शिलान्यास-उद्घाटन की यह फिजूलखर्ची?

2:34 pm or June 19, 2015
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—-सुनील अमर—–

सरकारी योजनाओं के शिलान्यास और उद्घाटन की परम्परा सारी दुनिया में पुराने समय से ही रही है। इसका मकसद यही होता है कि इन अवसरों के बहाने राजसत्ता जनता के बीच जाएगी और अवसरानुकूल जनहित की कुछ घोषणाऐं करेगी। लेकिन यही काम अगर योजना स्थल से सैकड़ों किमी दूर किसी मकान में बैठकर किया जाए तो इसका क्या मंतव्य हो सकता है? कुछ माह पूर्व उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव ने अपने आवास पर बैठकर सैकड़ों किमी दूर स्थित भदोही एक्सपोर्ट मार्ट का शिलान्यास किया। जैसा कि सभी जानते हैं कि शिलान्यास में पहला पत्थर या ईंट सम्बन्धित महानुभाव के हाथों नींव में रखी जाती है। इससे पहले भी बहुत से ऐसे अवसर आए हैं जब सम्पर्क मार्गों, पुलों, रैन बसेरों जैसी बड़ी संख्या में चलने वाली परियोजनाओं के पचासों-सैकड़ों पत्थर राजधानी में ही एक साथ रखकर मुख्यमन्त्री या मन्त्री ने उसका प्रतीकात्मक शिलान्यास/उद्घाटन किया। ऐसे अभिसिंचित पत्थरों को बाद में निर्माणस्थलों पर ले जाकर स्थापित किया जाता है। जाहिर है कि यह महज खानापूरी जैसा कार्य होता है और इसमें उस क्षेत्र की जनता की कोई भागीदारी नहीं हो पाती। हाॅं, इससे राजनीतिक हितसाधन जरुर होते हैं।

अपने नाम का पत्थर लगाकर खुद को अमर करने की अदम्य इच्छा और सत्तारुढ़ राजनीतिक दल की वोट की राजनीति, ये दो ऐसे कारक हैं जिसकी वजह से ऐसी योजनाओं के स्थापित और चालू होने में अच्छा-खासा समय बरबाद होता है, क्योंकि बहुत बार मुख्यमन्त्री या सम्बन्धित मन्त्री के पास ऐसे कामों के लिए समय ही नहीं होता। महीनों/सालों बीत जाने के बाद हारकर योजना का क्रियाकर्म सम्बन्धित महानुभाव के कर कमलों से उनके राजकीय आवास पर ही करा लिया जाता है। ऐसा भी देखने में आता है कि सत्ता में रहते हुए किसी राजनीतिक दल द्वारा ऐसे पत्थरों को लगाकर शुरु की गई परियोजनाओं को उसके परवर्ती सत्तारुढ़ दल द्वारा एकदम उपेक्षित भी कर दिया जाता है और इसका खमियाजा उस क्षेत्र की जनता को भुगतना पड़ता है। उद्घाटन के इस सनक की चरम स्थिति तो यह है कि कई बार रिमोट कन्ट्रोल या वीडियो काॅन्फ्रेन्सिंग से भी यह काम कर लिया जाता है! यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सैकड़ों किलोमीटर दूर की योजनाओं का शिलान्यास/उद्घाटन जब राजधानी में किया जाता है तो वहाॅं से लेकर योजनास्थल तक की इस भागदौड़ में सरकारी धन का कितना अपव्यय होता होगा। जानकर हैरत होगी कि बहुत बार योजना से ज्यादा धन तो माननीय द्वारा किए गए उसके शिलान्यास और उद्घाटन समारोहों में ही खर्च हो जाता है और यह खर्च भी योजना के लिए आवंटित धन में से ही लेकिन पिछले दरवाजे से लिया जाता है!

