क्या गोलरूख कान्टराक्टर को इन्साफ मिलेगा ? धर्म, परम्परा और स्त्रिायों के अधिकार

3:48 pm or April 22, 2015
Fire Temple

—-सुभाष गाताडे—-

क्या एक पारसी मूल की महिला , जिसने अपने समुदाय के बाहर शादी की है, वह अगियारी अर्थात अग्निघर – जो पारसी लोगों का पूजास्थल होता है – वहां पर पूजा कर सकती है या नहीं ? गोलरूख कान्टराक्टर नामक महिला जिसने आज से लगभग 25 साल पहले माहपाल गुप्ता से शादी की थी, उसके द्वारा गुजरात उच्च न्यायालय में डाली जन हित याचिका के बहाने यह सवाल उपस्थित हुआ है।ं न्यायमूर्तिद्वय मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति अकिल कुरेशी की द्विसदस्यीय पीठ ने इस सम्बन्ध में वलसाड जिले के पारसी अंजुमन टस्ट को नोटिस जारी की है। इस मामले की अगली सुनवाई अप्रैल माह के आखिर में होगी। अदालत ने पारसी धार्मिक ग्रंथ, इस सम्बन्ध में क्या कहते हैं, इसे लेकर भी जानकारी प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।

सुश्री गोलरूख ने अदालत को बताया कि विवाह के बाद भी वह मंुबई स्थित अगियारी तथा टावर आफ साइलेन्स – जहां पारसी लोगों का अंतिम संस्कार किया जाता है- जाती रही है, मगर जब उसने वलसाड की अगियारी में जाना चाहा तो टस्ट के संचालकों ने उसे प्रवेश करने नहीं दिया। अदालत के सामने भेजी याचिका में उसने कहा कि अपने माता पिता के अंतिम संस्कार में भाग लेने और अपना खुद का अंतिम संस्कार वहां करने के लिए अदालत टस्ट को निर्देश दे। उन्होंने अदालत के सामने ऐसी उदाहरण भी पेश किए जिसके अन्तर्गत पहले अन्तरसामुदायिक विवाह करनेवाली पारसी महिलाओं को यहां प्रवेश दिया जाता था, मगर अब यह रोक लगायी गयी है।

गोलरूख के वकील ने अदालत को बताया कि जहां गैरपारसी महिलाओं से शादी करनेवाले पारसी पुरूषों के पारसी धार्मिक स्थानों पर प्रवेश के लिए रोक नहीं होती, जबकि अन्तरसामुदायिक शादी करनेवाली गैरपारसी महिलाओं के लिए रोक लगायी जाती है, जो भारत के संविधान की धारा 25 और 14 का उल्लंघन है। फिलवक्त इस बात का अन्दाज़ा नहीं लगाया जा सकता कि अदालत इस मामले में क्या कहती है, मगर इसी बहाने धर्म और परम्परा के नाम पर स्त्रिायों को अपनी मानवीय अधिकार से वंचित रखने का मसला आगे आया है।

इसी किस्म का सवाल एक अन्य जनहितयाचिका के बहाने मुंबई उच्च अदालत के सामने उपस्थित हुआ है, जबसे भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की तरफ से मंुबई के हाजी अली दरगाह के प्रबंधन के खिलाफ एक जनहितयाचिका दायर की गयी है, जिसने कुछ समय पहले पन्दरहवीं सदी के सूफी संत पीर हाजी अली शाह बुखारी की मज़ार तक स्त्रिायों के जाने पर रोक लगायी है। अरब समुद्र में पत्थरों से बनी जमीन पर स्थित यह दरगाह – जो दक्षिण मध्य मुंबई में स्थित है – वहां पर इसके पहले महिलाएं अन्दर तक – अर्थात सूफी संत की मज़ार तक भी जाती रही हैं। और कुछ समय पहले प्रबंधन ने इस सम्बन्ध में महिलाओं के प्रवेश को रोक लगाते हुए उसे शरीयत के आधार पर जायज घोषित किया है। प्रस्तुत दरगाह पर हाजी अली दरगाह – जो एक सूफी मजार है, जहां पर हर साल हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस दरगाह के प्रबंधन ने आदेश दिया था कि पन्द्ररहवी सदी के सूफी संत पीर हाजी अली शाह बुखारी की मज़ार के पास महिलाओं को आने नहीं दिया जाएगा। उनका कहना था कि शरीया कानून के अन्तर्गत यह कदम गैरइस्लामिक है कि महिलाएं कब्रगाह जाएं।

