अरुणा ! हम पर लानत है……

4:32 pm or May 29, 2015
aruna then n now

—-डाॅ. गीता गुप्त—-

18 मई 2015 को अरुणा शानबाग का देहान्त हो गया। मुम्बई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में  नर्स के रूप में  कार्यरत् अरुणा की मौत वैसे तो 42 वर्ष पूर्व तभी हो गई थी, जब वार्ड बाॅय ने 27 नवम्बर 1973 की रात उनके साथ जघन्य दुराचार किया। अस्पताल में  ड्यूटी पूरी कर घर जाने से पहले कपड़े बदलने के लिए वे बेसमेण्ट में  गयीं। वहाँ पहले से छिपे बैठे वार्ड बॉय  सोहन लाल भरथा वाल्मीकि ने अरुणा के गले में  कुत्ते बाँधने वाली चेन लपेटकर उनके साथ न केवल दुष्कर्म किया बल्कि उन्हें  जान से मारने की भी कोशिश की। 28 नवम्बर को भरथा गिरफ़्तार कर लिया गया। मगर आश्चर्य कि उस पर दुष्कर्म का नहीं बल्कि हरया की कोशिश और कान की बाली चुराने का केस चला। अतएव सात साल की सज़ा के बाद वह बरी हो गया।

मगर अरुणा उम्रक़ैद की सज़ा भुगतती रहीं। जीने का अधिकार उनसे छिन गया और मरने का हक़ भी नहीं मिल सका। 29 नवम्बर 1973 को उनकी आँखों की रोशनी चली गई। पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो गया और सुनने की क्षमता भी खो बैठीं। 24 वर्षीया अरुणा दिसम्बर 1973 में  अपने ही अस्पताल के डाॅ. संदीप सर-देसाई के साथ दाम्पत्य सूत्र में  बँधने वाली थीं। किन्तु नियति ने उन्हें  इस सौभाग्य से वंचित कर जि़न्दगी ही नहीं, मौत क भी मोहताज़ बना दिया। दुष्कर्म की हृदय-विदारक घटना के बाद अरुणा 42 वर्षों तक कोमा में  रहीं। दुनिया में  सबसे ज्य़ादा समय तक कोमा में  रहने का दुर्भाग्य उनके नाम हो गया। इतनी लम्बी अवधि तक मृत्यु के लिए प्रतीक्षारत् अरुणा भारत की सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय चेतना पर प्रश्नचिन्ह लगा गईं।

भारत में  न्यायपालिका इतनी उदार, क़ानून इतने लचर और न्याय-व्यवस्था इतनी शिथिल है कि एक साधारण, निर्दोष व्यक्ति मिलने की उम्मीद नहीं रख सकता। जबकि एक आरोपी क़ानून के चंगुल से वर्षों बचा रह सकता है। इस देश में  वर्ष 1992 में  राष्ट्रीय महिला आयोग अस्तित्व में  आया। वर्ष 1993 में  राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन हुआ। अन्तर राष्ट्रीय महिला वर्ष मनाने की भी यहाँ शुरूआत वर्ष 1975 में  हुई। फिर भी किसी संगठन ने अरुणा की सुध नहीं ली। आज तो फ़ैमिनिस्ट कहलाना और फ़ैमिनिज़्म पर बात करना फ़ैशन-सा हो गया है ; मगर इन स्त्रीवादियांे में  अरुणा के हक़ के लिए कभी आवाज़ नहीं उठाई। वर्ष 1980 में  जब अस्पताल-प्रशासन ने उन्हें  घर ले जाने का आदेश दे दिया तो नर्सों ने तीन दिन तक हड़ताल की। अन्ततः अस्पताल-प्रशासन को झुकना पड़ा। नया आदेश जारी करना पड़ा कि अरुणा वहीं रहेंगी। सचमुच, उन नर्सों के कारण ही अरुणा को आश्रय मिल सका अन्यथा परिवार ने तो उन्हें  भुला ही दिया था। तीन भाई-बहनों  में  सबसे छोटी अरुणा, जो मानवता की सेवा के लिए परिचारिका के पेशे में  आईं ; परिजन ने उन्हें  नहीं अपनाया। न्यायालय द्वारा भेजे गए पत्र तक उनके भाई-बहन ने नहीं स्वीकारे। परिजन इतने भी निर्मम हो सकते हैं, यह सोचकर दिल दहल जाता है।

