वंचित अधिकारों के दस्यु

4:37 pm or April 11, 2015
rights

—सुभाष गाताडे—

एक ऐसा सूबा जहां आबादी में अनुसूचित जाति की संख्या का प्रतिशत देश में सबसे अधिक है, वहां पर क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि विगत अकादमिक सत्रा में एम बी बी एस पाठयक्रम में आरक्षित 84 सीटें जानबूझ कर खाली छोड़ी जाये और इस बड़े घोटाले के लिए किसी को जिम्मेदार न ठहराया जा सके।

जस्टिस निर्मल सिंह /रिटायर्ड/ द्वारा पिछले दिनों इस मसले पर पंजाब विधानसभा के समक्ष प्रस्तुत रिपोर्ट विचलित करनेवाली है। /देखें, द टिब्युन, 6 अप्रैल 2015/ इस रिपोर्ट के मददेनज़र पंजाब विधानसभा की अनुसूचित जातियों, जनजातियों एवं पिछड़े तबकों के कल्याण के लिए बनी कमेटी ने राज्य के मुख्य सचिव को आदेश दिया है कि वह इस मसले की उच्च स्तरीय जांच करे और अपनी रिपोर्ट एक माह के अन्दर जमा कर दे। विभिन्न अदालती फैसलों का तथा कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए तथा प्रवेश प्रक्रिया में संलग्न कुछ अधिकारियों की भूमिका की छानबीन करने के बाद कमेटी इस नतीजे तक पहुंची है कि कि अनुसूचित तबके से आनेवाले छात्रों के लिए आरक्षित 84 सींटें जानबूझ कर भरी नहीं गयी और इस काम को आरक्षण को लेकर बने संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए किया गया।

समाचार के मुताबिक राज्य में कुल 858 सीटें एम बी बी एस के हर साल निकलती हैं, आरक्षित सीटों के लिए कौन्सलिंग के बाद 84 सीटें खाली रह गयीं। वही हाल बीडीएस अर्थात बैचलर आफ डेण्टल सर्जरी की सीटों को लेकर था, जिसके लिए 215 सीटें थीं, इनमें से 12 सीटें कौन्सलिंग के बाद भर गयी, और 203 खाली रह गयीं। इन सीटों को भरने के लिए राज्य सरकार ने विशेष परीक्षा का आयोजन किया मगर वह सिलसिला एम बी बी एस के लिए आरक्षित सीटों को लेकर नहीं किया गया। और यह सीटें सामान्य श्रेणी के छात्रों के लिए आवंटित की गयी।

फिलवक्त़ यह कहना मुश्किल है कि इस जांच का क्या निष्कर्ष निकलेगा ?

मगर यह बात तो स्पष्ट है कि उत्पीडि़त, वंचित तबकों के छात्रों को अपने संवैधानिक हकों से वंचित करने को लेकर समूचे मुल्क में गजब की एकता दिखती है। वंचितांे के अधिकारों पर डाका डालने का यह मामला महज खास सूबे तक सीमित नहीं है।

उदाहरण के तौर पर जनवरी माह के उत्तरार्द्ध में महाराष्ट से खबर आयी थी कि आदिवासी छात्रों की उच्च शिक्षा के लिए केन्द्र और राज्य सरकार ने जिन स्कालरशिप योजनाओं का आगाज़ किया है, उनका अच्छा खासा हिस्सा बड़ी बड़ी शैक्षिक संस्थाओं के कर्ताधर्ता ही हड़प रहे हैं। सूबा महाराष्ट में ऐसे ‘शिक्षा सम्राटांे’ ने फर्जी कागज़ात बना कर तथा नकली छात्रों के रजिस्टरों को तैयार करके अब तक करोड़ों रूपये हड़पे हैं। लोकसत्ता’ नामक अख़बार में प्रकाशित समाचार/20 जनवरी 2015/ के मुताबिक ऐसे मामलो में नौ शिक्षा संस्थानों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे कायम किए गए हैं। ख़बर के मुताबिक अकेले गडचिरौली जिले में – जहां आदिवासियों की अच्छी खासी संख्या है – करोड़ो रूपयों के गबन का मामला सामना आया है।

