उमा भारती के डर से उभरता डर

6:38 pm or July 7, 2015
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—–वीरेन्द्र जैन——

श्री नरेन्द्र मोदी मंत्रिमण्डल की केबिनेट मंत्री हैं सुश्री उमा भारती। वे न केवल मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री हैं अपितु अयोध्या राम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण आन्दोलन के दौरान नेतृत्वकारी भूमिका में रहते हुए बाबरी मस्ज़िद टूटने के मामले में आरोपी होने के कारण भी उन्हें विशेष सुरक्षा प्राप्त है। उन्होंने एक पत्रकार की मृत्यु से जनित जनभावनाओं के कारण व्यापम घोटाले की जाँच में आयी उथल पुथल के बाद एक टीवी चैनल को साक्षात्कार दिया। इस साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि व्यापम से जुड़े अनेक आरोपियों, गवाहों, आदि के असामायिक मृत्यु के बाद उन्हें भी डर लगने लगा है। उन्होंने संकेत में सीबीआई से जाँच कराने की अपनी पुरानी माँग दुहराते हुए यह भी कहा कि किसी सक्षम एजेंसी से इसकी जाँच करानी चाहिए। जाहिर है हाईकोर्ट के आदेश से नियुक्त एसटीएफ और उसी के आदेश से एसटीएफ पर निगरानी रखने के लिए नियुक्त एसआईटी के निरीक्षण में कार्यरत एजेंसी से अधिक सक्षम सीबीआई ही हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस घोटाले में जिन सत्तरह आरोपियों की सिफारिश में उनका नाम भी जोड़ा गया है वे उन सत्तरह लोगों के जीवन के प्रति भी चिंतित हैं।

सुश्री उमा भारती का यह डर न केवल पूरे देश को डराता है अपितु इस डर के बयान से अनेक सवाल भी खड़े होते हैं। व्यापम में अनेक प्रशासनिक अधिकारियों समेत भाजपा और संघ के कई लोग अब तक आरोपी हैं जिनमें कई जेल में हैं, जमानत पर हैं, और कई फरार हैं। इनमें से लगभग 45 व्यक्तियों की म्रत्यु हो चुकी है पर न तो मृतकों ने अपनी मृत्यु के पूर्व किसी तरह का डर व्यक्त किया था और न ही अन्य किसी जीवित आरोपी ने ही कोई डर व्यक्त किया भले ही वे डरे हुए हों। कैसी अचम्भित करने वाली बात है कि यह डर उस व्यक्ति ने व्यक्त किया है जो भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं में से एक हैं और संगठन व सरकार के उच्च पदों को सुशोभित कर रही हैं। वे न केवल अपनी पोषाक के कारण ही सम्मान पा लेती हैं अपितु प्रवचन कला से विकसित हुयी भाषण कला और मुखरता के कारण भी फायर ब्रांड नेता कहलाती रही हैं। जब वे मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार सिर मुढाने के लिए तिरुपति बालाजी गयी थीं तब उस तीर्यस्थल के दान पात्र में आम दिनों की तुलना में कई लाख रुपये अधिक निकले थे और कहा गया था कि यह राशि उनकी ओर से ही चढायी गयी थी। जब उन्होंने भाजपा से अलग होकर अपनी अलग व्यक्ति केन्द्रित पार्टी बनायी थी और चुनाव लड़ा था तब उन्हें प्रदेश में बारह लाख वोट मिले थे व पाँच उम्मीदवार विजयी हुये थे। यह बतलाता है कि वे न केवल आर्थिक रूप से मजबूत हैं अपितु उनके समर्थकों की संख्या भी समुचित है, किंतु वे फिर भी डरी हुयी हैं। उल्लेखनीय है कि जब वे पार्टी से अलग थीं और बड़ा मल्हरा उपचुनाव में उनके उम्मीदवार को हराने को शिवराज सिंह ने प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था तब एक मतदान केन्द्र पर धाँधली की शिकायत करने पर उनका टकराव हो गया था और भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा उन पर हमला किया गया था। तब उन्होंने भाग कर एक मन्दिर में अपने को बन्द करके जान बचायी थी व पुलिस में शिकायत की थी कि शिवराज ने उन पर जान लेवा हमला करवाया है। उल्लेखनीय यह भी है कि जब उन्होंने दोबारा पार्टी में आने की कोशिश की थी तो आरएसएस द्वारा हरी झंडी दे देने के बाद भी शिवराज के विरोध के कारण उनका प्रवेश एक साल तक लटका रहा था तथा शिवराज ने अपनी स्तीफा देने की धमकी को तब ही वपिस लिया था जब उनके मध्य प्रदेश में सक्रिय होने पर प्रतिबन्ध लगाने की शर्त मान ली गयी थी। उन्हें भाग कर उत्तर प्रदेश जाना पड़ा जहाँ से वे पहले विधायक और फिर सांसद चुनी गयीं।