वर्ष 1998 में  पिंकी विरानी ने पुस्तक ‘अरुणा की बात’ लिखी। उन्हांेने ही वर्ष 2009 में  अरुणा के लिए सर्वोच्च न्यायालय में  इच्छा-मृत्यु की अजऱ्ी लगाई। जिस पर दो साल तक बहस चलती रही। 7 मार्च 2011 को न्यायालय ने इच्छा-मृत्यु की माँग ख़ारिज़ कर दी, पर फ़ैलता दिया कि परिजन चाहें तो जीवित रखने का सपोर्ट सिस्टम हटाया जा सकता है। मगर परिवार कहाँ था ? पिंकी अरुणा की मित्र और एक वकील थीं। न्यायालय ने के.ई.एम. अस्पताल को अरुणा का परिवार बताया और नर्सों ने इच्छा-मृत्यु का पुरज़ोर विरोध करते हुए कह दिया-‘हमारी अरुणा यहीं रहेंगी। जब तक उनका अन्त नहीं आ जाता, तब तक हम उनकी सेवा करेंगे।’ और सचमुच, बयालीस वर्षों तक उनकी सेवा ने दर्द में  डूबी हुई एक जि़न्दगी को सहेजे रखा। निश्चय ही उन नर्सों की सेवा-भावना और अस्पताल-प्रशासन की संवेदनशील हृदयस्पर्शी और प्रशंसनीय है। उन्हें  लाखांे सलाम !

मगर अरुणा शानबाग के बहाने उपजा इच्छा-मृत्यु या दया-मृत्यु का प्रश्न अब भी अनुत्तरित है। वर्ष 2011 में  सर्वोच्च न्यायालम ने पैसिव यूथेनेशिया को मान्यता दे दी और सरकार ने उनके दिशानिर्देशों को क़ानून के रूप में  स्वीकार भी कर लिया। लेकिन वह अधूरा है। इसलिए कि पैसिव यूथेनेशिया ( निष्क्रिय लोगांे के लिए इच्छा-मृत्यु) के तहत किसी रोगी के चिकित्सक और परिजन यदि दया-मृत्यु के पक्ष में  हों तो उन्हें  उच्च न्यायालय में  अर्जी देनी होगी। वहाँ उनका पक्ष सुनने के बाद अन्तिम निर्णय दिया जाएगा। पैसिव यूथेनेशिया में  रोगी के जीवन-रक्षक उपकरण हटा लिए जाते हैं। परन्तु अरुणा की तरण पूर्णतः अक्षम, निष्क्रिय और परिवार द्वारा त्याग दिए गए असहाय पीडि़तांे को इच्छा-मृत्यु का अधिकार कैसे मिल पाएगा ? क्या जीने के अधिकार की तरह व्यक्ति को सम्मान-जनक मृत्यु का अधिकार भी नहीं मिलना चाहिए ? निश्चित रूप से, इच्छा-मृत्यु पर गहन विमर्श आवश्यक है।

यह आशंका निर्मूल नहीं है कि इच्छा-मृत्यु के प्रावधान का दुरुपयोग हो सकता है। चूँकि इच्छा-मृत्यु के विषय में  व्यावहारिक रूप से निर्णय परिजन या रिश्तेदारांे को ही लेना होगा तो मुमकिन है कि चिकित्सा का व्यय-भार वहन करने या सेवा-सुश्रूषा से बचने के लिए ऐसा निर्णय शीघ्रता में  ले लिया जाए। यह भी सम्मभ है कि सम्पत्ति हड़पने के इरादे से कुछ मामलांे में  दुर्भावनावश निर्णय ले लिए जाएँ। इन सबके बावजूद यह प्रश्न बहुत प्रासंगिक है कि जिन व्यक्तियांे के ठीक होने की बिल्कुल सम्भावना न हो, उन्हें  अत्यधिक कष्ट में  जीवित रखना कितना सही है ? आज तो व्यक्ति के जीवन-काल में  ही नेत्र-दान, अंग-दान और देह-दान का संकल्प-पत्र भरने-भरवाने का अभियान छिड़ चुका है ; इसे क़ानूनन वैध माना जाता है। तो क्या इच्छा-मृत्यु के लिए भी संकल्प-पत्र जारी करने का प्रावधान नहीं किया जा सकता ? गम्भीेर असाध्य रोगांे से जूझ रहे मरीज़ांे, अकस्मात् दुर्घटना ग्रस्त असहायांे और अप्रिय हादसांे के शिकार निष्क्रिय लोगांे को दृष्टिगत रखते हुए सरकार को इस दिशा में  ठोस क़ानून बनाना चाहिए।

अरुणा शानबाग को न्याय नहीं मिला। मेरे व्यथित हृदय की कामना है कि उनकी दिवंगत आत्मा को शान्ति मिले और सम्पूर्ण मानव-जागत् में  इतनी सच्ची करुणा का प्रसार हो कि फिर कभी ऐसी त्रासदी की पुनरावृत्ति न हो ! मध्यप्रदेश सरकार ने उनके नाम पर एक लाख रुपए का महिला-सम्मान अपने राज्य में  स्थापित करने की घोषणा की है। महाराष्ट्र के ठाणे में  निर्मित नसिंग शिक्षण-संस्थान भी अरुणा के नाम को समर्पित होगा। मगर उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि अब कोई दुष्कर्मी बच न पाए, उसे अंग-भंग या फाँसी की सज़ा अविलम्ब मिले-इससे कम कुछ नहीं। मगर फिर एक सवाल-ऐसा कब होगा ? क्या सचमुच होगा भी ?

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