यह संवेदनशीलता है या प्रहसन!

12:28 pm or July 28, 2014
2807201411

वरुण शैलेश-

से चालबाजी कहें या संवेदनशीलता? सवाल कठिन है। इसे नए दौर का बाजारु उपभोक्तावाद नाम देकर हल्के में भी तो नहीं लिया जा सकता। लखनऊ के बाहरी इलाके में बर्बर बलात्कार कांड के बाद पीड़ित महिला की खून से लथपथ निर्वस्त्र लाश की तस्वीर सोशल मीडिया पर जिस तरह प्रसारित हुई उस पर सवाल खड़ा होता है। क्या यह तस्वीर इसलिए प्रसारित की गई कि लोगों की संवेदना जाग उठे या मर्द के भीतर छिपी वहसीपन को पूरा करने की जुगत है, जो बलात्कार के बाद भी मनोवैज्ञानिक बलात्कार को अंजाम देती रहती है। सवाल तो तब और तल्ख हो जाता जब कैमरे के दायरे में बलात्कार की शिकार वंचित तबके की महिलाएं या बच्चियां होती हैं। याद है गुवाहाटी की सड़कों पर दौड़ती वह निर्वस्त्र आदिवासी महिला जिसकी तस्वीर बेहिचक छापी और प्रसारित की गई थी। ऐसे सैकड़ों उदाहरण जेहन में हैं जिसमें वंचित तबके की शिकार महिलाओं की तस्वीरों को बेधड़क बिना अपराधबोध के समाज की चेतना में उतार दिया जाता है।

पत्रकार साथी अरविंद शेष का सवाल तो वाजिब है। वह कहते हैं कि ‘बैंडिट क्वीन’ में एक दृश्य में ठाकुरों के हुक्म पर पानी लाने जाती निर्वस्त्र फूलन को देख कर मुझे रुलाई आ गई थी, लगा कि सब कुछ खाक कर दूं। लेकिन उसी सिनेमा हॉल में कई मर्दों ने सीटियां बजाईं। तो इस समाज ने मर्द माइंडसेट को कैसे तैयार किया है, उसे समझना क्या इतना मुश्किल है दोस्तों!लखनऊ में बर्बर बलात्कार की घटना के बाद निर्वस्त्र लाश की तस्वीरें जिस तरह सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से लोगों ने लगाई,क्या वह लोगों को झकझोरने में कामयाब हुई होंगी? मैं नहीं कह रहा कि जिन लोगों ने ऐसा किया, वे ऐसी घटनाओं के प्रति संवेदनहीन हैं। लेकिन दोस्त ऐसा करते हुए हम कहीं उसी व्यवस्थागत माइंडसेट के हाथों तो नहीं संचालित हो रहे, जिसके खिलाफ हमें लड़ना है! वंचना की इस व्यवस्था में शासित वर्गों के रूप में स्त्रियों के खिलाफ जो जमीन तैयार की गई है, उसका एक समूचा सामाजिक मनोविज्ञान है और वह आमतौर पर समूची दुनिया में,लेकिन कम से कम हमारे समाज में अपने हर व्यवहार से पुरुष-सत्ता को खाद-पानी मुहैया कराती है। वह आगे कहते हैं,हम जानते हैं कि ऐसी कोई भी लड़ाई एक लंबी सामाजिक-मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया से होकर गुजरेगी। इसमें मुखालफत के लिए अख्तियार किया गया कोई भी रास्ता उस प्रक्रिया का हिस्सा ही है। लेकिन मुखालफत के पायदान पर पहुंच कर अब हमें उन रास्तों का भी खयाल रखना होगा कि कहीं वे उसी मंजिल के सफर पर तो नहीं हैं जिसके खिलाफ हम खड़े हो रहे हैं। इसके अलावा,जरा हम सब सोचें कि सिर्फ दो-ढाई साल पहले दिल्ली की ‘निर्भया’के साथ हुई बर्बरता के खिलाफ लड़ते हुए हम कामयाब हुए थे तो उसमें निर्भया की तस्वीर तो छोड़िए, क्या उसके असली नाम की भी जरूरत पड़ी थी क्या? आखिर ऐसा क्यों होता है कि लड़ाई जब एक वर्ग के रूप में निर्भया की होती है तो बिना नाम और तस्वीर के हम ईमानदारी से लड़ाई लड़ते भी हैं और जीतते भी हैं। नाम या तस्वीर जाहिर करने का विरोध भी करते हैं। लेकिन खैरलांजी या लखनऊ जैसी तमाम जगहों पर गरीब-वंचित-दलित वर्गों की महिलाओं-बच्चियों की निर्वस्त्र, क्षत- विक्षत तस्वीर मिल भी जाती है और उसे बेहिचक प्रसारित भी कर दिया जाता है। लेकिन लड़ाई आखिर नाकाम होती है, इंसाफ लाचार होता है। दोस्तों, हमारी लड़ाई में ईमानदारी होगी तो किसी को झकझोरने के लिए किसी लाश की ही सही, स्त्री शरीर के प्रदर्शन की जरूरत नहीं होगी। तकाजा अब इस वंचना की व्यवस्था के सामाजिक मनोविज्ञान की परतों को उघाड़ने की भी है।

सवाल उठता है बलात्कार करने का दुस्साहस कहां से पैदा होता है। इसका सीधा सा जवाब है जातिगत वर्चस्व। जो तब तबक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से मजबूत है वही इन करतूतों को अंजाम देता है, क्योंकि उसे अपनी ताकत का अंदाजा है। लेकिन जब इन करतूतों के खिलाफ जो लड़ाई जाती है वह कितनी ईमानदार होती है या उसमें भी एक चालबाजी होती है। लखनऊ की बलात्कार पीड़िता के निर्वस्त्र लाश की तस्वीर सोशल मीडिया पर प्रसारित करना भी उसी चालबाजी का एक हिस्सा है। रोकिए इसे।

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