मोदीगिरी या धोखागिरी

5:15 pm or April 9, 2015
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—अलका गंगवार—

मोदी सरकार के आने के बाद देश में जन, जंगल और जमीन खतरे में आ गई है। पूंजी के स्वार्थ और धर्मानधता ने पूरे देश की राजनीति को जकड लिया है। पूंजी के अधिक से अधिक संग्रहण हेतु मोदी सरकार श्रम कानूनों को ढीला कर रही है, उन्हें तर्कसंगत व समअनुरूप बनाने की आड़ में पूंजीपतियों को श्रम शोषण करने के लिये उन्हें कानूनी अधिकार दिये जा रहे हैं। सभी जानते है कि औद्योगिकरण के आरंभिक चरण मानव श्रम का शोषण औद्योगिकीकरण के लिये अभिशाप बन गया था। यूरोप में श्रमिकों का दैहिक व मानसिक शोषण किया जा रहा था और एशिया व अफ्रीका में सस्ते श्रम के लालच में पूरी आबादी को गुलामों के रूप में बेचा जा रहा था, वहीं एशिया में यूरोप ने उपनिवेश बनाकर उनके हस्त, उद्योग व कृषि को अलाभकारी व्यवसाय में परिणित कर उपभोक्ता बदल दिया था और सस्ते श्रम के लिये लोगो को गरीबी के दुश्चक्र में ठकेला जा रहा था। द्वितीय विश्व युद्ध की भयावहता ने यूरोप के दंभ को खंडित कर दिया था उससे सबक लेकर यूरोप में मानव को उसकी गरीमा संरक्षित रखने के लिये श्रमिकों के लिये नये कानून बनाये गये, गुलामी प्रथा को मानवता के लिये कलंक घोषित किया गया।

भारत में भी श्रम कानून उसी समय लागू किया गया जो मात्र संगठित क्षेत्र तक आज भी सीमित। मोदी सरकार ने जो धर्म के चश्में मानव को हिंदू, मुसलिम, सिख, इसाई के रूप में देखती है पूंजीपतियों को अमीर से और अमीर बनाने के लिये श्रम कानूनों को ढीला कर दिया और यह नियती का संयोग ही है कि इसे सबसे अधिक पहले उस राज्य ने लागू किया जहां सामंतवादीता अभी भी मौजूद है और संयोग है कि उनका मुख्यमंत्री भी सामंतवादी खानदान से ही आता है। आम आदमी के हित में लागू सभी कल्याणकारी योजनायें चाहे वे शिक्षा से संबंधित हो या स्वच्छता से या …अकुशल रोजगार से सभी में मोदी सरकार ने बजट में कटौती कर दी है सरकार ने ऐसी सभी वस्तुये जो आम आदमी के लिये आवश्यक है चाहे वह बिजली हो या आधुनिक युग में तरंगे (मोबाईल) सभी को पूंजीपतियों के हवाले महंगे दाम पर कर दिया है और सरकार एक पूंजीपतियों के प्रतिष्ठान की तरह यह दलील दे रही है कि देखो हमने इन मौलिक संपदा को महंगे दाम पर बेचकर अधिक रूपये कमाये है। आप खुश रहिये कि आपकी सरकार और अमीर हो गई है चाहे आप की जेब इन सुविधायो को पाने में कितनी भी ढीली क्यों न हो जाए यह कौन सी मोदी ईकोनोमिक्स है कि महंगी तरंगे व महंगे कोयला बेचकर पूंजीपति कैसे आम आदमी को सस्ती मोबाईल दरे या बिजली उपलब्ध करायेगा। दुनिया में सभी सरकारें चाहे वो यूरोप, अमेरिका की पूंजीपति सरकारे हो या चीन के एक दलीय शासन हो, सभी अपनी जनता को मौलिक सुविधायें पानी, बिजली, यातायात, संचार सुविधायें सस्ते दर पर उपलब्ध कराते है लेकिन भारत में मोदी सरकार सभ्ज्ञी उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन पूंजीपतियों के हवाले कर आम आदमी को धनलोनुपो के समक्ष निरीह चारे के रूप में छोड दिया है क्योंकि शायद जनता मनुष्य नहीं बल्कि धर्म के पुतले है जो मोदी सरकार के साम्प्रदायिक एजेण्डे की विषय वस्तु है। मोदी सरकार में जन विलुप्त हो गया है। वह पूंजीपतियो के लिये मात्र बाजार है और मोदी पलिटिक्स के लिये एक उत्साही साम्प्रदायिक भीड जो उनके लिये एक वोट बैंक प्रवर्तित हो सकता है।

