गैर संक्रामक रोगों का बढ़ता खतरा

5:03 pm or April 9, 2015
Non Infectious Diseases

—अरविंद जयतिलक—

विष्व स्वास्थ्य संगठन का यह खुलासा चिंतित करने वाला है कि भारत में गैर संक्रामक रोगों से मरने वाले लोगों की तादात बढ़ रही है। ताजा वैष्विक स्थिति रिपोर्ट में कहा गया है कि गैर संक्रामक रोगों से भारत में 30 से 70 साल के बीच मरने वाले लोगों की आषंका 26.1 से बढ़कर 2012 में 26.2 फीसद हो गयी। तुलनात्मक रुप से देखें तो यह आंकड़ा दक्षिण एषिया और अफ्रीका के कुछ देशों की तुलना में बेहद खराब है। रिपोर्ट के मुताबिक पी-5 देशों (चीन, फ्रांस, रुस, ब्रिटेन और अमेरिका) में केवल रुस की ही स्थिति (29.2 फीसद के साथ) भारत से अधिक खराब थी। यानी इसे यों समझें तो गैर संक्रामक रोगों से 70 की उम्र से पहले मरने की आषंका 29.2 फीसद थी जो वर्श 2010 की अपेक्षा अधिक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2012 में भारत में 62 फीसदी पुरुष और 52.2 फीसदी लोगों की मौत गैर संक्रामक रोगों से हुई। यानी प्रति एक लाख पुरुषों में 785 लोगों की मौत हुई। गौरतलब है कि गैर संक्रामक बीमारियों में कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोग और सांस लेने में परेषानी चार प्रमुख बीमारियां हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक 79 की मौत कैंसर से, 188.5 की मौत सांस संबंधी रोगों से, 348.9 की मौत हृदय की रक्त धमनियों से संबंधी बीमारी से और 30.2 की डायबिटीज से हुई। इतनी ही महिलाओं में कुल 586.6 महिलाओं की मौत हुई जिनमें 66.3 की मौत कैंसर की बीमारी, 124.9 की मौत सांस संबंधी बीमारी, 264.6 की मौत हृदय रोग और 22.7 की मौत डायबिटीज से हुई। वैष्विक स्तर पर देखें तो दुनिया के 5.6 करोड़ मौतों में गैर संक्रामक रोगों की वजह से 68 फीसदी यानी 3.2 करोड़ लोगों की मौत हुई है। इनमें से 40 फीसद की मौत 70 साल से पहले हुई। इस तरह की सर्वाधिक 82 फीसद मौत निम्न और मध्य आय वर्ग वाले देशों में हुई।

भारत को इस रिपोर्ट में निम्न-मध्य आय वर्ग में रखा गया है। गत वर्श पहले जब विष्व स्वास्थ्य संगठन और अन्तरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति द्वारा लोगों के स्वस्थ जीवनशैली में सुधार लाने के लिए व्यापक समझौते पर सहमति बनी तो उम्मीद बनी कि गैर संचारी रोगों का जोखिम कम होगा। लेकिन अभी तक इस दिषा में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं हुई है। माना जा रहा है कि अगर गैर संचारी रोगों पर नियंत्रण नहीं लगा तो 2015 के अंत तक मरने वाले लोगों की संख्या चार करोड़ से पार पहुंच जाएगी। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति का मानना है कि 21 वीं शताब्दी में गैर संचारी रोगों पर नियंत्रण लगाना सबसे बड़ी चुनौती है।

तेजी से बदल रही जीवनषैली, खानपान और शारीरिक कसरत की कमी के कारण आज जीवन पर खतरा मंडराने लगा है। इन भयंकर रोगों से आज लाखों लोग काल के गाल में समाते जा रहे हैं। हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और मस्तिष्क आघात से मरने वालों में सर्वाधिक संख्या आज भारत में ही है। हालांकि भारत सरकार गैर संक्रामक रोगों से निपटने के लिए भारी धनराषि खर्च कर रही है लेकिन उसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं। अगर इन बीमारियों पर शीध्र नियंत्रण स्थापित नहीं किया गया तो यह बीमारी राष्ट्रीय आपदा का रुप ग्रहण कर सकती है जिससे निपटना फिर आसान नहीं होगा। सरकार की कोषिश यह है कि 30 वर्ष से ज्यादा उम्र के व्यक्तियों में गैर संचारी रोगों को लेकर ज्यादा से ज्यादा जागरुकता पैदा किया जाय और व्यापक स्तर पर उनका शारीरिक परीक्षण किया जाए। यह एक सार्थक पहल है। गत वर्श पहले सरकार ने 30 वर्ष से अधिक सात करोड़ लोगों के परीक्षण की योजना बनायी। लेकिन इस दिषा में कोई सकारात्मक परिणाम नहीं मिला। जबकि यह कार्यक्रम सफल रहता तो देश की एक बड़ी आबादी को स्वास्थ्य के प्रति जागरुक करने में मदद मिलती।

भारत सरकार के आंकड़ों पर विष्वास करें तो देश के 35 से 64 वर्ष के आयु वर्ग में 42 फीसदी मौत की वजह गैर संचारी रोग ही हैं। वर्तमान समय में देश में कैंसर रोगियों की संख्या तकरीबन 35 लाख से उपर पहुंच चुकी है। चिंता वाली बात यह है कि लाख अनुसंधानों के बावजूद भी यह रोग लाइलाज बना हुआ है। अगर समय रहते इन रोगों के लक्षणों को समझ लिया जाय तो इन पर नियंत्रण पाना आसान होगा। कैंसर के रोगी का जितना जल्दी इलाज शुरु होगा, वह उतना ही लाभकारी सिद्ध होगा। विगत पिछले सालों में कैंसर रोगियों के उपचार में नई तकनीक और दवाइयां ईजाद हुई हैं। लेकिन ये दवाइयां ज्यादा महंगी हैं और आमलोगों की पहंुच से बाहर हैं। सरकार को चाहिए कि इन दवाइयों की बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण लगाए ताकि कैंसर जैसी बीमारी से ग्रस्त आम आदमी अपना इलाज करा सके। इसके अलावा सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक स्तर पर सुधार लाना होगा और अपना फोकस शहरों के अलावा गांवों की ओर घुमाना होगा। समझना होगा कि आज गैर संचारी रोगों से मरने वालों की ज्यादतर संख्या गांवों में ही है। आज गांवो में स्वास्थ्य का बुनियादी ढ़ांचा पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। गांव में स्थापित अस्पताल जर्जर हैं। न तो वहां डाॅक्टर हैं और न ही दवाइयां। ऐसी स्थिति में गैर संक्रामक रोगों से कैसे निपटा जाएगा यह अच्छी तरह समझा जा सकता है? यह सच्चाई है कि गांवों के कैंसर और मधुमेह रोगियों को अपना इलाज कराने के लिए शहरों की ओर जाना पड़ता है। विडंबना यह है कि गांवों के मरीज समय रहते रोगों की पहचान नहीं कर पाते हैं और आसानी से मौत के मुंह में चले जाते हैं। जरुरत तो इस बात की है कि सरकार और विष्व स्वास्थ्य संगठन जैसे अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थाएं गैर संचारी रोगों से निपटने के लिए ठोस रोडमैप तैयार करें। अन्यथा लोगों को मौत के मुंह में जाने से रोकना कठिन होगा।

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