मेगी नूडल्स से कमजोर हाेता देश का भविष्य

1:02 pm or May 28, 2015
maggi

—- डॉ. महेश परिमल—-

बहुत अच्छी लगती है मेगी। तुरंत बन भी जाती है। आधुनिक मांओं को इससे अधिक चाहिए भी क्या? वे तो यह भी नहीं जानती कि मेगी के पेकेट में यह भी लिखा है कि बच्चे को मेगी खिलाने के पहले उसे पौष्टिक चीजें भी खिलाना न भूलें। बच्चे भी जब घर में अकेले होते हैं, तब भूख लगने पर मेगी ही खाते हैं। बरसों से खा रहे हैं। लेकिन अब जाकर पता चला कि इस समय जो मेगी बाजार में है, वह खाने योग्य नहीं है। उसमेंे सीसे की मात्रा बहुत ही अधिक है। इधर उत्तर प्रदेश सरकार ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया है। महाराष्ट्र सरकार मेगी के नमूनों की जांच कर रही है। पर दूसरी ओर इस बनाने वाली नेस्ले कंपनी अपना एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। निर्णय चाहे जो भी हो, पर सच तो यह है कि मेगी ही नहीं, इस समय मिलने वाले तमाम फास्ट फूड बच्चों के लिए घातक हैं। पर टीवी विज्ञापनों के चलते, सरकार की सुस्ती के चलते और पालकों की अज्ञानता के चलते यह सब हो रहा है। इसका खामियाजा भुगत रहा है देश का भविष्य। इसलिए आजकल बच्चों में मोटापा, चिड़चिड़ापन बढ़ता जा रहा है। लोगों का जब तक इस दिशा में ध्यान जाएगा, तब तक काफी देर हो जाएगी। काफी समय से यह देखा जा रहा है कि बच्चे मेगी नूडल्स खाने के बाद और कुछ नहीं खाते। मेगी का स्वाद उनकी जीभ में ऐसे रच-बस जाता है कि दूसरी कोई चीज उन्हें अच्छी लगती ही नहीं। वे बार-बार मेगी नूडल्स की ही मांग करते हैं। मेगी नूडल्स के सभी उपभोक्ताओं के लिए यह चौंकाने वाली खबर है कि बच्चों को इसका आदी बनाने के लिए उसमें मोनोसोडियम ग्लुटेमेट (MSG) नामक हानिकारक रसायन िमलाया जाता है। आज की मम्मियों के लिए मेगी नूडल्स किसी आशीर्वाद से कम नहीं है। बच्चे ने जहां जिद की, भूख लगी है मम्मियां तुरंत ही मेगी बनाकर दे देती हैं। यह केवल दो मिनट में बिना किसी ड्रायफ्रूट के बन भी जाता है। बनाने में भी कोई झंझट नहीं। वे किसी तरह की पौष्टिक खुराक अपने बच्चों को देना ही नहीं चाहती। शायद उन्हें भी नहीं मालूम कि किस तरह से मेगी नूडल्स में जहरीला साीसा आवश्यकता से अधिक मात्रा में मिलाया जा रहा है। यदि मांओं को सचमुच अपने बच्चों के स्वास्थ्य की चिंता है, तो उन्हें मेगी देना बंद कर देना चाहिए। ताकि बच्चे दूसरी पौष्टिक चीजें खाकर अपनी सेहत में सुधार लाएं। उत्तरप्रदेश के फूड इंस्पेक्टरों ने राज्य के विभिन्न स्थानों में मिल रहे मेगी नूडल्स के दो दर्जन नमूने इकट्‌ठे किए। उसकी वैज्ञानिक जांच सरकारी लेबोरेटरी में की गई। जाँच की रिपोर्ट चौंकाने वाली थी। उसमें सीसे की मात्रा 17.2 पीपीएम था। जबकि इसकी मात्रा 0.1 होनी थी। मेगी नूडल्स में हानिकारक मात्रा में मोनोसोडियम ग्लुटेमेट का भी इस्तेमाल किया गया था। यह रसायन यदि पेट में चला जाए, तो उसे सरदर्द, बेचैनी, पेट में गड़बड़, कमजोरी आदि तकलीफें हो सकती हैं। उत्तर प्रदेश के खाद्य निरीक्षकों ने जितने भी नमूने लिए, सभी के यही हाल थे। नमूनों का एक बार नहीं, बल्कि कई बार परीक्षण किया गया। हर बार परिणाम वही आया। इससे स्पष्ट है कि मेगी नूडल्स हमारे देश के भविष्य के स्वास्थ्य के साथ किस तरह से खिलवाड़ कर रहा है। उत्तर प्रदेश में जिन