अम्बेडकर की विचारधारा: धार्मिक राष्ट्रवाद और भारतीय संविधान

3:31 pm or April 4, 2015
Dr. Ambedkar

राम पुनियानी—

व्यापक समाज में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए इन दिनों आरएसएस बेसिरपैर के दावे कर रहा है। कुछ महीनों पहले यह दावा किया गया था कि गांधीजी, आरएसएस की कार्यप्रणाली से प्रभावित थे। हाल (फरवरी 15, 2015) में एक और सफेद झूठ हवा में उछाला गया और वह यह कि अम्बेडकर, संघ की विचारधारा में यकीन करते थे। यह दावा किसी छोटे-मोटे आदमी ने नहीं बल्कि संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने किया।

आरएसएस और अम्बेडकर की विचारधारा में जमीन-आसमान का अंतर था। जहाँ अम्बेडकर भारतीय राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों में यकीन करते थे वहीं संघ की विचारधारा केवल दो पायों पर टिकी हुई है-पहला, हिन्दू धर्मं की ब्राह्मणवादी व्याख्या और दूसरा, हिन्दू राष्ट्रवाद, जिसका अंतिम लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र की स्थापना।

हिंदुत्व की विचारधारा के सम्बन्ध में अम्बेडकर की सोच क्या थी? वे हिन्दू धर्म को ब्राह्मणवादी धर्मशास्त्र बताया करते थे। हम भी यह जानते हैं कि हिन्दू धर्मं में ब्राह्मणवाद का बोलबाला है। उन्हें यह अहसास था कि हिन्दू धर्म का प्रचलित संस्करण, मूलतः, जाति व्यवस्था पर आधारित है और यह व्यवस्था, अछूतों और दलितों के लिए अकल्पनीय पीड़ा और संत्रास का स्त्रोत बनी हुई है। शुरुआत में अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म के अन्दर से जाति प्रथा की बेडि़यों को तोड़ने की कोशिश की। दलितों को पीने के पानी के स्त्रोतों तक पहुँच दिलवाने के लिए उन्होंने चावदार तालाब और मंदिरों के द्वार उनके लिए खोलने के लिए कालाराम मंदिर आन्दोलन चलाये। उन्होंने सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति दहन के कार्यक्रम भी आयोजित किये क्योंकि उनका मानना था कि यह ब्राह्मणवादी ग्रन्थ, जातिगत व लैंगिक पदक्रम का प्रतीक है। उन्होंने हिन्दू धर्म व ब्राह्मणवाद पर कटु व चुभने वाले प्रहार किये। परन्तु समय के साथ वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि उन्हें हिन्दू धर्म त्याग देना चाहिए। अपनी पुस्तक “रिडिल्स ऑफ हिन्दुइज्म”, जिसका प्रकाशन महाराष्ट्र सरकार द्वारा भी 1987 में किया गया था, में अम्बेडकर हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवादी संस्करण के सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट करते हैं। अपनी पुस्तक की भूमिका में वे लिखते हैं, “यह पुस्तक उन आस्थाओं की व्याख्या करती है जिन्हें ब्राह्मणवादी धर्मशास्त्र कहा जा सकता है…मैं लोगों को यह बताना चाहता हूँ कि हिन्दू धर्म सनातन नहीं है…इस पुस्तक का दूसरा उद्देश्य है हिन्दू आमजनों को ब्राह्मणों के तौर-तरीकों से परिचित करवाना और उन्हें स्वयं इस पर विचार करने के लिए प्रेरित करना कि ब्राह्मण उन्हें किस तरह पथभ्रष्ट करते रहे हैं और किस प्रकार उन्हें धोखा देते आये हैं’’।

अम्बेडकर 1955 के आसपास से ही हिंदू धर्म से दूर होने लगे थे, जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की थी कि वे हिंदू के रूप में जन्मे अवश्य हैं परंतु हिंदू के रूप में मरेंगे नहीं। सन् 1956 में उन्होंने एक सिक्ख मिशनरी कान्फ्रेंस में भी हिस्सा लिया था और सिक्ख धर्म अपनाने पर विचार भी किया था। सन् 1936 में उन्होंने ‘‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’’ (जाति का उन्मूलन) शीर्षक पुस्तिका प्रकाशित की, जो कि लाहौर में आयोजित ‘जांतपांत तोड़क मंडल’ की सभा में अध्यक्ष बतौर उनका वह भाषण था जो अंततः वे दे न सके थे। अपने लिखित भाषण के अंत में उन्होंने जोर देकर यह कहा कि उन्होंने हिंदू धर्म को छोड़ने का निर्णय ले लिया है।