शिक्षा संस्थानों के कर्ताधर्ताओं एवं सरकारी अधिकारियों की सांठगांठ से फर्जी लाभार्थी खड़ा करके धोखाधड़ी का प्रसंग विगत साल जुलाई माह के अन्त में मध्यप्रदेश से भी उजागर हुआ था, जब 18 कालेजों का नाम ‘काली सूची’ में डाल दिया गया जब स्कालरशिप को लेकर उन्होंने किए घोटाला उजागर हुआ। मध्यप्रदेश आदिवासी विकास विभाग ने इन कालेजों को – जो पैरामेडिकल पाठयक्रम चलाते हैं -आरक्षित श्रेणी के छात्रों के नाम पर दी जा रही छात्रावृत्ति पर रोक लगा दी। लोकायुक्त पुलिस ने अब तक इन कालेजों के खिलाफ 16 मामले दर्ज किए हैं, जिनमें इन संस्थानों के निदेशकों, सरकारी अधिकारियों आदि के नाम हैं। जांच में पता चला कि फर्जी लाभार्थियों के नाम पर इन्होंने 1 करोड़ रूपए से अधिक स्कालरशिप का गबन किया था।

मध्यप्रदेश में हुए इस खुलासे के महज डेढ साल पहले राजस्थान सूर्खियों में था, जहां सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता विभाग की जांच के बाद छात्रावृत्ति घोटाले में लिप्त 72 कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया गया था। इन पर आरोप था कि वर्ष 2005-2009 के दौरान राजधानी जयपुर एवं अन्य जिलों के कई कालेजों में बिना जांच पड़ताल एवं कालेज संचालकों से मिलीभगत कर अनुसूचित जाति एवं जनजाति के छात्रों के लिए आवण्टित की जानेवाली छात्रावृत्ति में उन्होंने करोड़ो रूपए का घोटाला कर दिया। मामला इस वजह से उजागर हुआ कि वर्ष 2007-2008 से 2009-2010 के दरमियान छात्रावृत्ति पानेवाले छात्रों की संख्या में काफी उतारचढ़ाव देखे गए और करोड़ो रूपए के घोटाले की आशंका से विशेष जांच दल द्वारा आॅडिट की आवश्यकता पड़ी। गौरतलब था कि वर्ष 2007-2008 में जहां 16 हजार से कम विद्यार्थियों को छात्रावृत्ति आवंटित की गयी तो 2008-2009 में 46 हजार से अधिक विद्यार्थी इससे लाभान्वित बताए गए जिसके लिए 76 करोड़ रूपए आवंटित किए गए थे।

अगर बारीकी में पड़ताल की जाए तो तयशुदा बात है कि अनुसूचित तबके के हकों पर डाका डालने के प्रसंग हर तरफ नज़र आ सकते हैं। वैसे ऐसे भी अवसर आते दिखते हैं जहां वंचित अधिकारों के ऐसे दस्यु अपने किए की सज़ा पाते हैं।

उदाहरण के तौर पर राजस्थान के घोटाले के उजागर होने के दिनों में ही उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के अतिरिक्त सत्रा न्यायाधीश द्वारा एक स्कूल की प्रिन्सिपल एवं प्रबन्धक को दलित छात्रों की छात्रावृत्ति हड़पने के आरोप में सज़ा सुनायी गयी थी। गौरतलब था कि सत्रा न्यायाधीश कल्पना मिश्रा द्वारा बिशुन मेमोरियल बाल शिक्षा निकेतन की प्रधानाचार्या माधुरी सिन्हा के अपराध को ‘अत्यधिक घृणित अपराध’ कहते हुए उम्र कैद की सज़ा सुनायी गयी वहीं प्रबन्धक सतीश रावत को दस साल कैद ए बामशक्कत की सज़ा दी गयी। इन दोनों ही आरोपियों ने राज्य सरकार द्वारा वर्ष 1996-97 में अनुसूचित तबके के छात्रों के लिए प्रदत्त छात्रावृत्ति की 61 हजार रूपए से अधिक की रकम हड़प ली थी, जिसके लिए उन्होंने एक फर्जी स्कूल में दाखिला लिए छात्रों की एक नकली फेहरिस्त बनायी थी। स्पेशल पब्लिक प्रासिक्युटर के मुताबिक गबन का यह एक आम मामला था, मगर अदालत ने सख्त सजा सुना कर एक नज़ीर कायम करने की कोशिश की कि समाज के सबसे गरीब तबके के लिए आवण्टित धनराशि को हड़पनेवाले लोग सावधान हो जाएं।

