आपातकाल कुछ दिलचस्प पहलू

2:48 pm or July 3, 2015
Indira-Gandhi-EP-L

—–एल.एस. हरदेनिया——

ब्रिटेन के चार बार प्रधानमंत्री रहे विलियम ग्लेड्सटन (1809-1898) से पूछा गया कि देश के विभिन्न राजनीतिज्ञों से उनके कैसे संबंध हैं? इस पर उन्होंने जवाब दिया कि राजनीतिज्ञों से संबंध, स्वयं एवं अपनी पार्टी के हितों को ध्यान में रखकर बनाये जाते हैं।

लगभग यही बात हमारे देश पर भी लागू होती है। आपातकाल के संदर्भ में यदि राजनीतिज्ञों के पारस्परिक संबंधों का विश्लेषण किया जाए तो एक अजीबोगरीब चित्र उपस्थित होता है।

श्रीमती इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की थी। उस समय आपातकाल का विरोध करने वालों की पहली पंक्ति में जो लोग शामिल थे, वे आज कांग्रेस के साथ हैं और जिन्होंने आपातकाल का समर्थन किया था, उनमें से कई भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए हैं, जिसके तत्कालीन अवतार जनसंघ ने पूरे दमखम से आपातकाल का मैदानी विरोध किया था।

जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में अनेक नवयुवकों ने आपातकाल का विरोध किया था और जेल की यंत्रणा भी भोगी थी। इनमें लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव आदि शामिल हैं। इनमें लालू प्रसाद यादव तो कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्रीय सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं और अब ऐसे लक्षण स्पष्ट नजर आ रहे हैं कि बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव की जोड़ी, कांग्रेस से हाथ मिलाकर विधानसभा चुनाव लड़ेगी।

आपातकाल के दौरान एक लोकप्रिय नारा था ‘‘संजय, विद्या, बंसीलाल; आपातकाल के तीन दलाल’’। इनमें से विद्याचरण शुक्ल ने भारतीय जनता पार्टी के टिकिट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा था। संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी, जो आपातकाल की प्रबल समर्थक रहीं, वे बरसों पहले भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो चुकी हैं और भाजपा की टिकिट पर चुनाव लड़ती हैं। वे वर्तमान में मंत्री भी हैं। यह इस तथ्य के बावजूद कि वे आपातकाल की प्रबल समर्थक थीं और शायद आज भी हैं (उन्होंने पिछले वर्षों में कभी भी आपातकाल के विरोध में कुछ नहीं कहा)। विद्याचरण तो आपातकाल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे। उनका काम ही था आपातकाल को सही ठहराना। वे एक शक्तिशाली मंत्री थे और इंदिरा गांधी के काफी नजदीक थे। आपातकाल की ज्यादतियों की जांच करने के लिए जो आयोग बना था उसके समक्ष अपना बयान देते हुए उन्होंने आपातकाल में हुई अनेक ज्यादतियों की जिम्मेदारी खुद पर ली थी। बाद में राजीव गांधी से मतभेदों के कारण उन्होंने कांग्रेस छोड़ी और विश्वनाथ प्रताप सिंह का दामन थामा। इस दरम्यान भी उन्होंने कभी आपातकाल की निंदा नहीं की। इस तथ्य के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें लोकसभा के छत्तीसगढ़ के एक संसदीय क्षेत्र से टिकिट दिया था, यद्यपि वे चुनाव जीत नहीं पाए।

इसी तरह, बंसीलाल आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के सर्वाधिक नजदीकी राजनेता समझे जाते थे। बाद में उन्होंने भी कांग्रेस छोड़ दी और एक दौर ऐसा भी आया जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर हरियाणा में सरकार बनाई। बंसीलाल ने भी शायद कभी भी आपातकाल की निंदा नहीं की।

इस तरह आपातकाल का विरोध करने वाले, कांग्रेस – जिसने आपातकाल लागू किया था के साथ हो लिए और जिन्होंने आपातकाल का समर्थन किया था, वे आपातकाल के सर्वाधिक तीखे विरोधी राजनीतिक दल भाजपा के साथ चले गए। इससे ही ग्लेड्सटन का वह कथन सही साबित होता है कि राजनैतिक नेता अपना नजरिया, सिद्धांतों और आदर्शों के आधार पर नहीं बल्कि अपने संकुचित हितों से तय करते हैं।

