बीच 22 अक्टूबर 2008 को इसी पैड से चंद्रयान मिशन का प्रक्षेपण किया था। उस समय भी पीएसएलवी एक्सएल वर्जन का प्रयोग प्रक्षेपण में किया गया था। इसके अलावा मंगल मिशन को भी यहीं से भेजा गया था। पीएसएलवी एक्सएल वर्जन  भारत के लिए काफी भरोसेमंद है । पिछले साल मंगल यान की कामयाबी के बाद इसरों का लोहा पूरी दुनिया मान चुकी है। चांद पर पानी की खोज का श्रेय भी चंद्रयान 1 को ही मिला था । भविष्य में इसरों उन सभी ताकतों को और भी कडी टक्कर देगा जो साधनों की बहुलता के चलते प्रगति कर रहा है, भारत के पास प्रतिभाओं की बहुलता है। आईआरएनएसएस-1सी का सफल प्रक्षेपण एक बड़ी कामयाबी है जिससे भारत अपना खुद का नेवीगेशन सिस्टम बनाने की दिशा में सफलतापूर्वक बढ़ रहा है जोकि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है क्योंकि ऐसी प्रणाली विश्व के सिर्फ कुछ ही देशों के पास है ।

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