और कितनी अरूणा शानबाग ?

3:11 pm or May 26, 2015
aruna then n now

—-अंजलि सिन्हा—-

अस्पताल के ही एक वार्डबाॅय – सोहनलाल वाल्मिकी – के हाथों बर्बर यौन अत्याचार की शिकार रही अरूणा शानबाग – जो मुंबई के विख्यात किंग एडवर्ड मेमोरियल हास्पिटल में, विगत 42 साल से कोमा में पड़ी थी, वह नहीं रही। अभी पिछले सप्ताह ही उसे न्यूमोनिया की शिकायत हुई थी और उसे वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया था, रविवार को उसकी तबीयत में थोड़ा सुधार हुआ था, मगर सोमवार को /18 मई/ सुबह तबीयत अधिक बिगड़ गयी और उसने अंतिम सांस ली।

एशिया के सबसे बड़े सार्वजनिक अस्पताल कहे गए उपरोक्त अस्पताल के वार्ड नं 4 ए के बिस्तर पर पड़ी अपनी इस पूर्वसहयोगी की नर्सों और डाक्टरों ने ही परिवार के एक सदस्य के तौर पर देखभाल की थी और अपने इस मानवीय व्यवहार के लिए दुनिया की प्रशंसा की हकदार बनी थीं। इन्हीं नर्सों ने और अरूणा के चन्द परिवारजनों ने उसका अंतिम संस्कार किया।

अरूणा इस बात को कभी जान नहीं सकी कि उसी के केस को लेकर तथा काम के हालात में बेहतरी तथा सुरक्षा को लेकर नर्सों की ऐतिहसिक हड़ताल हुई थी। बयालीस साल के इस अन्तराल में दो बार ऐसे मौके आए जब बाॅम्बे मुनिसिपल कार्पोरेशन ने अरूणा को वहां से हटाना चाहा, मगर नर्सों के प्रतिरोध के कारण दोनों ही दफा उन्हें अपनी योजना को मुल्तवी करना पड़ा।

अरूणा इस अवस्था में कैसे पहुंची ?

वह 1973 का प्रसंग है जब अस्पताल के बेसमेण्ट में अपने कपड़े बदलने गयी अरूणा के साथ वार्डबाय ने अत्याचार किया था, उसने उसके गले में कुत्ते का पटटा बांधा ताकि वह चिल्लाए नहीं, जिसके चलते ब्रेन को आक्सिजन की आपूर्ति रूक गयी थी और वह कोमा में गयी थी। उस वक्त 25 साल उम्र की अरूणा की कुछ समय बाद ही एक डाक्टर से शादी होने वाली थी, जो उसी अस्पताल से एम डी कर रहा था। वार्ड बाॅय पर लूटपाट और डकैती के आरोप लगे थे और वह सात साल की सज़ा पाकर छूट गया था। उसे तथा उसके होने वाले पति को किसी तरह की सामाजिक बदनामी से बचाने के नाम पर अस्पताल प्रबंधन ने गुदद्वार से मैथुन के आरोप को प्रथम सूचना रिपोर्ट में दर्ज नहीं किया था, अगर वह दर्ज किया होता तो अभियुक्त को और दस साल की सज़ा मिलती। सोहनलाल जेल की सज़ा भुगत कर लौट आया और जानकारों के मुताबिक नाम बदल कर वह दिल्ली के किसी अस्पताल में काम कर रहा है, मगर दस मिनट के उस अत्याचार की निशानियों को अरूणा कभी ‘भूल नहीं सकीं।’

अरूणा के इस अवस्था में पड़े रहने को लेकर चर्चित लेखिका पिंकी विरानी – जिन्होंने उसके जीवन पर एक किताब लिखी थी ‘अरूणाज स्टोरी – उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका डाली कि अरूणा को इच्छाम्रत्यु मिले। मालूम हो कि इच्छाम्रत्यु अर्थात यूथेनेशिया को लेकर भारत में लम्बे समय से बहस चल रही है। यूं तो अदालत ने उस याचिका को खारिज किया मगर अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में पैसिव यूथेनेशिया की इजाजत थी अर्थात अगर यह पता चले कि मरीज कोमा में है और कभी बाहर नहीं निकलेगा तो उसकी लाइफ सपोर्ट सिस्टम बन्द करके इस काम को अंजाम दिया जा सकता है।

अरूणा कभी भी उसके साथ क्या हुआ उसे बयां नहीं कर सकी और 42 साल तक वैसे ही घुलती रही।

यौन हिसा के सन्दर्भ में यह मौन कोई अपवाद नहीं है।

अत्याचार की छवियों को मन में जिन्दगी भर ढोना अपवाद है ?