मोदी सरकार ने आते ही जंगल पर भी हमला कर दिया है। पर्यावरण कानूनों को ढीला कर दिया गया है, पर्यावरण के कारण अटके सभी प्रोजेक्ट बिना किसी गहन विचार विमर्श के मेक इन इंडिया हेतु अनुमति दे दी गई है। महान जैसे कोल प्रोजेक्ट पर कार्य करने वाले एनजीओ को पर्यावरण पर आवाज उठाने के लिये सजा दी जा रही है। इंदिरा गांधी के प्रति घृणा व पूंजी के लोभ में पर्यावरण एक्ट 1980 को कमजोर कर दिया गया है। जंगल के लिये और उनके प्राणियों के लिये यही एक मात्र कानून था जिसमें 1980 से अब तक लालची व्यापारियों एवं अधिकारियों से पेडों व जानवरो की रक्षा की थी, आज मोदी सरकार में बे असहाय हो गये है। माइन्स मिनरल कानून में संशोधन एवं बीमा संशोधन को यदि गहराई से अध्ययन किया जाये तो सभी में आम आदमी की उपेक्षा की गई है और पूंजीपतियों के हित में कानूनो का निर्माण किया गया है। बीमा में आने वाले पूंजी का बडा हिस्सा जो 49 प्रतिशत तक हो सकता देश के बाहर चला जायेगा या अधिक ब्याज पर देश उपलब्ध को होगी, जबकि आज तक राष्ट्रीयकृत बीमा कंपनी का 90 प्रतिशत से अधिक धन सरकारी योजनाओं का अल्प ऋण दर उपलब्ध था। स्पष्ट है कि जनता की पूंजी को पूंजीपति विदेश ले जायेंगे या सरकार को उंची दर पर उपलब्ध करायेंगे और दूसरी ओर आम आदमी को भी बीमा सुविधा उंची दरों पर प्राप्त होगी। मोदी सरकार अपने ही जन को लूटने के लिये दिन प्रतिदिन अथक परिश्रम कर रही है और इसके एवज में पूंजीपति हिन्दू साम्प्रदायिक ताकतों मुख्यतः हिंदूवादी संगठनों को धन से मजबूत करते जा रहे हैं। यह गणित भा.ज.प. और पूंजीपतियों को खूब रास आ रहा है।

