राष्ट्रीय विभूतियों पर कब्जा जमाने की संघी कवायद

2:16 pm or June 6, 2015
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—-राम पुनियानी—–

पिछले कुछ वर्षों से, राजनैतिक और सामाजिक स्तरों पर कुछ राष्ट्रीय विभूतियों का महिमामंडन करने और कुछ का कद घटाने के सघन प्रयास हुए हैं। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के पिछले शासनकाल (1998-2004) में संसद परिसर में सावरकर के तैलचित्र का अनावरण किया गया था।

कुछ विभूतियों की भूमिका को बढ़ाचढ़ा कर प्रस्तुत करने और कुछ की छवि बिगाड़ने के खेल में आरएसएस पुराना उस्ताद है, यद्यपि अन्य राजनैतिक समूह भी ऐसा करते रहे हैं। संघ की मशीनरी, कुछ नेताओं का महिमामंडन, कुछ को नजरअंदाज करने और कुछ को बदनाम करने का काम दशकों से करती आई है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से संघ परिवार के कई सदस्य महात्मा गाँधी के हत्यारे गोडसे की खुलकर तारीफ कर रहे हैं। एक भाजपा सांसद ने गोडसे को देशभक्त बताया तो दूसरे ने फरमाया कि गोडसे ने गलत व्यक्ति को निशाना बनाया था। उसे नेहरु की हत्या करनी चाहिए थी। कई लोगों ने माँग की है कि अलग-अलग स्थानों पर गोडसे की मूर्तियाँ स्थापित करने के लिए जमीन आवंटित की जाए।

सरदार पटेल को नेहरु के प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। अपने एक भाषण में मोदी ने कहा कि नेहरु की जगह पटेल को देश का पहला प्रधानमंत्री होना चाहिए था। नेहरु को कलंकित करने का मानों अभियान-सा छेड़ दिया गया है। हाल में, नेहरु को संकुचित मनोवृत्ति वाले व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करने के लिए मोदी ने एक ऐसी बात कही जो कि सच नहीं है। उन्होंने कहा कि नेहरु, सरदार पटेल के अंतिम संस्कार में नहीं गए थे। तथ्य यह है कि नेहरू ने पटेल के अंतिम संस्कार, जो कि मुंबई में हुआ था, में भाग लिया था। जहाँ तक गांधीजी का सवाल है, उन्हें केवल साफ-सफाई के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। महात्मा गाँधी का कद इतना ऊंचा है कि उनके समावेशी राष्ट्रवाद में विश्वास न करने वाले भी उन्हें श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। भारत ही नहीं वरन पूरी दुनिया में बापू श्रद्धा के पात्र हैं। अब चूँकि गांधीजी के कद को कम करना संघ परिवार के बस की बात नहीं है इसलिए उनके हिन्दू-मुस्लिम एकता के सन्देश को दरकिनार कर, राष्ट्रीय एकता की उनकी सीख को भुलाकर, उन्हें केवल स्वच्छता अभियान का शुभंकर बना दिया गया है।

अब संघ परिवार अम्बेडकर पर कब्जा करने की जुगत में है। यह कहा जा रहा है कि अम्बेडकर और आरएसएस के संस्थापक हेडगेवार की आस्था एक-से मूल्यों में थी। उदाहरण के लिए, दोनों अस्पृश्यता के खिलाफ थे। आरएसएस के अंग्रेजी और हिंदी मुखपत्र क्रमश: ‘‘आर्गनाइजर’’ व ‘‘पाञ्चजन्य’’ ने अंबेडकर पर केंद्रित विशेष परिशिष्ट निकाले, जिनमें उनकी शिक्षाओं को इस तरह से तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि आरएसएस की हिंदुत्व की विचारधारा और अंबेडकर के मूल्यों में अनेक समानताएं हैं। अंबेडकर ने सामाजिक न्याय और प्रजातांत्रिक मूल्यों की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान तो दिया ही था, उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी जाति के उन्मूलन के लिए उनका संघर्ष। यहां यह याद रखना समीचीन होगा कि जहां अंबेडकर जाति के उन्मूलन की बात कहते थे, वहीं संघ ने ‘सामाजिक समरसता मंच‘ की स्थापना की है, जो विभिन्न जातियों के बीच ‘समरसता‘ के लिए काम करता है। यह संस्था जाति की अवधारणा को चुनौती नहीं देती और ना ही जाति के उन्मूलन की बात करती है, जो कि अंबेडकर के प्रिय लक्ष्य थे।

