अंधेरों को घना करते कलाकार!

4:13 pm or July 17, 2015
Vashali story photo (Pandara Park VC Chaturvedi) on 09th June 2015 Tuesday.
Photo by Ramesh Sharma

—–कृष्ण प्रताप सिंह——

खबर आयी है कि देश के कई लब्धप्रतिष्ठ कलाकारों ने राजधानी दिल्ली के कलाकारों के कोटे के टाइप-4 व टाइप-5 के कुूल उपलब्ध चालीस में से सताइस सरकारी मकानों पर एक दशक से ज्यादा अवधि से अवैध रूप से कब्जा कर रखा है, जिसके चलते उन्हें पाने के पात्र नये कलाकार अपने हक से वंचित हुए जा रहे हैं।

नियमानुसार ये मकान अपनी कला की उल्लेखनीय श्रीवृद्धि करने वाले उन कलाकारों को आवंटित किये जा सकते हैं, जिनके पास राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र में अपने मकान नहीं हैं और मासिक आय बीस हजार रूपये या उससे कम है। इनका आवंटन महज तीन साल के लिए किया जाता है, जिसे विशेष परिस्थिति में तीन साल और बढ़ाया जा सकता है। प्रावधान है कि जिस कलाकार को ये मकान दिये जायें, उसकी उम्र चालीस से साठ साल के बीच होनी चाहिए। यह भी कि सम्बन्धित कलाकार के देहावसान के बाद उसके परिजन हर हाल में अगले छः महीने में सम्बन्धित मकान खाली कर देंगे। इस अवधि में भी उन्हें दो महीनों का सामान्य और चार महीनों का दोगुना किराया अदा करना होगा। इन मकानों के इच्छुक नये प्रतिभाशाली कलाकारों के आवेदनों पर विचार के लिए बनी समिति हर छठे महीने अपनी बैठक करती है।

लेकिन जो हालात हैं, उनमें लगता है कि न इस समिति के लिए नियम-कायदों का कोई मतलब है, न ही उन कलाकारों के लिए जो इन मकानों पर लम्बे वक्त से कब्जा जमाये हुए हैं। उनमंे कई ऐसे हैं जिन्हें उनकी कला की आराधना अब खासी फलने-फूलने लगी है, उसकी बदौलत वे लाखों रूपया महीना अर्जित करने लगे हैं और उन्होंने राजधानी में ही सरकारी मकान के मुकाबले कई गुना भव्य मकान बनवा लिये हैं। इससे सरकारी मकान की उनकी पात्रता स्वतः समाप्त हो गयी है। फिर भी इसे लेकर वे अपनी आत्मा पर कोई बोझ महसूस नहीं कर रहे, न ही खुद को किसी नैतिक प्रश्न के सामने खड़ा करना चाहते हैं। उन्हें इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा कि उनकी इस कारस्तानी का सर्वाधिक दुष्प्रभाव जरूरतमंद और पात्र कलाकारों पर ही पड़ रहा है।

अवैध कब्जेदार कलाकारों की सूची पर नजर डालें तो हैरत होती है कि उनमें से कई ऐसे हैं जिन्होंने अपने जीते जी तो कब्जा नहीं ही छोड़ा, अब उन्हें इस दुनिया से गये लम्बा अरसा गुजर गया है, फिर भी उनके परिजन उन्हें खाली करने को तैयार नहीं हैं। शहरी विकास मंत्रालय द्वारा इसके लिए हर छठे महीने उन्हें जारी किये जाने वाले नोटिसों का भी उनके निकट कोई मतलब नहीं है। उदाहरण के लिए, सितारवादक उस्ताद अली विलायत का देहांत हुए ग्यारह साल बीत चुके हैं, जबकि ध्रुपद कलाकार उस्ताद आर. एफ. के. डागर और रुद्रवीणा कलाकार असद अली खान के देहांत को चार-चार साल। फिर भी इनके परिजन उनके जीवित रहते उन्हें आवंटित मकानों में मजे से रह रहे हैं। मजे की बात यह कि ये मकान उस्ताद अली विलायत को उनके देहांत के 24 साल पहले, उस्ताद आर. एफ. के. डागर को नौ साल पहले और असद अली खान को 20 साल पहले आवंटित किये गये थे।