भले ही अरूणा जैसी कोमा की स्थिति में बहुत कम लोग जाते हों, मगर क्या यह बात सच नहीं कि तमाम महिलाएं, बच्चियां उन्हें जिस यौन प्रताडना को आए दिन झेलना पड़ता है, उन्हें किसी आत्मीय के हाथों अत्याचार का शिकार होना पड़ता है, उसके बारे में चाह कर भी कभी बोल नहीं पाती। कभी बदनामी का डर तो कभी अन्य कोई मजबूरी के चलते वह अन्दर ही अन्दर घुलती रहती है।

यौन अत्याचार के मसले की व्यापकता का अन्दाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि कोई दिन ऐसे नहीं बीतता जब ऐसी घटनाएं सरकार एवम पूरे समाज के पैमाने पर चिन्ता का कारण न बनती हो। राष्ट्रीय महिला आयोग में उपलब्ध आंकडों केे अनुसार हर साल बीस हजार महिलाएं बलात्कार की शिकार हो रही हंै। पीछे की तुलना में आंकड़ें बढ़े हैं। सभी को यह भी पता है कि ऐसे अपराध के केस जो दर्ज होते हैं उनकी तुलना में कई गुणा अधिक आंकड़े होते हैं। अगर दिल्ली की ही बात करें तो हर साल यहां पांच सौ से छह सौ तक बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं और देश भर में यह आंकड़ा ग्यारह हजार को पार करता है। सन 2002 के ‘इंडिया टुडे’ के अंक में एक सर्वेक्षण के आधार पर खुलासा किया गया था कि हर 35 मिनट में एक औरत बलात्कार की शिकार होती है।

दरअसल हमारे यहां यौन अत्याचार की जांच को लेकर जो व्यवस्था है और अदालती प्रक्रिया भी जितनी लम्बी खींचती है, जिसके चलते भी कई बार लोग पुलिस के पास जाना मुनासिब नहीं समझते । आम तौर पर यह भी होता है कि जो दबंग है, राजनीतिक रसूख वाला है, वह कभी सज़ा पाता ही नहीं। अगर अत्याचारी प्रभावशाली हो तो कानूनी प्रक्रियाओं में ऐसे छेद हैं जिनका फायदा आरोपी उठा लेते हैं, जैसेकि कलमबन्द बयान जो पीडि़ता से लिया जाता है और जो केस को आगे चलाने के लिए जरूरी होता है, वही देरसे लेना तथा इस बीच पीडि़त पक्ष को डराने-धमकाने, लालच देने आदि का मौका मिल जाता है। कई मामलों में तो यह भी होता है कि मेडिकल परीक्षण में बलात्कार की पुष्टि हो जाने के बाद भी, विभिन्न परिस्थितिजन्य सबूतों के बावजूद भी पीडि़ता के विरोधाभासी बयानों के आधार पर आरोपी छूट जाता है।
यौन अत्याचार की जांच को लेकर आज भी जारी असंवेदनशील तरीकों पर, पीडि़ता को ही अपमानित करने के तरीकों पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। कुछ साल पहले ‘हयूमन राईटस् वाॅच’ नामक संगठन द्वारा तैयार की रिपोर्ट, ‘डिग्निटी आन ट्रायल’ जो यौन अत्याचार पीडि़तों के परीक्षण में सन्तुलित पैमाने बनाने की जरूरत पर केन्द्रित थीै, प्रकाशित हुई थी। यौन अत्याचार अन्वेषण के तरीकों में आज भी मौजूद मध्ययुगीन पैमानों को उजागर करती प्रस्तुत रिपोर्ट ने इस विचलित करनेवाले तथ्य को पेश किया था कि किस तरह आज भी अदालती फैसलों या उसकी पूर्वपीठिका बनती अदालती कार्रवाइयों में पीडि़ता के चरित्रा/चाल-चलन या उसके यौनिक अनुभव का मसला आज भी परोक्ष/अपरोक्ष रूप से विद्यमान है, जिसको लेकर तीस साल पहले ही लम्बे संघर्ष के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने दिशानिर्देश दिए थे। इतनाही नहीं पीडि़ता की मेडिकल जांच के नाम पर आज भी यह सिलसिला जारी है जिसके तहत डाॅक्टर पीडि़ता के यौनांग की जांच करके यह प्रमाणपत्रा जारी करता है कि वह ‘सहवास की आदी’ थी या नहीं, फिर जिसे मुकदमे में एक प्रमाण के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है।
यह ऐसी तमाम बातें है जो पीडि़ता को कानून का सहारा लेने से दूर ढकेलती हैं।

अन्ततः अरूणा के इस ‘मौन’ को, अपने साथ हुए अत्याचार की छवियां 42 साल तक साथ ढोने को हम रूपक के तौर पर भी देख सकते हैं: बलात्कार एक मात्रा ऐसा अपराध है जहां पीडि़त को ही आम तौर पर कटघरे में खड़ा किया जाता है और अत्याचारी शान से घुमता है। यह इसी वजह से सम्भव होता है कि पुरूषप्रधान समाज में औरत को शरीर तक या यौनांगों तक ही सीमित किया जाता है और इस बात को स्त्रिायां भी आत्मसात कर लेती हैं। यौनशुचिता की इस विचारधारा में अगर किसी गैर के हाथों शरीर का उल्लंघन हो तो वह उस युवती के लिए कुफ्र से कम नहीं होता अस्मत लूटी गई’ कह कर इसी बात को ही प्रमाणित किया जाता है। और वह अपन ेसाथ हुए अत्याचार को कभी भूल नहीं पाती।

एक अलग सन्दर्भ मंे उन स्त्रिायों के लिए भी – जो भले ही यौनशुचिता की विचारधारा के स्वीकारते नहीं हो – उनके साथ भी ऐसे अत्याचार की छायायें जिन्दगी भर चलती रहती हैं क्योंकि उनकी इजाजत के बिना उनके शरीर का उल्लंघन हुआ होता है, उनकी स्वायत्तता का उल्लंघन हुआ होता है।

पता नहीं कब तक हमें ‘अरूणा शानबाग’ जैसी तमाम त्रासदियों का मूकदर्शी होना पड़ेगा ?

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