अयोध्यावासियों की फिक्र भी करे कोई

2:46 pm or June 19, 2015
Ayodhya01

—-कृष्ण प्रताप सिंह—-

अयोध्या में लम्बे खिंचते जा रहे रामजन्मभूमि/बाबरी मस्जिद विवाद के दोनों पक्षों की मन्दिर या मस्जिद से जुड़ी चिंताएं गाहे-ब-गाहे संचार माध्यमों में जगह पाती रहती हैं। लेकिन इस विवाद के कारण वहां के निवासियों की रोजमर्रा की जिन्दगी की बढ़ती मुश्किलें शायद ही कभी किसी को चिंतित करती हों। इन निवासियों के कई नागरिक अधिकार पिछले 22 सालों से विवादित परिसर की, जो अब केन्द्र सरकार द्वारा अधिग्रहीत लगभग 70 एकड़ भूमि का हिस्सा है, भारी-भरकम सुरक्षा पाबंदियों के मोहताज होकर रह गये हैं। निर्भय व निर्बाध संचरण के अधिकार से तो वे और भी पहले से महरूम हैं। इस कदर कि उन्हें घरों से निकलते व उनमें वापस जाते वक्त सुरक्षाबलों की टोकाटाकी सहनी पड़ती है। आलम यह है कि किसी जोर-जबरदस्ती, जुल्म अथवा अपराध के शिकार होने पर वे पुलिस थाने जाना चाहें तो भी बैरियरों से गुजरे और बलों की सहमति के बिना नहीं जा सकते। क्योंकि रामजन्मभूमि पुलिस थाना कड़ी सुरक्षा वाले अधिग्रहीत परिसर के रास्ते पर ही स्थित है।

यों, अयोध्या में पाबन्दियों का इतिहास पुराना है। 1990 के अक्टूबर-नवम्बर में मुलायम सिंह यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में विश्वहिन्दू परिषद द्वारा प्रस्तावित कारसेवा को विफल करने के लिए, और तो और, परम्परा से चली आती अयोध्या की पंचकोसी व चैदह कोसी परिक्रमाओं पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। उन्होंने अयोध्या की ओर आने वाली रेलगाडि़यां तक रुकवा दी थीं। मार्च, 2002 में अटलबिहारी वाजपेयी के राज में, जब उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन था और विष्णुकांत शास्त्री राज्यपाल थे, विहिप के अयोध्या कूच के समय एक बार फिर ऐसी ही ढेर सारी पाबंन्दियां दोहरायी गयी थीं। 2010 में सितम्बर में उच्च न्यायालय से विवाद का बहुप्रतीक्षित फैसला आने को हुआ तो भी अयोध्या व उसके जुड़वा शहर फैजाबाद को किले में तब्दील करके नागरिकों को घरों में बन्द कर दिया गया था। अलबत्ता, यह सब सीमित अवधि के आपात उपाय थे और नागरिक अधिकारों के युक्तियुक्त निर्बंधन के सरकार के संवैधानिक अधिकार से इनका औचित्य सिद्ध किया जा सकता था।

लेकिन 6 दिसम्बर, 1992 को विवादित ढांचे के ध्वंस के बाद इनमें से कई पाबन्दियां स्थायी हो गयी हैं। पिछले 22 सालों में एक बार भी इन्हें हटाने पर विचार नहीं किया गया, जबकि उच्च अधिकारी नियमित अंतराल पर सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षाएं करते और उसे ‘और कड़ी’ करने पर जोर देते रहते हैं। इस क्षेत्र को ‘नो फ्लाइंग जोन’ में बदलने जैसे प्रस्ताव भी उनकी समीक्षाओं का हिस्सा होते हैं।

कोई पूछे कि क्या इस तरह सुरक्षा के नाम पर नागरिकों की संविधानप्रदत्त स्वतंत्रताओं व अधिकारों पर पाबंदियों को अनन्तकालिक बनाया जा सकता है, तो कोई जवाब नहीं दिया जाता। शायद इसलिए कि इसका कोई तर्कसंगत जवाब हो ही नहीं सकता। किसी स्थल के सुरक्षा प्रबंध, वह कितना भी संवेदनशील क्यों न हो, संविधान से ऊपर नहीं हो सकते, जबकि जानकारों की मानें तो नागरिकों की स्वतंत्रताओं का ऐसा अपहरण उन राज्यों या क्षेत्रों में भी नहीं किया जाता, जिन्हें उपद्रवग्रस्त या कि अशांत घोषित कर दिया जाता है और जहां सुरक्षाबलों को विशेष अधिकार देने वाला अफस्पां कानून लागू होता है।