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने अपना निर्णय कर लिया है। मेरा धर्मपरिवर्तन करने का इरादा पक्का है। यह परिवर्तन मैं किसी भौतिक लाभ के लिए नहीं कर रहा हूं। मैं अगर अछूत भी बना रहूं, तो भी ऐसी कोई उपलब्धि नहीं है जो मैं प्राप्त नहीं कर सकता। मैं केवल अपने आध्यात्मिक नजरिये के कारण धर्मपरिवर्तन कर रहा हूं। मेरा अंतःकरण हिंदू धर्म को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। मेरा स्वाभिमान मुझे हिंदू धर्म से जुड़े रहने की इजाजत नहीं देता। परंतु आपको धर्मपरिवर्तन से आध्यात्मिक और भौतिक, दोनों प्रकार के लाभ प्राप्त होंगे। कुछ लोग भौतिक लाभ प्राप्त करने के लिए धर्मपरिवर्तन करने का मजाक बनाते हैं और उस पर हंसते हैं। मुझे ऐसे लोगों को मूर्ख कहने में कोई हिचक नहीं है।’’

भगवान राम, आरएसएस द्वारा प्रतिपादित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रमुख प्रतीक हैं। आईए, हम देखें कि अम्बेडकर भगवान राम के बारे में क्या कहते हैं: ‘‘सीता के जीवन का तो मानो कोई महत्व ही नहीं था। महत्व केवल उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और नाम का था। उन्होंने पुरूषोचित राह अपनाकर उन अफवाहों को रोकने के लिए कुछ नहीं किया जो एक राजा के बतौर वे कर सकते थे और जो एक ऐसे पति के बतौर, जो अपनी पत्नी के निर्दोष होने के संबंध में आश्वस्त था, करना उनका कर्तव्य था‘‘। एक अन्य स्थान पर वे लिखते हैं, ‘‘बारह साल तक वे लड़के वाल्मिकी के आश्रम में रहे, जो अयोध्या, जहां राम का शासन था, से बहुत दूर नहीं था। इन 12 सालों में इस आदर्श पति और पिता ने कभी यह पता लगाने की कोशिश तक नहीं की कि सीता कहां हैं, जिन्दा हैं या मर गईं…। सीता ने राम के पास लौटने से बेहतर मर जाना समझा क्योंकि राम का उनके साथ व्यवहार पशुवत था‘‘। हिन्दुत्वादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में दलितों के साथ क्या व्यवहार होगा, यह राम के स्वयं के जीवन से स्पष्ट है…‘‘वह शम्भूक नाम का शूद्र था, जो सशरीर स्वर्ग जाने के लिए तपस्या कर रहा था और उन्होंने बिना किसी चेतावनी या स्पष्टीकरण के उसका सिर काट दिया…‘‘ (रिडल्स ऑफ राम एण्ड कृष्ण)

अम्बेडकर का सपना ‘जाति का उन्मूलन‘ था, जो स्वतंत्रता के इतने वर्ष बाद भी अधूरा है। कई कारणों से जाति, इस देश में आज भी एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई है। अम्बेडकर ‘जाति के उन्मूलन‘ की बात करते थे जबकि संघ परिवार, ‘विभिन्न जातियों में समरसता‘ की बात कहता है और इसलिए उसने ‘सामाजिक समरसता मंच‘ नामक एक संस्था भी बनाई है। क्या अब भी इस बात में कोई संदेह रह जाता है कि जहां तक सामाजिक मुद्दों का सवाल है, अम्बेडकर और आरएसएस के विचार परस्पर धुर विरोधी हैं।

