अमीरी बनाम गरीबी

3:32 pm or July 11, 2015
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—–शैलेन्द्र चौहान——

जनगणना के ताजा आंकडों के मुताबिक ग्रामीण इलाकों के तीन चौथाई परिवारों की आमदनी पांच हजार रुपए महीने से ज्यादा नहीं है। गांवों में रहने वाले बानबे फीसद परिवारों की आय प्रतिमाह दस हजार रुपए से कम है। शहरी इलाकों के आंकड़े फिलहाल जारी नहीं किए गए हैं। पर वे जब भी सामने आएंगे, देश की कुल तस्वीर लगभग ऐसी ही उभरेगी इसलिए कि देश की तिहत्तर फीसद आबादी का सच सामने आ चुका है। दूसरे, शहरों में भी, एक छोटा वर्ग भले संपन्नता के टापू पर रहता हो, गरीबी का दायरा बहुत बड़ा है। सामाजिक-आर्थिक जनगणना के आंकड़े यह भी बताते हैं कि गांवों में रहने वाले इक्वावन फीसद परिवार अस्थायी, हाड़-तोड़ मजदूरी के सहारे जीते हैं। करीब तीस फीसद परिवार भूमिहीन मजदूर हैं। सवा तेरह फीसद परिवार एक कमरे के कच्चे मकान में रहते हैं। जबकि देश के निन्यानबे प्रतिशत नेता करोड़पति हैं। 2014 में लोकसभा के लिए हुयेेे आम चुनावों में नामांकन भरने की प्रक्रिया के दौरान नेताआें ने अपनी संपत्ति का जो ब्यौरा दिया उससे तो कम से कम यही लगता है। निवार्चन आयोग के समक्ष दिए हलफनामे में कई शीर्ष नेताआें की संपत्ति का विवरण गरीब देशवासियों को चौंकानेवाला नहीं है। देश के पूंजीपति व्यवसायी और उद्योगपतियों के पास अरबों खरबों की संपत्ति है। कुछ की गिनती दुनिया के सर्वाधिक अमीरों में होती है। आज हमारे देश में विदेशी कंपनियां आधिकारिक रूप से 2,32,000 करोड़ का शुद्ध मुनाफा कमा रही हैं। बाकी सभी तरह का फर्जी हिसाब, उनका आयातित कच्चे माल का भुगतान, चोरी आदि को जोड़ा जाय तो यह रकम 25,00,000 करोड़ सलाना बैठती है। यहां दवाओं का सालाना कारोबार 10,00,000 करोड़ का है। सालाना 6,00,000 करोड़ का जहर का व्यापार विदेशी कंपनियां कर रही है। देश में 10,000 लाख करोड़ का खनिज पाया जाता है और इसका दोहन भी विदेशी कंपनियां बहुत ही सस्ते भाव पर कर रही हैं। वहीं आजादी के बाद 400 लाख करोड़ रुपया विदेशी बैंकों में जमा होता है। धर्म के नाम पर मन्दिरों में चढ़ने वाला चढ़ावा भारत के योजना व्यय के बराबर है। अकेले 10 धनी मन्दिरों की सम्पत्ति देश के मध्यम वर्ग के 500 उद्योगपत्तियों से ज्यादा हैं। आज़ादी के बाद पहले प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने उद्योगों को आधुनिक मन्दिर कहा था लेकिन आज छह दशक बीतने के बाद लगता है कि मन्दिर आधुनिक उद्योग बन चुके हैं। केवल सोने की बात की जाये तो 100 प्रमुख मन्दिरों के पास करीब 3600 अरब रुपये का सोना पड़ा है। शायद इतना सोना रिज़र्व बैंक ऑफ इण्डिया के पास भी न हो। मन्दिरों के इस फलते-फूलते व्यापार पर मन्दी का भी कोई असर नहीं पड़ता है! उल्टा आज जब भारतीय अर्थव्यस्था संकट के दलदल में फँसती जा रही है तो मन्दिरों के सालाना चढ़ावे की रक़म लगातार बढ़ती जा रही है। ज़ाहिरा तौर पर इसके पीछे मीडिया और प्रचार तन्त्र का भी योगदान है जो दूर-दराज़ तक से ”श्रद्धालुओं” को खींच लाने के लिए विशेष यात्रा पैकेज देते रहते हैं। जहाँ देश की 80 फीसदी जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, पानी जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी मयस्सर नहीं हैं वहीं मन्दिरों के ट्रस्ट और बाबाओं की कम्पनियाँ अकूत सम्पत्ति पर कुण्डली मारे बैठी हैं। सिर्फ कुछ प्रमुख मन्दिरों की कमाई देखें तो इस ग़रीब देश के अमीर भगवानों की लीला का खुलासा हो जायेगा। तिरुपति बालाजी भारत के अमीर मन्दिरों की लिस्ट में नम्बर एक पर है। इस मन्दिर का ख़ज़ाना पुराने ज़माने के राजा-महराजाओं को भी मात देने वाला है क्योंकि बालाजी के ख़ज़ाने में आठ टन तो सिर्फ आभूषण हैं! अलग-अलग बैंकों में मन्दिर का 300 किलो सोना जमा है और मन्दिर के पास 1000 करोड़ रुपये के फिक्स्ड डिपोज़िट हैं। एक अनुमान के मुताबिक़ तिरुपति बालाजी मन्दिर में हर दिन लगभग 70 हज़ार श्रद्धालु आते हैं जिस कारण हर महीने मन्दिर को सिर्फ चढ़ावे से ही नौ करोड़ रुपये से भी ज्यादा की आमदनी होती है और इसकी सालाना आय क़रीब 650 करोड़ है। इसलिए बालाजी दुनिया के सबसे दौलतमन्द भगवान कहे जाते हैं। जनता के दुख-दर्द दूर कराने वाले भगवान बालाजी की सम्पत्ति की रक्षा के लिए 52 हजार करोड़ रुपये का बीमा कराया गया है। इसके अलावा बालाजी के विशेष भक्तों की भी कमी नहीं हैं जो समय-समय पर बालाजी को मूल्यवान चढ़ावे अर्पण करते रहते हैं। इन्हीं भक्तों की सूची में ग़ैरक़ानूनी खनन के सबसे बड़े सरगना रेड्डी बन्धु भी हैं जिन्होंने खनन कारोबार के 4000 करोड़ रुपये के मुनाफे में से 45 करोड़ रुपये का हीरों से जड़ा मुकुट चढ़ाया ताकि उनके काले धन्धों पर भगवान की कृपा बनी रहे। तिरुपति बालाजी के बाद देश में सबसे ज्यादा लोग वैष्णो देवी के मन्दिर में आते हैं। 500 करोड़ रुपये की सालाना आय के साथ वैष्णो देवी मन्दिर भी देश के अमीर मन्दिरों में शामिल है। मन्दिर के सीईओ आर.के. गोयल के अनुसार हर गुज़रते दिन के साथ मन्दिर की आय बढ़ती जा रही है। शिरडी स्थित साईं बाबा का मन्दिर महाराष्ट्र के सबसे अमीर मन्दिरों में से एक है। सरकारी जानकारी के मुताबिक़ इस प्रसिद्ध मन्दिर के पास 32 करोड़ रुपये के आभूषण हैं और ट्रस्ट के पास 450 करोड़ रुपये की सम्पत्ति है। पिछले कुछ साल में साईं बाबा की बढ़ती लोकप्रियता के कारण इसकी दैनिक आय 60 लाख रुपये से ऊपर है और सालाना आय 210 करोड़ रुपये को पार कर चुकी है। पिछले साल तिरुवनन्तपुरम के पद्मनाथ मन्दिर के गर्भगृहों से मिली बेशुमार दौलत के बाद यह बालाजी मन्दिर को पीछे छोड़ते हुए देश का सबसे अमीर मन्दिर बन गया है। गुप्त गर्भगृहों में मिला ख़ज़ाना खरबों रुपये का है जिसमें सिर्फ सोने की मूर्तियों, हीरे-जवाहरत, आभूषण और सोने-चाँदी के सिक्कों का मूल्य ही पाँच लाख करोड़ रुपये है। अभी तक मन्दिर के दूसरे तहखाने खुलने बाकी हैं जिनसे अभी और बेशुमार दौलत निकल सकती है। मन्दिरों में आने वाले चढ़ावों से लेकर मन्दिरों के ट्रस्टों और महन्तों की सम्पत्ति स्पष्ट कर देती है कि ये मन्दिर भारी मुनाफा कमाने वाले किसी उद्योग से कम नहीं हैं। यहां बाबाओं का बोलबाला है, वे किसी माफिया से कम नहीं हैं। जिस देश में धर्म-कर्म, नियति और पाखंड की सत्ता हो, जहां के राजनेताओं को बस अपनी ही चिंता रहती हो, वे अरबों-खरबों के घोटालों में लिप्त हों उस देश का यह हाल सुनिश्चित है। नारों और भ्रम की राजनीति की यही वास्तविकता है।

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