कथित विकास पर सवाल

1:33 pm or July 28, 2014
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-शशांक द्विवेदी  –

पिछले दिनों सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों से जुड़ी संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के बेहद गरीब लोगों में से एक तिहाई भारत में रहते हैं तथा यहां पांच साल से कम उम्र में मौत के मामले सबसे अधिक होते हैं। इस रिपोर्ट ने देश के कथित विकास पर बड़े सवाल खड़े कर दिए है। वास्तव में इस देश में विकास कौन कर रहा है? अमीर और अमीर होते जा रहें है जबकि मंहगाई ने तो गरीब की कमर ही तोड़ दी है। महगांई लगातार बढ़ती जा रही है जिसकी वजह से उसके लिए दो वक्त की रोती का इंतजाम करना मुश्किल होता जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की जनता से ”अच्छे दिन आने वाले है ” का नारा दिया था लेकिन अभी तक तो अच्छे दिन आये नहीं है। गरीब के अच्छे दिन कब आयेंगे ? आयेंगे भी या नही या ये सिर्फ वादा बन कर ही रह जायेगा।

देश में आर्थिक उदारीकरण के बाद एक वर्ग का जबर्दस्त विकास हुआ है जबकि दूसरा वर्ग पिछड़ता गया। पहले देश में गिने चुने करोड़पति होते थे लेकिन अब ऑंकड़ों के मुताबिक एक लाख 53 हजार करोड़पति हैं। देश का सारा पैसा और संसाधन इन्ही लोगों के कब्जे में है जबकि बाकि लोग किसी तरह से सिर्फ अपनी जिंदगी गुजर बसर कर रहें है। सबसे खास बात यह है कि यही पैसे वाले लोग ही इस देश के नीति नियंता है ,देश की समाज की नीतियों के निर्धारण में गरीब का कोई योगदान नहीं है। गरीब सिर्फ आंकड़े बनाने या बनने के लिए ही है। देश में दिख रहा कागजी और तथाकथित विकास किसके लिए है और किसको लाभ पहुंचा रहा है ,यह एक बड़ा विचारणीय प्रश्न है हम सब के सामने क्योंकि सच तो यह है कि देश के बहुसंख्यक वर्ग के लिए लिए दो जून की रोटी जुटा पाना अब भी उसके जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष है। तीन चार साल के अन्दर के अन्दर चीजो के दाम आसमान छूने लगे है, हर चीज में पचास से सौ दो सौ प्रतिशत तक मूल्य वृध्दि हो चुकी है (केवल किसानों की उपज और मजदूरों की मजदूरी छोड़ कर) । आम आदमी की हालत लगातार खराब होती जा रही है ।

आज के समय में भारत काफी तरक्की कर रहा है। आज भारत विश्व की चौथे नंबर की अर्थव्यवस्था है। आज लगभग हर क्षेत्र में भारत अच्छी तरक्की कर रहा है। हमारी क्षमता का लोहा सारी दुनिया मान रही है। लेकिन इतनी तरक्की होने के बावजूद भारत आज भी गरीब राष्ट्रों में शुमार है। भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए गरीबी एक अभिशाप बनकर उभरी है। इसलिए राष्ट्रहित में यह आवश्यक है की इसका उन्मूलन किया जाये । आज जीडीपी के आंकड़े सिर्फ कागजों तक ही सीमित है। असल में तो आज भी झुग्गी झोपडी में रहने वाले लोग 40 से 50 रूपये रोजाना कमाते है। उनका जीवनस्तर काफी निम्न है। उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। देश की आधाी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यापन कर रही है। इसलिए यह आवश्यक है की इस गंभीर समस्या की तरफ सरकार का धयान आकर्षित होना चाहिए । विश्व संस्थाएं ,विश्व बैंक आदि भी निर्धानता दूर करने के लिए काफी मदद करते है। लेकिन वह मदद भ्रष्टाचार के कारण गरीबों तक नहीं पहुँच पाती । इसके कारण उनकी स्तिथि में कोई सुधार नहीं हुआ है। इससे निपटने के लिए सबसे पहले सरकार को भ्रष्टाचार दूर करना पड़ेगा । तभी सही मायने में गरीबी का उन्मूलन होगा । इसके लिए सरकार के साथ-साथ जनता का भी फ़र्ज़ बनता है कि अपनी कमाई का छोटा सा हिस्सा गरीबो को देना चाहिए तभी भारत सही मायने में विकसित देश कहलायगा । योजना आयोग के मुताबिक देश में गरीबी कम हो रही है जबकि पिछले दिनों विश्व बैंक ने भारत में गरीबी के बारे जो आंकड़े पेश किए हैं, वे आंखें खोलने वाले हैं। संस्था के आकलन के अनुसार, गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी के प्रतिशत के लिहाज से भारत की स्थिति केवल अफ्रीका के सब-सहारा देशों से ही बेहतर है।