मोदी सरकार ने भूअर्जन अधिनियम 2013 के संशोधन द्वारा जमीन पर हमला कर दिया है। किसी भी सरकार ने पहली बार ऐसा किया है कि पूरी बेशर्मी से उसने लोगों को दिये गये अधिकार को विकास के नाम पर छिना है। मूल भू अर्जन अधिनियम 2013 में 129 साल बाद सरकार ने यह माना कि किसान का जमीन पर अधिकार है और यह अधिकार बिना उसकी सहमति के उससे कोई छीन नहीं सकता। लेकिन मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही भूअर्जन अधिनियम में अध्यादेश लाकर हक को किसान से छीन लिया और दुहाई दी गई है कि आप देश का विकास चाहते हैं तो यह कुर्बानी देनी होगी। सरकार का दूसरा कुतर्क यह है कि यदि सार्वजनिक क्षेत्रों के या पीपीपी सत्ता प्रतिष्ठान, सार्वजनिक डैम, सडके,नहरे औद्योगिक क्षेत्रो का विकास निर्माण होना है तो जमीन किसान की बिना सहमति के लेना जरूरी है, अन्यथा विकास नहीं होगा। इसके विपरीत किसानो का यह सवाल है कि क्या सिर्फ विकास के लिये एकमात्र जमीन कारण हे। विकास के लिये पूंजी, मानव संसाधन, कौशल तकनीकी की भी आवश्यकता होगी। क्या शासन इसकी पूर्ति हेतु बाजार और उनकी सहमति पर निर्भर करता है। यदि देश के विकास के लिये किसान की जमीन सहमति के बिना अधिग्रहीत किया जाना आवश्यक है तो शेष संसाधन भी उनके मालिकों के सहमति के बिना क्यों नही ली जाती है। मात्र किसान पर डंडा क्यो चलाया जा रहा है। मोदी सरकार का यह कहना कि यह कई सालों से हो रहा था तब वे भूल वे जाते है कि इसका विरोध तो आजादी के पहले से हो रहा था और समय समय पर संशोधन भी लाये गये इसी की एक कडी 2013 का अधिनियम है। मोदी की सरकार इस अधिनियम के लागू होने से पूर्व ही इसमें संशोधन किस अनुभव के आधार पर कर रही है, शायद सांप्रदायिक ताकतों एवं पूंजीपतियों के हित साधने के लिये जमीन अधिग्रहीत करने के असीमित अधिकार छोडना नही चाहती है बल्कि सार्वजनिक हित ..की परिभाषा को विस्तृत कर पूंजीपति हितों को पोषित करना .चाहती है। मोदीजी ने अपने गुजरात माडल से यही सीखा है कि सन 2005 से 2007 तक अपने चहते पूंजीपति अदानी को 18000 हेक्टयर जमीन 1 रूपये वर्ग मीटर से 18 रूपये वर्ग मीटर में जमीन देकर उन्होंने एक अल्पशिक्षित व्यक्ति को किस प्रकार हिंदुस्तान का सबसे अमीर आदमी बना दिया है। शायद उनके जहन में यही माडल है कि यदि जमीन हथियाने का अधिकार उनके पास रहा तो करोडो व्यक्तियों को जीवन तो वे नरक कर देंगे परंतुं 11.12 इष्ट मित्रों को अवश्य अरब पति बना देंगे जो उन्हें मंहगे सूट उपहार में देंगे। मोदी के राज्य मंत्री…..जयंत सिन्हा जिस मल्टीनेशनल कंपनी की नोकरी छोडकर आये है वह कंपनी पूरे विश्व में भूमि अधिकारो के लिये एक मुहिम चला रही है जिसकी सोच है कि एशिया,पाकिस्तान देशों में भू अधिकार स्पष्ट नहीं होने व उनके कानूनी दस्तावेजों न होने से इन क्षेत्र में औद्योगिकरण विकास पिछडा है और यदि इन क्षेत्रों में औद्योगिकरण तेज करना है तो उसके पूर्व जमीन के मसले तय होने चाहिये और एक ऐसी शासकीय सरल प्रक्रिया होनी चाहिये जिसके उद्योगपति उन क्षेत्रो में जमीन खरीद सके और उनके हितों की रक्षा करने में सरकारे मदद करें। वे यही चाहते है कि स्थानीय कानून उनके भूमि अधिकारो पर अधिक्रमण या सवाल नही उठा सके। शायद यही सोचा मोदी सरकार की है और इन अंतराष्ट्रीय भू माफियों के हित के लिये यह सरकार नहीं चाहती है कि किसान की सहमति एक सामाजिक सर्वेक्षण की शर्ते भूअर्जन अधिनियम में शामिल हो । मन की बात में मोदी जी ने स्पष्ट किया है कि . सामाजिक सर्वेक्षण ..में सालो लग जायेगी और किसान जमीन अधिनियम प्रक्रिया में फंस जायेगा, इसलिये वे इसका सरलीकरण करना चाहते हैं। स्पष्ट है कि देशीय व अंतराष्ट्रीय भूमाफियो के हितों के संरक्षक के लिये मोदी भू अर्जन के लिये सहमति एवं सोशल सर्वे की शर्तो को बाहर करने के लिये अपनी पूरी ताकत लगाये हुये हैं। जबकि तथ्य यह है कि सोशल सर्वे का कार्य अभी तक किसी भी भूअर्जन प्रक्रिया में नही किया गया जिससे यह निष्कर्ष मोदीजी े निकाल सके कि सोशल सर्वे में कई साल लग जायेंगे और दूसरा तथ्य यह है कि 2013 के एक्ट में इस कार्य को करने के लिये.6 माह अवधि निश्चित की गई है। मोदीजी मन की बात में झूठ बोलते रहे और शायद अब गांधी के देश की यही नियत है असत्य मेव जयते।

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