माननीयों द्वारा शिलान्यास/उद्घाटन करना एक अपरिहार्य स्थिति जैसा हो गया है लेकिन इस राजनीतिक खेल में जनता किस तरह झेल जाती है इसका एक उदाहरण उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का निशातगंज उपरिगामी मार्ग है। एकाधिक रेलवे क्रासिंग की वजह से दिन भर जाम लगते रहने कारण उक्त स्थल पर उपरिगामी मार्ग का निर्माण कराया गया लेकिन वर्ष 1993 से 1996 तक का समय उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुत उथल-पुथल का था। उक्त मार्ग काफी समय से बनकर तैयार था लेकिन मुख्यमंत्रियों की आवाजाही में उसका उद्घाटन नहीं हो पा रहा था, इसलिए जनता उसे इस्तेमाल करने से वंचित थी। काॅंग्रेसी नेता स्व. मोतीलाल वोरा उस समय प्रदेश के राज्यपाल थे। वर्ष 1995-96 में जैसे ही प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा, बिना किसी तामझाम या सरकारी औपचारिकता के राज्यपाल ने एक दिन उक्त उपरिगामी मार्ग पर जाकर उसको जनता के लिए खोल दिया! महान लोगों से पटे पड़े इस देश में अपने नाम के पत्थरों के प्रति ललक अपरम्पार है। मन्दिर तक ऐसे पत्थरों से पटे पड़े रहते हैं। देश में किसी भी सड़क से गुजरते समय उसके अगल-बगल स्थित ग्रामसभाओं के प्रवेश द्वार देखे जा सकते हैं जो सरकारी धन से बने होते हैं और जिन पर तत्कालीन ग्रामप्रधान और पंचायत सेवक का नाम लिखा रहता है। गाॅव में पेयजल और जलनिकासी की व्यवस्था भले न हो लेकिन ऐसे प्रवेश द्वार पर पचासों हजार रुपया जरुर खर्च कर दिया जाता है! तर्क होता है कि ऐसा ग्रामसभा के प्रस्ताव से हुआ है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा में बीते मार्च माह में नियन्त्रक और महालेखा परीक्षक की वार्षिक रिपोर्ट पेश हुई जिसमें बताया गया है कि सरकार ने दसवीं पास होने वाले छात्रों को मुफ्त टैबलेट योजना की तैयारी में ही रु. 60 लाख खर्च कर दिया जबकि योजना न शुरु हुई और न शुरु होनी है। यही हाल केन्द्र सरकार द्वारा नवगठित गंगा सफाई आयोग का है जिसकी चेयरपर्सन सांसद उमा भारती द्वारा अधिकारियांे के साथ पहली बैठक करने का खर्च रु. 45 लाख आया है! गंगा सफाई पर सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी अनायास नहीं है कि ऐसे तो 200 वर्षों में भी गंगा की सफाई नहीं हो सकेगी। जनप्रतिनिधियों द्वारा जनता के धन के मनमाने और अनौचित्यपूर्ण खर्च की एक बानगी उत्तर प्रदेश के जनपद फैजाबाद में मिलती है। देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले अमर शहीद अशफाकउल्ला खाॅं को फैजाबाद की जेल में फाॅंसी हुई थी। आजादी के बाद फाॅंसी स्थल को स्मारक का रुप दे दिया गया लेकिन इसमें मुख्य मार्ग की तरफ कोई प्रवेश द्वार नहीं था। राष्ट्रीय लोकदल से जुड़े फैजाबाद के एक नेता ने अपने राजनीतिक कौशल का परिचय देते हुए जिला प्रशासन के समक्ष शर्त रखी कि प्रवेश द्वार वे विधायक निधि से बनवा देंगे लेकिन द्वार का नाम चैधरी चरण सिंह द्वार होगा! अरसा पहले यह द्वार बन गया है लेकिन जो भी प्रबुद्ध व्यक्ति अशफाकउल्ला शहादत स्थल पर शहीद की प्रतिमा और सामने चरणसिंह लिखा हुआ द्वार देखता है वह उक्त नेता ही नहीं, शासन-प्रशासन की हतबुद्धि पर भी तरस खाता है। अपने शिलान्यास-उद्घाटन कार्यक्रमों पर लाखों रुपया फॅूंक देने वाले तथाकथित जनप्रतिनिधियों के पास देश के एक शहीद के लिए सरकारी धन से मात्र कुछ हजार रुपयों का एक साधारण सा द्वार बनवाने की नीयत भी नहीं बची है। सांसदों-विधायकों की देखा-देखी पत्थर लगाने के शौक की बीमारी व्यवस्था के बिल्कुल निचले स्तर गा्रम पंचायतों तक जा पहुॅंची है और जनता के धन का तमाशा हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो चुनावी प्रतिद्वन्दिता इस कदर होती है कि लोग एक-दूसरे के गुटों के ऐसे पत्थरों या पटों को नष्ट भी करते रहते हैं। सूचनात्मक पटों का औचित्य तो समझ में आता है कि योजना का ब्यौरा और ढ़ाॅंचागत व्यय क्या है। सारी योजनाऐं सरकारी ही होती हैं तो उनका किसने शिलान्यास-उद्घाटन किया इस पर अंधाधुध धन फॅूंकने का औचित्य क्या है? सिवा आत्मप्रचार के!

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