आरएसएस की राजनैतिक विचारधारा के मूल में है हिन्दुत्व या हिन्दू राष्ट्रवाद। अम्बेडकर ने इस मुद्दे पर बहुत गहराई से विचार किया था। उनके विचार उनकी विद्वतापूर्ण पुस्तक ‘थाट्स आन पाकिस्तान‘ (पाकिस्तान पर विचार) में उपलब्ध हैं। इस पुस्तक में वे आरएसएस की हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा के जनक सावरकर द्वारा प्रतिपादित हिन्दू राष्ट्रवाद और जिन्ना की मुस्लिम राष्ट्रवाद की विचारधारा की तुलना करते हुए कहते हैं, ‘यह अजीब लग सकता है परंतु जहां तक एक राष्ट्र बनाम द्विराष्ट्र के मुद्दे का प्रश्न है, श्री सावरकर और श्री जिन्ना में कोई विरोध नहीं है। उल्टे, वे एक दूसरे से पूरी तरह सहमत हैं। दोनों सहमत हैं-सहमत ही नहीं बल्कि जोर देकर यह कहते हैं-कि भारत में दो राष्ट्र हैं-एक हिन्दू राष्ट्र और दूसरा मुस्लिम राष्ट्र…। उनके मतभेद सिर्फ इस मुद्दे पर हैं कि इन दोनों राष्ट्रों को किन शर्तों के अधीन रहना होगा। जिन्ना का कहना है कि भारत को पाकिस्तान और हिन्दुस्तान में बांट दिया जाना चाहिए। मुस्लिम राष्ट्र को पाकिस्तान में रहना चाहिए और हिन्दू राष्ट्र को हिन्दुस्तान में। दूसरी ओर, श्री सावरकर का जोर इस बात पर है कि यद्यपि भारत में दो राष्ट्र हैं तथापि भारत दो भागों में विभाजित नहीं किया जाना चाहिए, जिनमें से एक भाग मुसलमानों का हो और दूसरा हिन्दुओं का। बल्कि, दोनों राष्ट्र एक ही देश में रहेंगे जिसका एक संविधान होगा और यह कि यह संविधान ऐसा होगा जो हिन्दू राष्ट्र को प्राधान्य देगा और मुस्लिम राष्ट्र को हिन्दू राष्ट्र के अधीन रहना होगा‘‘ (थाट्स ऑन पाकिस्तान, खण्ड 3, अध्याय 7)।

वे समग्र भारतीय राष्ट्रवाद के हामी थे। ‘‘क्या यह तथ्य नहीं है कि मोन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के अंतर्गत अगर सभी नहीं तो अधिकांश प्रांतों मे मुसलमानों, गैर-ब्राह्मणों और दमित वर्गों ने एकता स्थापित की और एक टीम की तरह सुधारों को लागू करने के लिए 1920 से 1937 तक कार्य किया। यह हिन्दुओं और मुसलमानों में साम्प्रदायिक सद्भाव स्थापित करने और हिन्दू राज के खतरे को समाप्त करने का सबसे मुफीद तरीका है। श्री जिन्ना आसानी से इस राह पर चल सकते हैं और ना ही उनके लिए इस राह पर चलकर सफलता प्राप्त करना मुश्किल है‘‘ (थाट्स ऑन पाकिस्तान, पृष्ठ 359)।

वे हिन्दू राज्य की अवधारणा के पूरी तरह खिलाफ थे। इस पुस्तक के ‘मस्ट देयर बी पाकिस्तान‘ खण्ड में वे लिखते हैं, ‘अगर हिन्दू राज स्थापित हो जाता है तो निःसंदेह वह इस देश के लिए एक बहुत बड़ी आपदा होगी। हिन्दू चाहे कुछ भी कहें, हिन्दू धर्म स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए खतरा है। इसी कारण वह प्रजातंत्र के साथ असंगत है। हिन्दू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।

इसी तरह, धार्मिक अल्पसंख्यकों का समाज में स्थान व उनके अधिकार और कमजोर वर्गों की बेहतरी के लिए सकारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता जैसे मुद्दों पर भी अम्बेडकर और आरएसएस के विचारों में न केवल कोई साम्य नहीं है बल्कि वे परस्पर विरोधाभासी हैं। जहाँ अम्बेडकर संविधान के निर्माता थे, वहीं संघ परिवार, भारतीय संविधान को हिन्दू-विरोधी बताता है और हिन्दू धर्मग्रंथों पर आधारित, नया संविधान बनाने का पक्षधर है। अम्बेडकर को आरएसएस की विचारधारा से जोड़ने का मोहन भगवत का प्रयास, लोगों की आँखों में धूल झोंकना है। संघ, दरअसल, उन लोगों का समर्थन हासिल करना चाहता है, जो अम्बेडकर की विचारधारात्मक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध हैं

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