विश्व बैंक की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार विश्व के कुल गरीब लोगों में से 33 प्रतिशत सिर्फ भारत में ही रहते हैं । देश में हर वर्ष 25 लाख से ज्यादा लोग भूख से मरते हैं । औसतन 7000 लोग रोज भुखमरी के शिकार होते हैं । संसार में भुखमरी से मरनेवाले लोगों में भारत पहले स्थान पर है ।देश में 20 करोड़ से ज्यादा लोग रोज रात भूखे सो जाते हैं । 85 करोड़ भारतीय 20 रुपया प्रतिदिन की आमदनी पर गुजारा करते हैं । भारत में गरीबों की परिस्थितियां इतनी बुरी है कि इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है इन्हीं स्थितियों के कारण संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने अपनी 2013 की मानव विकास रपट में भारत को दुनिया के 186 देशों में 136 वें नंबर पर रखा है। तेज आर्थिक विकास का दावा करने वाला भारत आज गरीबी के धरातल पर अफगानिस्तान, बांग्लादेश, कंबोडिया, किर्गिजिस्तान, लाओस, पाकिस्तान, नेपाल, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, वियतनाम और यमन के समकक्ष है। इनमे से भी वियतनाम और उजबेकिस्तान देश मानव विकास सूचकांक के कई मामलों में भारत से बेहतर है।

हमने गरीबी और गरीबो को जानने के लिए एक रेखा खीच दी है जिसे गरीबी रेखा कहते है पर आजादी के बाद से लेकर आज तक इस रेखा का उपयोग सिर्फ भ्रष्टाचार करने ,गरीबो के नाम पर योजनाये बनाकर उनको लुटने के काम ही आई है।  हमारे समाज में एक ऐसी रेखा खिंच गयी है या खींच दी गयी है जो मनुष्य को दो हिस्सों में बांटता है। एक वह जो अमीर है दूसरा वह जो गरीब है। अमीर होने के लिए आपके पास क्या कुछ होना चाहिए इसकी परिभाषा सबके लिए अलग है लेकिन जो साधन संपन्न हैं वे अपने आप को अमीर मानते हैं । जिनके पास साधन नहीं है वे गरीब लोग हैं । अब अमीर होने के लिए जरूरी है कि गरीब उन साधानों को इकट्ठा करे जिससे वह अमीरों की श्रेणी में आ सके । जिससे कभी कभी वर्ग संघर्ष भी पैदा होता है। आज देश में हालत ऐसे है कि गरीब की सुनने वाला कोई नहीं है सरकारी विभागों में लाल फीताशाही इतनी हावी है कि वह अपने छोटे छोटे कामों और दो वक्त की रोटी के लिए दर दर भटकता रहता है। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाओ पर गरीब को कभी सही प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता और अधिकांश योजनाये भ्रष्टाचार की भेट चढ जाती है। गरीबों के लिए सिर्फ योजनाये बनाने से कुछ नहीं होगा ,उनका सही क्रियान्वन हो यह भी सुनिश्चित करना पड़ता है। क्योकि उपर से नीचे तक बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार है ,इसको खत्म करना पड़ता है।

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