‘प्रयत्न’ जैसी संस्थाएं संवार सकती हैं निर्धन बच्चों की तक़दीर

10:12 am or July 28, 2014
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-डॉ. गीता गुप्त-

ले ही भारत में चौदह वर्ष तक के बच्चों के लिए नि:शुल्क अनिवार्य शिक्षा अधिनियम लागू हो, मगर अभी भी लाखों बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। रोज़ी-रोटी की तलाश में गांव से शहर की ओर प्रस्थान करने वाले श्रमिक परिवारों के ऐसे बच्चे हमें अपने आसपास ही देखने को मिल जाते हैं, जिन्हें विद्यालय तक पहुंचाने की नितान्त आवश्यकता है। लेकिन शहरी नागरिक उन बच्चों को अपने घर, दुकान, कारखाने और अन्य संस्थानों में काम करने के लिए तो रख लेते हैं, पर शिक्षा के लिए उन्हें प्रेरित करने, विद्यालय में प्रवेश दिलवाने या सहायता करने की नैतिक जिम्मेदारी नहीं निभाते। यही कारण है कि हमारा देश शत-प्रतिशत साक्षरता के लक्ष्य से अब तक दूर है। शहरी ग्रामीण और विस्थापित बच्चों की शिक्षा एवं उससे जुड़े हुए मुद्दों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। मगर सरकार का ध्यान अभी इस ओर नहीं है। गैर सरकारी संस्थाएं अवश्य इस दिशा में सक्रिय हैं मगर उनके प्रयासों को सराहना ही नहीं, आर्थिक सहयोग एवं संबल की भी आवश्यकता है।

गुड़गांव(हरियाणा) के शहरी ग्राम मौलाहेड़ा और झाड़सा में एक अशासकीय संस्था ‘प्रयत्न’ द्वारा शहरी ग्रामीण और विस्थापित बच्चों में शिक्षा की अलख जगायी जा रही है। 5 जनवरी 2009 को ‘प्रयत्न’ का शुभारंभ हुआ। इसके संस्थापक हैं गुड़गांव की कम्पनी-टाटा कन्सलटेंसी सर्विसेज़ में कार्यरत युवा इंजीनियर श्री प्रणीत सुशील सिन्हा और उनकी पत्नी डॉ. सोनाली सिन्हा। मौलाहेड़ा ग्राम के परिजन चौपाल में उन्होंने अपनी संस्था की नींव रखी। 30-35 बच्चों को जोड़कर उन्होंने अपना कार्य आरंभ किया। धीरे-धीरे करके 200 बच्चों को विद्यालय के द्वारा तक पहुंचाया और अब ‘प्रयत्न’ की एक और शाखा ग्राम झाड़सा में भी बच्चों के जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैला रही है। दोनों गांवों में कुल मिलाकर 150 बच्चे इस संस्था के प्रयास से विद्यालयों में पढ़ने जा रहे हैं। विद्यालय से लौटने पर वे प्रतिदिन संस्था द्वारा संचालित सान्ध्यकालीन कक्षाओं में अध्ययन करते हैं। इसके अलावा खेल, ध्यान, योग, नृत्य, गायन, अभिनय, चित्रांकन आदि विधाओं में भी प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।

एक युवा हृदय की छटपटाहट से उपजी संस्था अभी शैशवावस्था में ही है। नौकरी के साथ-साथ समाजसेवा के लिए समय निकालना आसान नहीं है। मगर इस युवा दम्पती ने निर्धन ग्रामीण बच्चों का भविष्य संवारने को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है। वे तन-मन-धन से इस कार्य में जुटे हुए हैं। बच्चों को विद्यालय में प्रवेश दिलवाना, शाम को ‘रेमिडियल क्लासेस’ चलाना, कॅरिअर काउंसिलिंग और रोज़गारपरक पाठयक्रमों से जोड़ना उनकी प्राथमिकता में है। शिक्षा में सुधार हेतु कटिबध्द इस संस्था का आदर्श है-नैतिक शिक्षा के द्वारा चरित्र-निर्माण, और लक्ष्य है-देश, समाज एवं समयानुरूप कर्मठ, जागरूक व जिम्मेदार नागरिकों का निर्माण। अपने सीमित संसाधनों के बावजूद संस्था बच्चों को उत्कृष्ट कोटि की शिक्षा देने हेतु सचेष्ट है। पंचतंत्र और अमर चित्रकथा जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्हें भारतीय संस्कृति एवं इतिहास का ज्ञान दिया जा रहा है। कम्प्यूटर की शिक्षा भी सुलभ करायी जा रही है। बच्चे सप्ताह के सातों दिन मार्गदर्शन एवं शिक्षा प्राप्त करते हैं। वे प्रतिदिन अलग-अलग प्रार्थना, मंत्रोच्चार और देशभक्ति-गीतों का गायन करते हैं। बच्चों के मनोरंजन एवं ज्ञानवर्ध्दन हेतु शिक्षाप्रद पुस्तकों का संग्रह भी है। बेंगलुरू की बहुचर्चित संस्था ‘प्रथम’ ने सहायतास्वरूप श्रेष्ठ बाल साहित्य का किट इस संस्था को प्रदान किया है। आर्य समाज एवं कुछ अन्य समाजसेवी संस्थाओं द्वारा खिलौने, टिफिन बॉक्स, मेज़ आदि वस्तुएं उपलब्ध करवायी गई हैं।

