धर्मांतरण पर रोक पूर्णतः असंवैधानिक कदम है

2:40 pm or May 8, 2015
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—- अलका गंगवार—-

भारतीय जनता पार्टी एवं संघ के विचारक राकेश सिन्हा समय-समय पर इलेक्ट्रनिक मिडिया पर आने वाली बहसों पर यह मुद्दा उछालते रहते है कि घर वापसी का विरोध करने वाले दल धर्मान्तर विरोधी अधिनियम लाने पर संघ परिवार एवं बीजेपी का समर्थन क्यों नही करते है? इन बुद्धिजीवियों का यह विलाप रहता है कि इस देश में बहुसंख्यक धर्मांवलंबी धर्मान्तरण विरोधी अधिनियम लाना चाहता है, लेकिन अल्पसंख्यक वर्ग हमेशा इसका विरोध करते है। यदि इसका गहन विश्लेषण किया जाये तो आप इस निष्कर्ष पर आयेगे कि समाज शास्त्र का यह नियम भी विज्ञान के नियमों के अनुरूप है कि, किसी भी समुदाय में अल्पसंख्यक वर्ग ही धर्मांतरण पर रोक की मांग करता है। संघ ओर भाजपा एक दूसरे अनुषांगिक अंग है। संघ जिस हिन्दु धर्म की बात करता है, वह वैदिक धर्म एवं सनातनी धर्म के उस वर्ग का संकुचित मानस वाला धर्म है, जिसका प्रतिनिधित्व अल्पसंख्यक उच्च वर्ग के हिन्दु करते है जो मात्र हिन्दु समुदाय के 20 फीसदी ही है, शेष 80 प्रतिशत जिसमे दलित, आदिवासी एवं अन्य पिछडा वर्ग की जातियां आती है के सदस्य की गणना शूद्र वर्ग में की जाती है जोकि हिन्दु धर्म में बहुसंख्यक है और इस बहुसंख्यक वर्ग की मानव गरिमा एवं मौलिक अधिकारों के विषय में वेदों से लेकर मनुस्मृति तक एवं महाभारत, रामायण जैसे धार्मिक ग्रन्थों में जो स्थान दिया गया है, वह मानवता को शर्मसार करने के घोर स्तर तक है।

हिन्दु समाज का अल्पसंख्यक वर्ग जो मनुवादी व्यवस्था का समर्थक है, धर्मान्तरण विरोधी अधिनियम लाना चाहता है, ताकि हिन्दु समाज के वे बहुसंख्यक जिन्हे शूद्र श्रेणी में रखा गया है अपने इस मौलिक अधिकार से वंचित है कि वे इस जीवन में मानवीय गरिमा और सम्मान प्राप्त कर सकें। धर्मान्तरण के समर्थन में उतरे बुद्धिजीवी एवं साधु सन्याशी सभी जिस गौरवशाली हिन्दु परम्परा की रक्षा की बात करते है जो और कुछ नही मनुस्मृति की समाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था है।

मनुस्मृति के श्लोंक 1-91 के अनुसार समाज में बहुसंख्यक वर्ग जिसे शूद्र कहां गया है के बारे में व्यवस्था दी गई है कि:-

एकमेव तू शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत।

एतेषामेव बर्षाना शूद्रपालनसूदया।।

(प्रभु ने शूद्रो केा केवल एक ही कर्म करने का ओदश दिया ओर वह यह कि वह उपरोक्त तीनों वर्गो ब्राहम्ण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा किया करे) अर्थात न विधा न शस्त्रवहन ओर न धनवल। शूद्र का बल, मान तीन वर्गों की सेवा विचार शूद्र के लिए एक ही आदेश है कि वह सभी की सेवा करें ओर किसी की सेवा न ले। और विचारे ब्राहम्ण के लिए एक ही आदेश है कि वह सभी की सेवा ले और किसी की सेवा न करें। ऊपर से यह तर्क है किः-

य तु कर्माणि यास्मिस न्ययुक्त प्रथमप्रभुः।

स तदैव स्वयं भेज सृत्यमानः पुनः पुनः।।

(ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ मे जिस प्राणी को जिस कर्म में नियुक्त किया वह बार बार जन्म लेकर भी अपने उसी कर्म को करने लगा अर्थात आपके कर्म ईश्वर ने आपके जन्म से बांध दिया है ओर आपकी नियति है कि वे निरंतर करते रहे, यदि आपने उसे बदलने का प्रयास किया तो अधर्म हो जायेगे।)