साफ है कि स्कालरशिप हड़पना वंचित-उत्पीडि़त तबकों को हक से वंचित करने का एकमात्रा जरिया नहीं है।

अनुसूचित तबकों के छात्रों को दी जा रही छात्रावृत्ति को जारी करने में विलम्ब के जरिए भी छात्रों के भविष्य को खतरे में डाला जा सकता गया है। कुछ समय पहले राज्यसभा में शून्यकाल में इसी मसले को पंजाब के (बसपा) सांसद ने उठा कर सदन का ध्यान इसकी तरफ खींचने की कोशिश की थी। उनका कहना था कि संविधान के अन्तर्गत अनुसूचित तबकों को दिए गए आरक्षण के बावजूद समय पर छात्रावृत्ति न मिलने से इन तबकों के विद्यार्थियों की पढ़ाई बाधित होती है। अकेले पंजाब का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि पिछले साल अकेले पंजाब में 2 लाख 35 हजार छात्रों ने विभिन्न डिग्री पाठयक्रमों में प्रवेश लिया मगर वह इसी विलम्ब के चलते प्राइवेट कालेजों में अपना कोर्स ठीक से कर नहीं पा रहे हैं। इस बार मैट्रिक पास किए छात्रा इसी के चलते प्रवेश तक नहीं ले पा रहे हैं।

यहां तक कि समय पर जाति प्रमाणपत्रा जारी न करके भी दलित-आदिवासी अधिकारों पर कुठाराघात करने की कोशिश चलती रहती है। तीन साल पहले महाराष्ट्र के समाज कल्याण महकमे के कर्मचारियों आपराधिक लापरवाही के चलते नागपुर क्षेत्रा में अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़ी जातियों से आनेवाले दस हजार से अधिक छात्रा अपने पसन्द के प्रोफेशनल पाठयक्रमों में प्रवेश नहीं ले सके थेे ? (टाईम्स आफ इण्डिया, 22 जून 2012, गवर्मेन्ट एपथी मे डिप्राइव एससी एसटी स्टुडेंटस आफ कालेज एडमिशन्स) और शासकीय कालेजों में उनके प्रवेश को महज इसी वजह से रोका गया था क्यांेंकि उनके पास जाति वैधता प्रमाणपत्रा नहीं थे, जबकि इस सम्बन्ध में इन तमाम छात्रों ने साल भर पहले ही आवेदन पत्रा जमा किए थे ? ग्राहकों के हकोें के संरक्षण के लिए संघर्षरत एक कार्यकर्ता के मुताबिक इसके पीछे निजी इंजिनीयरिंग-मेडिकल कालेजों की समाज कल्याण विभाग के साथ मिलीभगत भी दिखाई दी थी। जाहिर था कि आरक्षित तबके के इन छात्रों को जाति वैधता प्रमाणपत्रा समय पर नहीं मिलने से कइयों को खुली श्रेणी में प्रवेश लेना पड़ा और फिर निजी कालेजों ने उनसे भारी फीस वसूली थी।

छात्रावृत्ति का गबन हो, उसे जारी करने में किया जानेवाली देरी हो या जाति प्रमाणपत्रों के जारी करने में किए जानेवाला विलम्ब हो, इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि संविधान में प्रदत्त तमाम अधिकारों के बावजूद या सदियों से सामाजिक तौर पर उत्पीडि़त रहे तबकों के लिए अपनायी जानेवाली सकारात्मक विभेद ;चवेपजपअम कपेबतपउपदंजपवदद्ध की योजनाओं के बावजूद वंचित तबकों से आनेवाले छात्रों के साथ आज भी विभिन्न स्तरों पर छल जारी है।

आखिर और कितने गणतंत्रा दिनों का हमें इन्तज़ार करना पड़ेगा ताकि संविधान की मूल भावना के अनुरूप सभी के साथ समान सलूक हो सके। आधुनिक कहे जाने वाले हमारे वक्त़ में एकलव्यों को अब कब तक इसी तरह अपने अंगुठे को खोते रहना पड़ेगा, जबकि हर दूसरा शख्स द्रोणाचार्य की अनुकृति मालूम देता है।

Tagged with:     , , ,

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in