शिवराज से उनके हाथ जरूर मिल गये किंतु दिल कभी नहीं मिले। लोकसभा चुनावों के दौरान मोदी की भोपाल की आम सभा में आने की सूचना उन्हें अंतिम समय में दी गयी और यही बात उन्होंने उस आमसभा में भी कही। मध्य प्रदेश से उनको दूर रखने की योजना के कारण ही उन्हें उत्तर प्रदेश से विधायक और सांसद बनवाया गया था, व सीमित रखने के लिए ही उन्हें वह मंत्रालय बना कर दे दिया गया जिससे उन्हें मध्य प्रदेश की ओर झाँकने का मौका न मिले, ऐसा हुआ भी और इस कारण वे पिछले एक वर्ष से लगभग मौन हैं। इस बीच काँग्रेस ने जो एक्सिल शीट निकाली उसके अनुसार सिफारिशों की शीट में से कुछ नाम मिटा कर उमा भारती का नाम लिख दिया गया था। यह उन्होंने अपने खिलाफ षड़यंत्र माना और इससे पुरानी दुश्मनी को खाद पानी मिल गया।

जब उमा भारती खुले आम प्रैस के सामने डर की बात कर रही हैं तो सवाल उठता है कि उन्हें डर किससे है। क्या अपनी ही पार्टी और संगठन के लोगों से डर है? क्या यह डर है कि वे जाँच एजेंसियों के सामने कुछ ऐसा सच बता सकती हैं जिससे आरोपियों के आरोप प्रमाणित हो जायें? जिसके पास ऐसे राज नहीं हैं उसे डर क्यों होना चाहिए? उनकी सिफारिश पर चयनित बताये गये जिन सत्तरह लोगों पर खतरे की बात वे कर रही थीं उनकी जान को किससे खतरा हो सकता है? क्या वे उन्हें डरा रही थीं? बहरहाल देखने वाली बात यह है कि अपनी पार्टी में कभी पूर्ण लोकतंत्र महसूस करते हुए जो उमा भारती खुले आम अटल बिहारी और आडवाणी जी को भला बुरा कहते हुये बैठक छोड़ कर जाने में नहीं डरती थी, अलग पार्टी बना कर पद यात्रा निकाल सकती थीं, काँग्रेस द्वारा घेर कर खजुराहो लाये गये विधायकों को मुक्त कराने के लिए होटल का गेट तोड़ कर अपनी जीप ले जा सकती थीं, वे अपनी ही पार्टी के शासन में भाई बताने वाले शिवराज, और भरोसे की एसटीएफ, एसआईटी और उच्च न्यायालय से भयभीत क्यों हैं? क्या इसलिए कि यह सत्ता से संगठन तक मोदी के वर्चस्व वाली पार्टी है जहाँ संजय जोशी और हरेन पंड्या को भी माफ नहीं किया जाता। जहाँ जाँचों के परिणाम पहले ही तय हो जाते हैं, जहाँ अपराध होते हैं, हिंसा होती है पर कैद और सजा दोषी की जगह किसी और को होती है। क्या उमा भारती का यह डर नये शासन, और पार्टी के नये संगठन का डर है। क्या निर्भय उमा भारती फिर से देखने को मिल सकेंगी जो सच को लपेट कर नहीं कहेंगीं?

अब जब उनकी इच्छा के अनुसार सीबीआई से जाँच की माँग मान ली गयी है तो क्या वे अपने भेष को सम्मान देते हुए अपने राग द्वेश भय और लालच से मुक्त होकर सच सच कहने का साहस दिखायेंगी? उमाजी, गंगा अपने साफ हो सकने का भरोसा तब ही करेगी।

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