संघ परिवार जो कवायद कर रहा है, उसके दो स्पष्ट उद्देश्य हैं। चूंकि आरएसएस ने कभी देश की स्वाधीनता की लड़ाई में हिस्सेदारी नहीं की इसलिए उसके पास खुद का कोई स्वाधीनता संग्राम सेनानी है ही नहीं। यही कारण है कि उसे सावरकर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के मिथक को गढ़ना पड़ा। सावरकर ने अपने जीवन के शुरूआती दौर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ काम किया था परंतु अंडमान के सेल्युलर जेल में कुछ दिन सजा काटने के बाद वे ब्रिटिश-विरोधी क्रांतिकारी की जगह अंग्रेज सरकार के समर्थक बन गए। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से लिखित माफी मांगी और फिर कभी किसी ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया। आरएसएस का सावरकर के सिवा ऐसा कोई भी नेता नहीं है, जिसने अंग्रेजों का तनिक भी विरोध किया हो। वैसे तो सावरकर भी आरएसएस के सदस्य नहीं थे यद्यपि उनका और संघ का उद्देश्य एक ही था-हिंदू राष्ट्र की स्थापना।

संघ परिवार के कई सदस्य गोडसे के प्रति श्रद्धा रखते हैं और उसे एक महान विभूति मानते हैं। गोडसे ने आरएसएस की शाखाओं में प्रशिक्षण प्राप्त किया और बाद में हिंदू महासभा की पुणे इकाई का सचिव बन गया। चूंकि कई भाजपा नेताओं ने भी खाकी हाफपेंट पहनकर आरएसएस की शाखाओं में भाग लिया है इसलिए वे गोडसे और अपनी हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा में कई समानताएं पाते हैं और गांधीजी के हत्यारे के प्रशंसक हैं। सावरकर और गोडसे के प्रतीकों का उपयोग वे हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाने के लिए करते हैं। हिंदू राष्ट्रवाद, उस भारतीय राष्ट्रवाद से बिलकुल भिन्न है जो कि भारतीय संविधान की बुनियाद है। ऐसा करना उनके लिए इसलिए जरूरी है क्योंकि वे स्वयं को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी सिद्ध करना चाहते हैं। यह, इस तथ्य के बावजूद कि उनका राष्ट्रवाद, हिंदू राष्ट्रवाद है, भारतीय राष्ट्रवाद नहीं। वे सावरकर की शुरूआती ब्रिटिश-विरोधी गतिविधियों को बढ़ाचढ़ा कर प्रस्तुत कर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहते हैं जबकि सच यह है कि सावरकर ने अपनी जेल यात्रा के बाद से स्वाधीनता संग्राम से दूरियां बना लीं थीं और आरएसएस का तो स्वाधीनता आंदोलन से कोई लेनादेना ही नहीं था।

इसके साथ-साथ, संघ परिवार पटेल और नेहरू को एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। उद्देश्य है नेहरू के कद को छोटा करना। पटेल और नेहरू एक-दूसरे के निकट सहयोगी थे; दोनों महात्मा गांधी के अनुयायी थे और दोनों ने मिलजुल कर राष्ट्रीय आंदोलन में हिस्सेदारी की और बाद में स्वाधीन भारत के पहले मंत्रिमंडल में एक साथ काम किया। दरअसल, आरएसएस, नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान धर्मनिरपेक्षता के प्रति उनकी असंदिग्ध प्रतिबद्धता और फिरकापरस्ती से किसी स्थिति में समझौता न करने की उनकी नीति को कभी पचा नहीं सका। वे पटेल को नेहरू का विरोधी सिद्ध करना चाहते हैं जबकि सच यह है कि पटेल भी पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष नेता थे।