नमूनों को इकट्‌ठा किया गया, उसमें कई नमूनों की एक्सपायरी डेट भी निकल चुकी थी, लेकिन वे बाजार में खुलेआम बिक रहे थे। उत्तर  प्रदेशके फूड एवं ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने पूरे देश क मेगी नूडल्स के पेकेट वापस लेेेेेेेेेेने की मांग की है। मेगी नूडल्स के खिलाफ अब देश भर में माहौल बनने लगा है। वाट्स एप्प में भी इसके खिलाफ संदेशों का आदान-प्रदान हो रहा है। अब तो इसके बहिष्कार के माँग भी उठने लगी है। दूसरी तरफ नेस्ले कंपनी भी अपने बचाव में आ गई है। इस संबंध में कंपनी के डायरेक्टर का कहना है कि मेगी के नमूनों में जो एमएसजी मिला है, वह प्राकृतिक होना चाहिए। एमएसजी केवल टमाटर और चीज जैसे पदार्थों में अल्प मात्रा में होता है। इसलिए नेस्ले का खुलासा गले नहीं उतर रहा है।  नेस्ले कपनी अपने उत्पादों के विज्ञापनों पर करोड़ों रुपए खर्च करती है। टीवी पर चलने वाले बच्चों के तमाम धारावाहिकों पर मेगी नूडल्स के विज्ञापन अनजाने में ही बच्चों के मस्तिष्क में असर डालते ही रहते हैं। विज्ञापनों में माॅडल के रूप में माधुरी दीक्षित को भी शामिल किया गया है। बच्चे ही नहीं, इससे तो मांएं भी प्रभावित होती हैं। वे अपने बच्चों को मेगी नूडल्स देती हैं, ताकि उनके बच्चे भी माधुरी दीक्षित के बच्चों की तरह हो सकें। बच्चे इसके आदी हो जाते हैं, वे बार-बार मेगी नूडल्स खाने की जिद करते हैं। यही कारण है कि वे अन्य कोई खाद्य सामग्री ग्रहण नहीं करते। इसका कारण उसमें डाला गया मोनाेसोडियम ग्लूटेमेटे नामक रसायन है। जिस तरह से देश में चीनी उत्पादों पर प्रतिबंध लगाया गया है, उसी तरह मेगी पर भी देश में प्रतिबंध लगाया जाए, तो देश के भविष्य का स्वास्थ्य अच्छा होगा, ऐसा कहा जा सकता है। स्वास्थ्यप्रद आहार उसे ही कहा जाता है, जिसमें स्टार्च के अलावा फाइबर, विटामिन्स, चर्बी, प्रोटीन आदि का समावेश हो। मेगी में केवल स्टार्च होता है, पर फाइबर या अन्य विटामिन्स नहीं होते। मेगी के पेकेट में यह लिखा होता है कि बच्चों को नूडल्स के साथ फल एवं दूध आदि भी अवश्य दें। पर देश की मांओं को इतनी फुरसत है कहाँ,जो पेकेट में लिखी इबारत को पढ़े। कई बार नाश्ते ही नहीं, भोजन में भी मेगी ही परोसकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती हैं। डायटीशियन के अनुसार मेगी के 100 ग्राम के पेकेट में 402 कैलोरी होती है। एक आम बच्चे को रोज 1800 से 2000 कैलोरी की आवश्यकता होती है। यदि बच्चा रोज मेगी के दो पेकेट ग्रहण करता है, तो उसे उससे 800 कैलोरी मिल जाती है। इससे अधिक मेगी खाने वाले बच्चे मोटापे का शिकार हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश के फूड एवं ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने अपना कर्तव्य निभाते हुए अपनी रिपोर्ट दिल्ली स्थित फूड सेफ्टी एवं स्टैंडर्ड अथारिटी ऑफ इंडिया को भेजते हुए यह मांग की है कि इस पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। इस प्रतिबंध को टालने के लिए नेस्ले कंपनी ने अपने प्रयास शुरू कर दिए हैं। वह एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। अब देखना यह है कि जीत किसकी होती है। देश के बच्चों के स्वास्थ्य की या फिर नेस्ले कंपनी के प्रयासों की।

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