अब ‘शुभचिन्तकों’ से त्रस्त हैं उत्तर प्रदेश के किसान!

3:43 pm or April 13, 2015
Hail storm hit

—कृष्ण प्रताप सिंह—-

बेमौसम बारिश और ओलों की मार से कराह रहे उत्तर प्रदेश के किसान जितने कुदरत के इस कहर से उससे ज्यादा अपनी शुभचिंतक पार्टियों व नेताओं के रंग-ढंग देखकर हैरान हैं। ये पार्टियां व नेता किसानों के लिहाज से विकट संकट की इस घड़़ी में भी एक दूजे को लेकर सौतियाडाह से भरे हैं और महज राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। कहां तो सबको मिलकर अन्नदाताओं के आंसू पोंछने चाहिए थे और कहां सब के सब उनकी नष्ट हुई फसलों के साथ फोटो खिंचाकर दिखावे की सहानुभूति जताने और बेमतलब के दोषारोपण से विरोधियों को ‘निपटाने’ में लगे हैं। यहां तक कि केन्द्र व राज्य सरकारें भी खुद को इस प्रवृत्ति से ऊपर नहीं उठा पा रहीं और पीडि़त किसानों को खराब केन्द्र राज्य सम्बन्ध भी भुगतने पड़ रहे हैं।

यों तो यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रदेश है, जो इसकी वाराणसी लोकसभा सीट के सांसद हैं। तिस पर इसमें खुद को किसानों की सबसे बड़ी हमदर्द बताने वाली समाजवादी पार्टी की सरकार है। केन्द्र व प्रदेश दोनों की सरकारें पीडि़त किसानों के दुख-दर्द हरने की घोषणाओं में जैसी तेजी से एक दूजे से आगे निकलने की प्रतिद्वंद्विता करती दिखाई देती हैं, उससे लगता है कि वे हर हाल में किसानों की आहें व कराहें खत्म करके ही रहेंगी। अभी तक ऐसी आपदाओं के वक्त पचास प्रतिशत या उससे ज्यादा फसलें नष्ट हो जाने पर किसानों को सिंचित कृषि भूमि पर नौ हजार रुपये प्रति हेक्टेयर और असिंचित पर साढ़े चार हजार रुपये प्रति हेक्टेयर मुआवजा दिया जाता रहा है। अब केन्द्र सरकार ने यह राशि डेढ़ गुनी करके एक तिहाई फसल गंवाने वाले किसानों को भी मुआवजा देने की घोषणा की है तो प्रदेश सरकार मुआवजा दुगुना करने और चैथाई फसल गंवाने वालों को भी उसका लाभ देने के जतन कर रही है।

लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अभी तक किसानों के नुकसान का आकलन भी पूरा नहीं हुआ है और दोनों सरकारों में इस पर गहरे मतभेद हैं। केन्द्र प्रदेश सरकार के समय से रिपोर्ट न भेजने को जिम्मेदार ठहरा रहा है तो प्रदेश सरकार का आरोप है कि केन्द्र ने जानबूझकर आकलन दल देर से भेजे। केन्द्र सरकार ने प्रदेश सरकार को तेजी बरतने के निर्देश दिये हंै तो प्रदेश सरकार के विज्ञापन कह रहे हैं-‘नदी नहरों में दौड़े पानी छम-छम, उम्मीदों पर खरे उतर रहे हम!’ आसमान से बरसती आफत के बीच यह काव्यपंक्ति किसानों के जले पर नमक से कम नहीं लगती।

लेकिन क्या कीजिएगा, प्रधानमंत्री को फांस, जर्मनी और कनाडा जाना था, सो, वे ‘अपने’ प्रदेश के किसानों की दुर्दशा का मौका मुआयना नहीं कर सके, न ही इस हेतु कृषिमंत्री को भेज पाये। तभी तो किसानों की भूमि के अधिग्रहण को लेकर 19 अप्रैल को दिल्ली में प्रस्तावित रैली की तैयारियों के सिलसिले में लखनऊ आये कांगे्रस नेता जयराम रमेश ने इसे लेकर उन पर बरसने के मौके का भरपूर लाभ उठाया। दूसरी ओर प्रदेश की अखिलेश सरकार अपनी काहिली के लिए सपा के जिन सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव तक की लानत-मलामत झेलती रहती है, उनके एजेंडे पर किसानों की तकलीफों से पहले जनता परिवार की एकता है। फिलहाल, ‘धरतीपुत्र’ इस एकता के बाद बनने वाले दल के नाम व चुनाव चिह्न को लेकर विचारविमर्श कर रहे हैं, किसानों की बाबत बाद में सोचेंगे।

भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी आगरा आये तो खुद को किसानों का सबसे बड़ा हमदर्द जताने की धुन में उन्हें केन्द्र से सीधी मदद का आश्वासन दे डाला। सब्जबाग दिखा गये कि किसानों ने बैंक में खाता खुलवाया नहीं कि मुआवजे की रकम उसमें आयी। उनके दौरे पर संकीर्ण दलीय राजनीति ऐसी हावी रही कि बिना किसी अध्ययन या आकलन के वे इस नतीजे पर पहुंच गये कि सारे किसान केन्द्र से सीधी मदद चाहते हैं क्योंकि उनकी समस्या जितनी आसमानी है, उससे ज्यादा सुल्तानी। ‘सुल्तानी’ से उनका संकेत मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की ओर था, जिनका एक नाम टीपू सुल्तान भी है।

प्रदेश में अब तक सैकड़ों आपदापीडि़त किसानों ने आत्महत्या कर ली है। इनमें 35 मौतें प्रदेश सरकार स्वीकारती भी है और मृतकों के परिजनों को सात-सात लाख का मुआवजा देने भी जा रही है। लेकिन उसके अधिकारी कहते हैं कि इन मौतों के कारण दूसरे हैं और सबसे बड़े विपक्षी दल बसपा को इस पर किसी प्रतिक्रिया की जरूरत महसूस नहीं होती। उसकी चिंता इतनी-सी है कि प्रदेश सरकार उसकी योजनाओं की नकल कर रही है। राष्ट्रीय लोकदल के प्रदेश अध्यक्ष मुन्ना सिंह आत्महत्याएं करने वाले किसानों का मुआवजा सात से बढ़ाकर पन्द्रह लाख करने के बयान दे रहे हैं तो चैधरी अजीत सिंह के बेटे जयंत खफा हैं कि अखिलेश सरकार ने सैफई महोत्सव पर तो 800 करोड़ रुपये फूंक दिये मगर किसानों के लिए सिर्फ दो सौ करोड़ रुपये ही दिये हैं। हालांकि अब प्रदेश सरकार ने आकस्मिकता निधि सेे तीन सौ करोड़ रुपये और जारी कर दिये हैं और आपदाराहत कोष से दिये गये 44 करोड़ रुपयों को भी जोड़ लें तो किसानों के लिए दिये गये 200 करोड़ रुपये 544 करोड़ में बदल जाते हैं। अलबत्ता, ये अभी भी सैफई में खर्च 800 करोड़ रुपयों के मुकाबले कम हैं।

फौरी सरकारी अनुमानों के अनुसार प्रदेश के 40 जिलों के पांच लाख किसानों पर आपदाओं का असर पड़ा है और कुल 1100 करोड़ से ज्यादा की क्षति हुई है। जाहिर है कि ऐसे में 544 करोड़ ऊंट के मुंह में जीरे जैसे हैं। किसानों के गन्नामूल्य की इससे दो गुनी राशि चीनी मिलों पर बकाया है। हाईकोर्ट ने जरूरत पड़े तो उनकी सम्पत्तियां नीलाम करके यह बकाया किसानों को दिलाये जाने का आदेश दे रखा है पर प्रदेश सरकार इस विपदा में भी ऐसा नहीं कर रही।

विडम्बना देखिये: जो फसल नष्ट हो गयी, वह तो खैर नष्ट ही हो गयी, जो बच गयी है, उसके विपणन को लेकर भी किसानों की समस्याओं का कोई अंत नहीं है। केन्द्र सरकार का कहना है कि उसने गेंहू खरीद के मानक शिथिल कर दिये हैं ताकि किसानों का वह गेंहू भी खरीदा जा सके, जो ओलों की मार से सिकुड़ गया अथवा बारिश में भीग गया है। लेकिन प्रदेश सरकार की उदासीनता के चलते अभी अनेक अंचलों में क्रय केन्द्र खुले ही नहीं हैं। जहां खुले भी हैं, वहां ताजा निर्देशों के न पहुंचने अथवा किसी कमी के कारण खरीद नहीं हो रही।

दूसरी ओर पीडि़त किसानों से सरकारी देयों की वसूली स्थगित रखने के एलान के बावजूद बड़े बकायों में उनके रिकवरी सर्टिफिकेट जारी किये जा रहे हैं और उनका उत्पीड़न भी जारी है। किसानों का दुर्भाग्य कि वे शुभचिन्तकों से घिरे हुए हैं लेकिन उनमें से कोई एक भी उनकी समस्याओं को बिन्दुवार उठाने और तार्किक परिणति तक पहुंचाने वाला नहीं है।

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