आरएसएस अपने कुछ नेताओं की छवि को चमकाना भी चाहता है। संघ के दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर, संघ कार्यकर्ताओं की कई पीढि़यों के प्रेरणास्त्रोत रहे हैं। उनकी पुस्तक ‘‘व्ही ऑर अवर नेशनहुड डिफांइड’’ ने हजारों संघ कार्यकर्ताओं की सोच को आकार दिया है। गोलवलकर, हिटलर की कार्यप्रणाली को उचित मानते थे और हिटलर ने जिस तरह के राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया था, उसके प्रशसंक थे। उनकी यह पुस्तक लंबे समय तक आरएसएस कार्यकर्ताओं की बाईबल थी। इस पुस्तक का एक उद्धरण, संघ की विचारधारा का संक्षिप्त और सटीक विवरण प्रस्तुत करता हैः ‘‘जर्मनी का राष्ट्रीय गौरव चर्चा का विषय है। अपनी नस्ल तथा संस्कृति की शुद्धता की रक्षा करने के लिए, देश की यहूदी नस्ल का, यहूदियों का सफाया करके जर्मनी ने सारी दुनिया को स्तंभित कर दिया था। यहाँ नस्लीय गौरव के चरमोत्कर्ष की अभिव्यक्ति हुई है। जर्मनी ने यह भी दिखा दिया है कि बुनियादी भिन्नताओं वाली नस्लों तथा संस्कृतियों का एक एकीकृत समग्रता में घुलमिल पाना लगभग असंभव ही है। यह हम हिन्दुस्तान के लोगों के लिए एक अच्छा सबक है कि इससे सीखें और लाभ उठाएँ‘‘ (व्ही ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड, पृष्ठ 27, नागपुर, 1938)। लगभग एक दशक पहले, आरएसएस को चुनावी-राजनैतिक मजबूरियों के चलते इस पुस्तक से शर्मिंदगी महसूस होने लगी और संघ की ओर से यह कहा जाने लगा कि यह पुस्तक गोलवलकर ने लिखी ही नहीं थी! इस पुस्तक की प्रतियां बाजार से गायब हो गईं। परंतु यहां हमें यह स्मरण रखना होगा कि संघ ने ऐसा केवल चुनावी गणित के कारण किया न कि किसी विचारधारात्मक परिवर्तन के कारण।

अब संघ दीनदयाल उपाध्याय को अपने सर्वोच्च चिंतक के रूप में प्रचारित कर रहा है। दीनदयाल उपाध्याय ने ‘‘एकात्म मानवतावाद’’ की अवधारणा को गढ़ा। इस विचारधारा का मूल भाव यह है कि सामाजिक रिश्तों, विशेषकर जाति, के मामले में यथास्थिति बनाए रखी जाए। एकात्म मानवतावाद पर जोर, आरएसएस की राजनीति के असली और गहरे एजेण्डे की ओर संकेत करता है। संघ, राष्ट्रीय विभूतियों में से कुछ का महिमामंडन करके और कुछ को बदनाम कर हिंदुत्ववादी राजनीति का प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है। यह राजनीति ऊपरी तौर पर तो एक धर्म पर आधारित है परंतु असल में यह हिंदू श्रेष्ठी वर्ग का राजनीतिक एजेंडा लागू करने की कोशिश है। और इस एजेण्डे को पूरा करने के लिए यदि समाज के निम्न तबकों में से कुछ को साथ मिलाना भी पड़े तो आरएसएस को इससे परहेज नहीं है। आश्चर्य नहीं कि आरएसएस एक ऐसी संस्कृति का वाहक है जो सांप्रदायिक और प्रतिगामी है। यही हिंदू राष्ट्रवाद का एजेण्डा भी है।

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