आपातकाल के बाद जो चुनाव हुए उनमें इंदिरा जी और कांग्रेस की हार हुई। उसके बाद मोरारजी भाई के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी। इस सरकार का क्या हश्र हुआ, यह किसी से छुपा नहीं है। तीन साल से भी कम समय में इंदिरा-विरोधी सरकार का पतन हो गया। पतन दो कारणों से हुआ। आज की भारतीय जनता पार्टी, उस समय जनसंघ के नाम से जानी जाती थी। आपातकाल में हुए चुनावों के बाद सभी पार्टियों ने मिलकर एक दल बनाया और अपनी-अपनी पुरानी पार्टियों को भंग कर दिया। जनसंघ ने भी ऐसा ही किया परंतु जनसंघ के बहुसंख्यक सदस्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे इसलिए मधु लिमये और अन्य समाजवादियों ने मांग की कि जनसंघ के ऐसे सदस्य, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए हैं,  संघ से अपना नाता तोड़ें। परंतु यह बात जनसंघ के नेतृत्व को मंजूर नहीं थी। इस मतभेद के कारण जो मिलीजुली पार्टी थी वह समाप्त हो गई।

उस समय की मंत्रिपरिषद के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण सदस्य चौधरी चरणसिंह थे। चरणसिंह की जिद के कारण ही इंदिरा जी को गिरफ्तार किया गया था। उस समय कुछ लोगों का यह मत था कि इंदिरा जी को गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि ऐसा करके उन्हें जिंदा शहीद बना दिया जायेगा जिसका वे पूरा लाभ उठाने की कोशिश करेंगी। परंतु चरणसिंह की जिद के कारण इंदिरा जी की गिरफ्तारी हुई। उन्हीं चरणसिंह ने सबसे पहले जनता पार्टी से अपना नाता तोड़ा और कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बन गए। थोड़े समय के बाद कांग्रेस ने चरणसिंह से अपना समर्थन वापिस ले लिया। यह भी दिल्ली में पहली बार बनी गैर-कांग्रेसी सरकार के पतन का एक प्रमुख कारण था।

इस प्रकार जिन लोगों ने इंदिरा जी को तानाशाह कहा, जिन्होंने उन्हें प्रजातंत्र-विरोधी कहा, वे स्वयं देश को एक स्थायी सरकार नहीं दे सके। सन् 1980 के चुनाव में इंदिरा जी पूरे दमखम से जीतकर आईं और प्रधानमंत्री बनी। इस घटनाक्रम से आम लोगों को काफी निराशा हुई। यदि गैर-कांग्रेसी सरकार, देश को एक स्थायी और जनहितैषी शासन दे पाती तो शायद देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव आता। परंतु ऐसा नहीं हो पाया।

जहां तक आपातकाल लगाने का सवाल है, इसमें कोई शक नहीं कि इसका मुख्य उद्देश्य इंदिरा जी का प्रधानमंत्री पद बचाना था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने इंदिरा जी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया, जिसके कारण उनका इस्तीफा देना जरूरी हो गया था। उनके चुनाव को प्रसिद्ध समाजवादी नेता राजनारायण ने चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति जगमोहन सिन्हा ने उनके विरूद्ध लगाए गए 14 आरोपों में से दो सही पाए। जो आरोप सही पाए गए उनमें से पहला था सरकारी खर्च से भाषण के लिए मंच बनवाना और दूसरा यह कि इंदिरा जी के चुनाव एजेंट यशपाल कपूर सरकारी नौकरी में थे। हाईकोर्ट ने उन्हें 20 दिन का समय सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने के लिए दिया। इस दरम्यान उन्होंने अपील की और सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट के निर्णय को पलट दिया। इस तरह इंदिरा जी प्रधानमंत्री के पद पर कायम रहीं।

प्रसिद्ध इतिहासज्ञ रामचंद्र गुहा, अपनी किताब ‘‘इंडिया ऑफ्टर गांधी’’ में लिखते हैं कि आपातकाल लगाने की जिम्मेदारी इंदिरा जी के साथ जयप्रकाश नारायण की भी थी। दोनों ने प्रजातांत्रिक संस्थाओें में अपनी आस्था नहीं दिखाई। हाईकोर्ट के फैसले के एकदम बाद इंदिरा जी का इस्तीफा मांगना उचित नहीं था, वहीं उनका इस्तीफा मांगने के कारण इंदिरा जी द्वारा जनप्रतिनिधियों को गिरफ्तार कर जेल में डालना भी उचित नहीं था।

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