सच यह है कि अयोध्या में जिन कथित अन्देशों को इन पाबन्दियों का बहाना बनाया जाता है, वे उसके वातावरण अथवा स्वभाव में कहीं नहीं हंै। हां, अयोध्या में मन्दिर-मस्जिद विवाद से जुड़े अधिकारियों द्वारा अंदेशों को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर बताने का भी एक इतिहास है। 22-23 दिसम्बर, 1949 की रात विवाद को नये आयाम देने वाले घटनाक्रमों के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी के.के.के. नैयर ने यह कहते हुए आसमान सिर पर उठा रखा था कि विवादियों पर छोटी-सी प्रशासनिक सख्ती भी आम जनमानस को इतना उद्वेलित कर देगी कि कहर बरपा हो जायेगा। लेकिन उनको हटाये जाने के बाद विवादित ढांचे को कुर्क कर दो तालों के हवाले करके आश्वस्त हो लिया गया था और कहीं कोई आसमान नहीं फटा था। लेकिन सुरक्षा को अंदेशे हैं भी तो क्या उनसे निपटने का एकमात्र तरीका यही है कि नागरिकों को निर्बाध रहने ही न दिया जाये?

एक फरवरी, 1986 को उन तालों को खोल देने का आदेश देने से पहले फैजाबाद के जिला जज कृष्णमोहन पांडे ने जिले के तत्कालीन जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को तलब करके पूछा था कि इससे कानूनव्यवस्था से जुड़ी कोई समस्या तो नहीं खड़ी होगी? दोनों अधिकारियों ने कहा था कि हुई तो वे वहां और पुलिस बल तैनात करके उससे निपट लेंगे, जिसका उन्हें अधिकार है। तो क्या अब अधिकारियों के वे अधिकार कहीं चले गये हैं, जिनकी बिना पर वे जरूरत के अवसर पर आपातप्रबंध करें और नागरिकों की निर्बाध आवाजाही पर प्रतिबंधों को शाश्वत बनाने से बाज आयें? खासकर जब समूचा अधिग्रहीत परिसर लोहे की मजबूत बाड़ से घिरा हुआ है। यह बाड़ विवादित परिसर के आसपास दोहरी है और असामान्य गतिविधियों पर नजर रखने के लिए समूची अयोध्या में इलेक्ट्रानिक आंखें यानी क्लोजसर्किट टीवी कैमरे लगे हुए हैं।

सुरक्षा पाबन्दियों व प्रबंधों पर कोई तीन अरब रूपये सालाना का खर्च आता है। इनकी निरर्थकता ऐसी है कि 2005 में पांच जुलाई को हुए आतंकी हमले को छोड़ दें, जिसमें पुलिस के मोर्चा छोड़कर भाग जाने के बाद केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों ने सभी पांचों आतंकियों को मार गिराया था, ये प्रबंध कभी भी ‘सफल’ नहीं रहे। इनके भारी तामझाम के बावजूद न 1990 में कारसेवकों को अयोध्या पहुंचने से रोका जा सका और न ही 6 दिसम्बर, 1992 का विवादित ढांचे का ध्वंस। फिर समझ में नहीं आता कि इनको बनाये रखने के लिए नागरिकों को इनकी इतनी सजा क्यों दी जा रही है?

क्यों केन्द्र या प्रदेश की सरकारें नहीं समझतीं कि अयोध्या के पर्यटनस्थल के रूप में विकास के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा ये सुरक्षा पाबंदियां ही हैं। पर्यटक ऐसे शहर में क्यों आने लगे, जहां वे बेरोकटोक आ-जा ही नहीं सकते? प्रसंगवश, अयोध्या को सुरक्षा के नाम पर तीन जोनों के बांटा गया है-रेड, यलो और ग्रीन। रेड जोन में मुख्यरूप से अधिग्रहीत क्षेत्र है। इसके विवादितस्थल पर विराजमान रामलला की सुरक्षा इतनी कड़ी है कि चैबीसो घंटे सुरक्षाबलों से घिरे होने के बावजूद सीमित अवधि के लिए ही उनके दर्शन की अनुमति है। तिस पर वहां मोबाइल कैमरा और कलम लेकर नहीं जाया जा सकता। न्यायिक आदेशों व आतंकी अन्देशों के मद्देनजर इसका औचित्य स्वीकार किया जा सकता है लेकिन उसके इर्द-गिर्द के यलो जोन में भी, जिसमें अलग-अलग धर्मों के अनेक पूजा व उपासनास्थल हैं, पाबन्दियां कम नहीं होतींे। उस ग्रीन जोन में भी नहीं, जिसमें वे रास्ते हैं जहां से अयोध्या में प्रवेश किया जा सकता है।

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