मिलों पर केन्द्र-राज्य दोनों मेहरबान, गन्ना किसान हलकान

5:17 pm or June 29, 2015
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—-सुनील अमर—–

छह महीने के भीतर तीसरी बार गन्ना मिलों पर सरकारों की उदारता की बरसात हुई है। दशकों से किसानों का हजारों करोड़ रुपया दबाए बैठी इन मिलों को सरकार से सख्ती के बजाय तमाम तरह के उपहार मिल रहे हैं। अज़ब है कि उच्च अदालतें सरकार से मिलों पर सख्ती कर किसानों का बकाया दिलाने को कहती हैं लेकिन सरकारें मिल मालिकों का मनुहार कर उन्हें अरबों रुपये का ब्याजमुक्त कर्ज यानी उधार तथा व्यापार सम्बन्धी वे तमाम रियायतें दे रही हैं जिनसे उनके मुनाफे में कई गुना ज्यादा वृद्धि हो सके। इन दुरभिसन्धियों के क्रम में ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश का है जहाॅं वर्षों पुराने अरबों रुपये के बकाए को दरकिनार करते हुए चीनी मिलों ने सिर्फ वर्ष 2013-14 के बकाए का भुगतान किया है और सरकार अपनी पीठ ठोंक रही है कि उसके प्रयासों से 10 साल में पहली बार एक वित्तीय वर्ष के बकाए का पूर्ण भुगतान हो सका है। सरकार का दावा है कि इससे पूर्व वर्ष 2005 की सपा की सरकार में ही ऐसा हुआ था।

उत्तर प्रदेश में सत्तारुढ़ समाजवादी पार्टी की सरकार ने विकट मॅंहगाई और कृषि पर हो रहे प्राकृतिक प्रकोपों के बावजूद बीते तीन वर्षों से गन्ने का दाम बढ़ाना बन्द कर दिया है। किसान वही पुराना दाम पा रहे हैं जो बसपा की सरकार ने तय किया था। देश में पैदा होने वाली लगभग सभी फसलों के दाम बढ़ रहे हैं लेकिन उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों को अखिलेश यादव की सरकार ने खूॅंटे से बाॅंध दिया है। इस कोढ़ में खाज वाली हालत यह है कि यह दाम भी उसे समय से मिल नहीं रहा है। इस वर्ष का गन्ना सीजन बीत गया, विवाह का मौसम बीत गया तथा स्कूल में बच्चों के एडमीशन का समय बीत गया और अभी तक गन्ना किसानों को उनका पैसा नहीं मिल सका है। चालू सत्र में गन्ना किसानों का रु. 9000 करोड़ प्रदेश की चीनी मिलें दबाए बैठी हैं। प्रदेश में कुल 123 चीनी मिलें कार्य करती हैं जिसमें से 52 का भुगतान बहुत खराब है और इनमें से सिर्फ 43 के खिलाफ एफ.आई.आर. पुलिस में दर्ज की गई है क्योंकि उच्च न्यायालय का आदेश था कि भुगतान न कर रही चीनी मिलों के खिलाफ दण्डात्मक कार्यवाही यथा, कुर्की, नीलामी आदि कर किसानों का पैसा दिलाया जाय लेकिन एफ.आई.आर. दर्ज होने के बावजूद इन मिलों के रवैये पर कोई असर नहीं पड़ा है क्योंकि सरकार इन पर मेहरबान है। प्रतिबन्ध है कि किसान द्वारा गन्ना आपूर्ति करने के 14 दिन के अन्दर अगर मिल पैसे का भुगतान नहीं करती तो उसे बैंकों द्वारा निर्धारित ब्याज का भुगतान उस धनराशि पर किसानों को करना होगा। लेकिन कोई भी मिल ऐसा नहीं कर रही है।

वर्ष 2013 में देश की चीनी मिलों पर किसानों का रु. 3400 करोड़ का बकाया था लेकिन शुगर लाॅबी के प्रति सम्प्रग सरकार की उदारता देखिए कि उसने चीनी मिलों के लिए रु. 7500 करोड़ का ब्याजमुक्त ऋण स्वीकार किया। एकदम उसी राह पर केन्द्र की मौजूदा भाजपा सरकार भी चल रही है और उसने भी बीते 10 जून को चीनी मिलों के लिए रु. 6000 करोड़ का कर्ज मन्जूर कर लिया है। इसे कर्ज के बजाय उधार कहना ज्यादा उपयुक्त इसलिए होगा कि सरकार इस विशालकाय धनराशि पर मिल मालिकों से ब्याज नहीं लेगी और शर्त है कि मिल मालिक इसे एक साल बाद वापस करेंगें (?)। इस एक साल में सरकार को इस धनराशि पर रु. 600 करोड़ का ब्याज खुद भरना पड़ेगा! बावजूद इसके, इंडियन शुगर मिल्स एसोसियेशन इससे खुश नहीं है। उसका कहना है कि उसका समग्र कर्ज रु. 36,000 करोड़ से अधिक का है और सरकार के 6000 करोड़ की मदद से उसका क्या भला होगा। ऐसे में सम्भावना इस बात की है कि किसानों के बकाया भुगतान के नाम पर दी जा रही यह विशालकाय रकम शायद ही उन तक पूरी की पूरी पहुॅंच सके।