मनुस्मृति मे राजा (राज्य) के प्रथम कर्तव्य के लिए लिखा गया है किः-

वैश्य शूद्रो प्रयत्नेन स्मानि कर्माणि भरयेत्।

तो हि च्युतो स्वकर्मण्य शोभयतेपिडजगत।।

(यानि वैश्य ओर शूद्रों से प्रयत्न पूर्वक उनके लिए निश्चित किये गये कार्य कराये। यदि वे दोनों अपने कर्मों से विचलित हो जाये तो सारे जगत में उथल पुथल मच सकती है।)

इन्हीं  सूत्रों से प्रेरणा लेकर आज की मोदी सरकार के गृहमंत्री अल्पसंख्यक आयोग की बैठक में अल्पसंख्यक संस्था ईसाईयों केा चेतावनी दे रहे है थे कि धर्मान्तरण रोक पर वे पहल करें, क्योंकि यदि शूद्रों ओर विशेषकर दलित, आदिवासी ने धर्मान्तरण कर लिया तो अल्पसंख्यक मनुवाले हिन्दुओं की व्यवस्था पर गहरी चोट लगेगी। मनुस्मृति में व्यवस्था है कि राजा का कर्तव्य है कि वह शूद्रों के उनके कर्में में परिवर्तन न होने दे। राजा दलितों को दलित बनाये रखने के लिए है जिस बात की पुष्टि मनुस्मृति के श्लोक 7-35 से होती है।

स्वे स्वे धर्मे निविष्टानां सवेषामनुपूर्वशाः।

वर्णानामात्रमांग च राजा सृष्टोडभिरषिता।।

(अपने अपने धर्मो मे स्थित रहने वाले सभी वर्ण और आश्रमों की रक्षा करने के लिए ब्रम्हा ने राजा की सृष्टि की है)

स्पष्ट है कि संघ के लोगेां का यह दुष्प्रचार की लोग लोभ या लालच से धर्मान्तरण करते है निहायत बेहुदा विश्लेषण है। यर्थाथ यह है कि वे वर्ग या व्यक्ति जिनकों हिन्दु धर्म में निम्न दृष्टिी से देखा जाता था ओर आज भी उनके लिए हिन्दु धर्म में अपनी मानवीय गरिमा प्राप्त करने का कोई अवसर नहीं है और यही वह तबका है जो अपनी मानवीय गरिमा और सम्मान के लिए हिन्दु धर्म त्यागता है। संविधान में प्रत्येक व्यक्तियों को यह मौलिक अधिकार है कि वह अपनी गरिमा एवं विकास के लिए अपने विवेक से किसी धर्म को अपनाये या त्याग करें। धर्मान्तरण विरोधी बिल संविधान द्वारा प्रदत्त धारा 25 के अंतर्गत स्वतंत्रता पर कुठाराघात होगा। संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि धर्म ओर उपासन की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा ओर अवसर की समानता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा बढाने के लिए संविधान का निर्माण किया गया है। यदि किसी व्यक्ति या समूह को यह लगता है कि वह वर्तमान धर्म के अंतर्गत अपनी गरिमा एवं समान अवसर सुरक्षित नहीं है या उन्हें प्राप्त करने में इस धर्म की परम्परा या इतिहास अडचन पैदा करता है तो उसे उस धर्म का त्याग करने अन्य धर्म को अंगीकार करने की स्वतंत्रता संविधान की प्रस्तावना देती है जिसे भारत के लोगों ने बनाया है न कि संघ परिवार ने। अतः संघ के विचारकों का यह आरोप की हमारे देश में बहुसंख्यक वर्ग धर्म विरोधी कानून लाना चाहता है, और अल्पसंख्यक वर्ग इसका विरोध करता है सही नहीं है क्योंकि धर्मान्तरण रोकने की कोशिश हमारे यहां भी वह अल्पसंख्यक हिन्दु वर्ग करता है जो मनुवादी व्यवस्था का समर्थक है और नहीं चाहता है कि उसकी जकड़न से बहुसंख्यक दलित हिन्दु वर्ग उससे बाहर चला जाये। स्पष्ट है कि धर्मान्तरण का विरोध या विवाद हिन्दु धर्म के भीतर है न कि हिन्दु बनाम मुस्लिम या क्रिश्चन है। हिन्दु धर्म का  अल्पसंख्यक वर्ग चाहता है कि संविधान के द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों की प्राप्ति हेतु यदि कोई दलित या आदिवासी या पिछडा वर्ग यदि हिन्दु धर्म छोडकर ईसाई या मुसलिम बनना चाहता है तो उस पर रोक लगा दी जाये।

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