इस सम्बन्ध में लिखे अपने आलेख में गौतम भाटिया ने ‘स्करोल’ पर लिखे अपने आलेख में /22 मार्च 2015/ संवैधानिक अधिकार, नागरिक अधिकारों की चर्चा करते हुए स्पष्ट किया है कि किस तरह ‘भारतीय महिला आन्दोलन’ की याचिका मजबूत संवैधानिक मान्यताओं पर खड़ी है। सबसे पहले उन्होंने संविधान की धारा 25 की बात की है, जो हर व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार घुमने, उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। उनका कहना है कि इतनी आसानी से आप लोग किसी भी व्यक्ति को उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं कर सकते।

लेख में आगे यह भी चर्चा की गयी है कि अगर याचिकाकर्ता संवैधानिक अधिकार की बात प्रमाणित नहीं भी कर पाती हैं तो भी उनके सामने नागरिक अधिकारों का विकल्प है। सर्वोच्च न्यायालय ने खुद माना है कि आम कानून के अन्तर्गत पूजा का अधिकार एक नागरिक अधिकार है जिसे नियमित कानूनी याचिका के जरिए लागू करवाया जा सकता है, जिसके लिए उन्होंने सरदार सैफुददीन बनाम स्टेट आफ बाम्बे के मुकदमे का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति जे दासगुप्ता की बात को उदध्रत किया है ‘ सम्पत्ति या किसी पूजा स्थान पर पूजा का अधिकार या स्थानविशेष पर दफनाने या अंतिम संस्कार के अधिकार को कानूनी याचिका के जरिए अमल में लाया जा सकता है।’

अगर हम संविधान निर्माण के दौरान चली बहसों को देखें तो इस सम्बन्ध में कुछ बातें और स्पष्ट होती हैं। इस हकीकत को मददेनज़र रखते हुए कि भारत में धर्म का प्रभाव काफी व्यापक है और अगर ‘सारभूत धार्मिक आचारों’ को लेकर संविधान द्वारा संरक्षण नहीं प्रदान किया गया तो वह लोगों के जन्म से म्रत्यु तक धर्म या उसकी संस्थानों की आम आस्थावान के जीवन पर पकड़ को दमघोंटू बना सकता है, उसमें कुछ विशिष्ट प्रावधान डा अम्बेडकर ने रखे हैं।

दरगाह में महिलाओं के प्रवेश को सीमित करनेवाले याचिकाकर्ताओं ने इस बात के प्रमाण पेश किए है कि महिलाओं को मजार तक जाने से रोकना कुराण या हदीस का हिस्सा नहीं है, अर्थात उसे हम ‘सारभूत धार्मिक आचारों’ का हिस्सा नहीं मान सकते, लिहाजा उसे लेकर प्रबंधन को आदेश देने का अधिकार नहीं बनता। याचिकाकर्ताओं ने उन तमाम दरगाहों – उदाहरण के लिए अजमेर शरीफ की दरगाह – का उदाहरण देते हुए कहा है कि वहां पर महिलाओं के लिए प्रवेश बिल्कुल वर्जित नहीं है।

एक क्षेपक के तौर पर इस बात का उल्लेख करना समीचीन होगा कि धर्म को लेकर किसी विवाद की स्थिति में उसके मूल ग्रंथों को देखा जाता है। उदाहरण के लिए रामप्रसाद सेठ बनाम स्टेट आफ यूपी मामले में बहुपत्नीप्रथा पर फैसला देने के पहले इलाहाबाद की उच्च अदालत ने मनुस्म्रति और दत्तक मीमांसा आदि ग्रंथों का अध्ययन कर बताया था कि क्या उसे हम हिन्दु धर्म का ‘आवश्यक भाग’ कह सकते हैं। दूसरे गाय की हत्या को लेकर मोहम्मद हनीफ कुरेशी बनाम बिहार राज्य सरकार मामले पर गौर करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कुराण की जांच करके देखा था कि क्या गोहत्या इस्लाम धर्म का आवश्यक हिस्सा है या नहीं। दोनों ही मामलों में वे काम धर्म का आवश्यक हिस्सा नहीं समझे गए थे।

गौतम भाटिया बताते हैं कि दो अन्य वजहों से भी टरस्ट के प्रबंधन की याचिका कमजोर दिखती है, जिसमें उसने ‘महिलाओं के अनुचित पोशाक पहनने’ या उनकी ‘सुरक्षा’ की दुहाई देते हुए यह तर्क दिया है, जिसका सम्बन्ध भी ‘सारभूत धार्मिक आचारों’ से नहीं है।

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