उल्लेखनीय है कि ग्राम मौलाहेड़ा स्थित ‘प्रयत्न’ की शाखा का आर्थिक प्रबंधन गुड़गांव की एलकाटेल लूसेण्ट कम्पनी के सौजन्य से हो रहा है। इम्पल्स नामक कारपोरेट झाड़सा-शाखा का व्यय-भार वहन कर रही है। एक किराये के भवन में यहां इम्पल्प कम्पनी के कर्मचारियों के बच्चे भी अन्य बच्चों सहित शिक्षा ग्रहण कर संस्कारित हो रहे हैं। इण्डियन बिजनेस स्कूल और मैनेजमेण्ट डेवलपमेण्ट इन्स्टीटयूट के विद्यार्थियों के अलावा मारूति उद्योग के प्रबुध्द उद्यमी भी यहां अध्यापन के लिए समय-समय पर आते हैं। पांच नियमित शिक्षक हैं और कुछ अनियमित अतिथि शिक्षक तथा स्वयंसेवक शिक्षक के साथ-साथ संस्था प्रमुख प्रणीत सिन्हा स्वयं बच्चों को पढ़ाते हैं। डॉ. सोनाली अपने हाथों से भोजन तैयार कर बच्चों को खिलाती हैं। प्रति रविवार बच्चे सुबह दस बजे से एक घण्टा स्वाध्याय करते हैं। फिर प्रणीत उन्हें पढ़ाते हैं और कई बातें सिखाते-समझाते हैं।

पिछले दिनों मैंने ‘प्रयत्न’ के मौलाहेड़ा केन्द्र का अवलोकन किया तो मात्र एक कक्ष में संचालित वहां की गतिविधियां देख मुझे सुखद आश्चर्य हुआ। रविवार अवकाश के दिन उस ठेठ ग्रामीण परिवेश में बच्चों को लगातार चार-पांच घण्टे पढ़ाते-समझाते, विभिन्न कलाएं सिखाते, स्वयंसेवकों को निर्देश देते और अन्यान्य कार्य करते युवा इंजीनियर प्रणीत को देखकर सहज ही पता चल गया कि वे अपने देश के नौनिहालों के भविष्य के लिए कितने चिन्तित हैं ? बच्चों में अनुशासन, ज्ञान की ललक, नेतृत्व क्षमता, चारित्रिक दृढ़ता, स्वावलंबन, मानवीय गुणों के विकास और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना जाग्रत करने के लिए प्रणीत सच्चे मन से सक्रिय हैं और हरेक से ऐसा ही सहयोग चाहते हैं। बच्चे आत्मरक्षा के गुर सीखें, वोकेशनल कोर्स करके आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर हो सकें, इसका ध्यान भी विशेष रूप से संस्था रखती है। इसके लिए ऐसे प्रायोजकों की तलाश की जाती है जो बड़े बच्चों के व्यवसायपरक पाठ्क्रमों की पढ़ाई का व्यय-भार वहन कर सकें। संस्था का लक्ष्य सिर्फ दो ग्रामों के बच्चों तक ही सीमित नहीं है, वह समूचे देश में इसका प्रसार चाहती है। यही नहीं, प्राथमिक शिक्षा में सुधार हेतु जनता, प्रबुध्द वर्ग, व्यवसायी वर्ग, शिक्षकों, पालकों और विद्यार्थी वर्ग के साथ मिलकर इस दिशा में निरन्तर कार्य करना चाहती है। विडम्बना यह है कि प्रयत्न के पास अभी प्रबन्धन हेतु सीमित स्रोत हैं। स्थायी भवन, शिक्षकों के नियमित वेतन का स्थायी प्रबंध, स्वयंसेवकों की व्यवस्था, व्यावसायिक पाठयक्रमों के लिए वित्तीय सहायता आदि की चिन्ता से मुक्त होने के लिए उसे व्यापक जन-सहयोग की आवश्यकता है।

प्राथमिक शिक्षा बहुत बुरे दौर से गुजर रही है। शिक्षकों और संसाधनों के अभाव की बात छोड़ भी दें तो प्राथमिक शिक्षा के पाठयक्रम, माध्यम, शिक्षण-पध्दति, परीक्षा एवं मूल्यांकन प्रणाली में भी अनेक विसंगतियां हैं, जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। सरकारी विद्यालयों में नि:शुल्क गणवेश, मध्यान्ह भोजन, छात्रवृत्ति आदि सुविधाओं के बावजूद वे बदहाल हैं तो इसके लिए कौन दोषी है ? यह सरकारी शिक्षकों, अभिभावकों और समूचे समाज को सोचना होगा। सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद बच्चे विद्यालयों की दहलीज़ तक क्यों नहीं पहुंच पा रहे हैं ? क्यों शिक्षा की कमियों पर समाज में आवाज बुलन्द नहीं हो रही है ? अशासकीय या स्वयंसेवी संस्थाओं को शिक्षा की जो कमियां खटकती हैं ? वे सरकार और सरकारी कारिन्दों को क्यों नहीं खटकती ?

निश्चय ही, देश का हर बच्चा पढ़े और आगे बढ़े, यह आवश्यक है। मगर इसके लिए सरकारी प्रयास नाकाफी हैं। यदि देश के कोने-कोने में ‘प्रयत्न’ जैसी संस्था स्थापित हो जाए, कारपोरेट जगत के मेधावी युवा बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए संकल्पबध्द होकर कार्य करें और सक्षम वर्ग तथा जनता का सहयोग भी उसे प्राप्त हो तो भारत शत-प्रतिशत साक्षरता के लक्ष्य की प्राप्ति में सफल हो सकता है। इसके अलावा सरकारी शिक्षक भी यदि ठान लें तो स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी जैसी विभूतियों के आदर्शों पर चलने वाली एक चरित्र-बल-संपन्न और प्रतिभाशाली पीढ़ी तैयार की जा सकती है। ‘प्रयत्न’ जैसी संस्था के प्रयास तमाम शासकीय शिक्षा-संस्थानों के लिए चुनौती स्वरूप हैं। इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा और स्वीकारा जाना चाहिए।

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