गन्ना किसानांे को भूखा रखकर उत्तर प्रदेश सरकार ने चीनी मिल मालिकों के आगे समर्पण करते हुए उन्हें तमाम तरह की छूट और सहूलियतें देना पिछले साल दिसम्बर में ही स्वीकार कर लिया था। इसमें बेचे गए प्रति कुन्तल गन्ने पर रु. 20 का भुगतान रोक लेना, गन्ने के रस से निकलने वाले शीरे की बिक्री पर सरकारी नियन्त्रण ढ़ीला करना, गन्ने की खोई यानी बैगास से बिजली उत्पादन करने वाली चीनी मिलों से बिजली खरीदना, खरीद शुल्क व प्रवेश शुल्क माफ करना तथा किसानों की गन्ना सहकारी समितियों, जो कि किसानों से गन्ना खरीदकर मिलों को आपूर्ति करती हैं, को मिलों से मिलने वाला निर्धारित कमीशन माफ करना आदि अनेक आर्थिक सहूलियतें शामिल थीं। केन्द्र से मिलने वाली ब्याजमुक्त आर्थिक सहायता इस सबके अतिरिक्त है। एक तरफ चीनी मिल मालिकों को इतनी सारी सहूलियतें और दूसरी तरफ, कोई बता सकता है कि किसानों को भी क्या कोई सहूलियत दी गई है? बावजूद इसके देश में किसानों का 21000 करोड़ तो उत्त्र प्रदेश में रु. 9000 करोड़ चीनी मिलें दबाए बैठी हैं। यहाॅं यह बताना जरुरी है कि किसानों की गन्ना सहकारी समितियों का गन्ना आपूर्ति की व्यवस्था करने के एवज में मिलों से जो कमीशन मिलता है उससे किसानों की तमाम तरह से मदद तथा गन्ना उत्पादक गाॅवों में पक्के सम्पर्क मार्ग आदि का निर्माण कराया जाता है। अधिकृत कमीशन न मिलने से समितियाॅं किसानों के लिए उक्त कार्य नहीं कर पाऐंगीं।
चीनी मिलों का छल व प्रपंच देखिए कि सिर्फ गन्ने से आधा दर्जन से अधिक प्रकार का लाभकारी व्यवसाय करने के बावजूद वे सिर्फ चीनी की कीमत का हाय-तौबा करके अपने घाटे का रोना रोती रहती हैं। इसको साबित करने के लिए वे आॅंकड़ों का मायाजाल पेश करती हैं। राजनीतिक दल चीनी मिल मालिकों से भारी चंदा पाते हैं इसलिए वे खुलकर उनका विरोध नहीं करते और उनका सारा जोर किसानों को समझाने पर ही रहता है। मीडिया में कई बड़े समूह ऐसे हैं जो खुद चीनी मिल लगाए हुए हैं। ऐसे में उनसे किसानों का पक्ष लिए जाने की उम्मीद बेमानी ही है उलटे वे किसानों को बरगलाते हैं। विश्व बैंक की परियोजना उत्तर प्रदेश कृषि विविधीकरण की आर्थिक नीति के पूर्व अध्यक्ष और अर्थशास्त्री प्रो. यशवीर त्यागी ने दो वर्ष पूर्व बताया था कि गन्ना शोध परिषद शाहजहाॅंपुर द्वारा निकाले गए आॅकड़ों के अनुसार गन्ने का मूल्य रु. 325 प्रति कुन्तल होना चाहिए। प्रोफेसर त्यागी के अनुसार गन्ने से सिर्फ चीनी ही नहीं बनती बल्कि 4-5 सह उत्पाद भी बनते हैं। ये सभी सह उत्पाद मिलें काफी फायदे में बेचती हैं लेकिन किसानों को भुगतान करने की जब बात आती है तो वे चीनी की बाजार दर का रोना रोने लगती हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि पिछला बकाया भुगतान पर सरकार का लचीला रुख, ब्याज मुक्त सरकारी मदद, लेवी चीनी की मात्रा में कटौती तथा कई प्रकार के कर में छूट आदि को मिला कर उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों को पाॅंच हजार करोड़ रुपए से अधिक का लाभ सिर्फ पिछले पेराई सत्र में ही हुआ।

किसान चैतरफा बदहाल है। प्रकृति की मार से भी, और सरकार से भी। बेमौसम की बारिश ने जहाॅं उसकी गेंहॅू आदि फसलों को चैपट कर दिया वहीं हुदहुद नामक तूफान और तेज बारिश ने गन्ने की फसल को क्षति पहुॅंचायी थी। अब रही-सही कसर सरकार पूरी कर रही है। किसानों की इस उपेक्षा का सबसे बड़ा कारण है उनका असंगठित होना। उन्हें जानना चाहिए कि सिर्फ संगठित समुदाय ही सरकारों से अपनी बात मनवा सकता है।

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