लेकिन मामला महज इतना ही नहीं है। अवैध कब्जेदारों में कथक की महानतम हस्ती माने जाने वाले बिरजू महाराज का भी नाम है। वे 36 साल से तो मोहिनीअट्टम कलाकार भारती शिवाजी 27 साल से सरकारी मकान पर काबिज हैं। उन्हीं के नक्शेकदम पर चलकर कथक कलाकार गीतांजलि लाल व गुरु जितेन्द्र, ओडिसी कलाकार एच. के. बेहरा व मायाधर राऊत और पेंटर जतिन दास 26-26 साल से उन्हें आवंटित मकानों में जमे हुए हैं। थियेटर कलाकार जाॅय माइकेल और गजल गायिका रीता गांगुली 25 साल से तो प्रिंटमेकिंग से जुड़े डी. देवराज, गायन से जुड़े गुलाम सिद्दीक, ब्राडकास्टर सुरजीत सेन और सारंगी कलाकार साबरी खान 24-24 साल से अपना मकान खाली करने का नाम नहीं ले रहे। कुचिपुडी के राजा रेड्डी इक्कीस साल से तो कुचिपुडी के ही गुरु जयारामाराव और ध्रुपद के एफ. डब्ल्यू. डागर सरकारी मकानों में 16 साल से धूनी रमाये हुए हंै। ग्यारह साल पुराने कब्जेदारों में भी भजन सोपोरी {संतूर}, जी. आर इरान्ना {पेंटर}, कमलिनी {कथक}, के. आर सुब्बाना {पेंटर}, मोहन महर्षि {थियेटर}, रानी सिंघल {भरतनाट्यम}, एस. कनक {भरतनाट्यम} और सुनील कोठारी {क्रिटिक} जैसे प्रतिष्ठित नाम शामिल हंै।

नेता और मंत्री ऐसे काम करें तो हम उन्हें आसानी से कोस लेते हैं क्योंकि वे ऐसी प्रवृत्तियों के लिए जाने ही जाते हैं। फोकट की कार, बंगले या मलाईदार पद का मामला हो तो वे खुद को किसी भी सीमा या मर्यादा में नहीं बांधते। लेकिन ईमानदार, नैतिक व संवेदनासम्पन्न माने जाने वाले कलाकारों की ऐसी संवेदनहीन अनैतिकता पर क्या कहा जाये?

जानना दिलचस्प है कि इन मकानों का आवंटन करने वाली समिति की अध्यक्षता संस्कृति मंत्रालय के सचिव करते हैं, जिसके सदस्यों में इसी मंत्रालय के संयुक्त सचिव {संगीत नाटक अकादमी}, ललितकला अकादमी के सचिव, साहित्य अकादमी के सचिव, नेशनल स्कूल आफ ड्रामा के निदेशक और सम्पत्ति विभाग के निदेशक शामिल हैं। पर अब नये कलाकारों के आवेदनों पर वे ‘मकान हैं कहां’ कहकर हाथ खड़े कर लेते हैं। यह बताये जाने पर कि अवैध कब्जे में हैं और खाली कराकर उपलब्ध कराये जा सकते हैं, जिम्मेदारी टालने और बहाने बनाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। शहरी विकास मंत्रालय के सूत्रों की मानें तो कोई अधिकारी ‘बेचारे’ कलाकारों से सख्ती का कलंक अपने सिर नहीं लेना चाहता, जबकि इन बड़े कलाकारों की अंतरात्मा ऐसी सोई हुई है कि जागने का नाम ही नहीं लेती। उनमें से कोई भी अपनी ओर से मकान खाली करने का प्रस्ताव करके ईमानदारी या नैतिकता का उदाहरण नहीं प्रस्तुत करना चाहता। भले ही कलाकार के तौर पर उसका काम पवित्र सांस्कृतिक मूल्यों की मशाल लेकर जनता के आगे-आगे चलना हो।

सचाई यह है कि भूमंडलीकरण व्यापने के बाद राजधानी में ऐसे ‘कलाकारों’ की बाढ़-सी आ गयी है जो अपनी कला की सार्थकता महज इसी में समझते हैं कि उसके बूते ऐश्वर्य का एक कोना अपने नाम आरक्षित करा लें। कला की सेवा हो या कुसेवा, उसकी आड़ में वे सरकारी मकान से लेकर स्काॅलरशिप, फेलोशिप, पुरस्कार और विदेशदौरा तक सब कुछ झटकने के फेर में रहते हैं। हां, सत्ताओं की नजर ए इनायत भी। इसके लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं और सही-गलत या उचित-अनुचित के फेर में नहीं पड़ते। दूसरी ओर अकादमियां हों, कला स्कूल या कलाविद, कोई भी बाजार के साथ अपनी चेतना व संस्कारों के टकराव से नहीं बच पा रहा। इसके चलते कलाकारों में नेताओं जैसी भेड़चालें व अनैतिकताएं घर कर रही है।

कलाकारों का काम देश व समाज में फैले अंधेरों को उजालों में बदलना होता है लेकिन इस स्थिति से बचाव संभव नहीं हुआ तो उनमें से कई अंधेरे को और धना ही करेंगे।

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