अंतर्मन को टटोलती है ‘मसान’

6:58 pm or July 25, 2015
Review of Masaan by Siddhart Shankar Gautam

——सिद्धार्थ शंकर गौतम——

कुछ फिल्में होती हैं जो दर्शकों की संख्या को तो तरसती हैं लेकिन जो इन्हें देखते हैं वे बता सकते हैं कि उन्होंने क्या अनुभव किया? यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि क्योंकि मैं जिस सिनेमाघर में ‘मसान’ देखने गया, वहां पहले तो मुझे टिकट देने से ही मना कर दिया गया क्योंकि 40 सीटर भव्य सिनेमाघर (लाउंज) में ‘मसान’ देखने वाला मैं अकेला दर्शक था। हालांकि बाद में किसी तरह दो दर्शकों को तैयार किया (क्योंकि उन्हें बजरंगी भाईजान की टिकट नहीं मिली थी) और काफी दबाव के बाद सिनेमाघर में ‘मसान’ के सुबह के शो की टिकट दी गई। कुल जमा तीन लोग, असीम शांति और बेहतरीन चलचित्र; ‘मसान’ को देखने का शायद यही सबसे उपयुक्त माध्यम था। भारतीय दर्शकों के सामने आने से पहले ही ‘मसान’ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा पा चुकी है। ‘मसान’ ने हाल ही में कांस में एक नया इतिहास बनाया, जब यह इस प्रतिष्ठित फिल्म समारोह में दो पुरस्कार जीतने वाली पहली भारतीय फिल्म बनी। फिल्म ने फैडरेशन इंटरनेशनल दे ला प्रेस सिनेमैटोग्राफिक – इंटरनेशनल फैडरेशन ऑफ फिल्म क्रिटिक्स (एफआईपीआरईएससीआई) का प्रतिष्ठित पुरस्कार जीतने के साथ ही अनसर्टेन रिगार्ड सैक्शन में प्रोमिसिंग फ्यूचर अवार्ड भी हासिल किया। ‘मसान’ की सबसे बड़ी उपलब्धि थी, विदेशी दर्शकों द्वारा इसके सम्मान में 15 मिनट तक लगातार खड़े होकर तालियां बजाना। हालांकि भारतीय दर्शक इसे पसंद करेंगे; इसमें मुझे संदेह है क्योंकि यह आम मसाला फिल्म नहीं है। यह नैतिकता और अंतर्द्वंद्व के बीच झूलती ऐसी कहानी है जो सभी को अपनी सी लगेगी। किसी भी छोटे शहर से सीधे जुडऩे वाली इस कहानी में हमें हमारे आसपास की जिंदगी का अक्स नजर आएगा।

कहानी: देवी (ऋचा चड्ढा) एक आजाद ख़याल और आत्मनिर्भर लड़की है जो अपनी शारीरिक जरूरतों के प्रति संकुचित सोच न रखते हुए उन्हें आभासी दुनिया से आगे ले जाती है। होटल के जिस कमरे में अपने दोस्त पियूष के साथ वह अंतरंग होती है वहां पुलिस की रेड पड़ जाती है। संभ्रात घर का लड़का बदनामी के भय से आत्महत्या कर लेता है और देवी को पुलिस पकड़ कर थाने ले जाती है। रेड मारने वाला इंस्पेक्टर देवी का इकरारनामा वीडियो रूप से शूट करके उसे पिता विद्याधर पाठक (संजय मिश्रा) से तीन लाख की रिश्वत मांगता है। दीपक (विक्की कौशल) अपने परिवार के साथ मुर्दों के अंतिम संस्कार का काम करता है। नीची जाति का  शिक्षित युवक दीपक अपने से ऊंची जाति की शालु (श्वेता त्रिपाठी) से प्यार करता है और शालु यह जानते हुए भी उसके साथ घर बसाना चाहती है। दोनों कहानियां साथ चलते-चलते आखिर में एक हो जाती हैं और पीछे छूट जाता है दुखों का अथाह सागर, मुर्दा जलते शरीर से उड़ती राख में छुपा आंसुओं का सैलाब, साफगोई के बावजूद गलत ठहराए जाने का दंश और समाज की कथित नैतिकता का नंगा नाच। कुल मिलाकर ‘मसान’ नाटकीयता में भी सांसारिक आभास देती है जहां सही होते हुए भी इंसान को तमाम वर्जनाओं में जीना पड़ता है।

अभिनय: ऋचा चड्ढा फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष हैं और उन्होंने एक बार फिर खुद को साबित किया है। मजबूर बेटी और आत्मनिर्भर महिला के द्वंद्व को उनकी अदाकारी ने नए आयाम दिए हैं। संजय मिश्रा हमेशा की तरह लाजवाब रहे हैं। बेटी का बाप होना कितने झंझावातों से गुजरने जैसा है, यह उन्होंने परदे पर जीवंत किया है। विक्की कौशल की अदाकारी ने साबित किया है कि इंडस्ट्री में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। श्वेता त्रिपाठी की मासूमियत और नैन-नक्श फिल्मकारों को आकर्षित करेंगे। अन्य कलाकार ठीक-ठाक हैं।

निर्देशन: निर्देशक नीरज घेवन जाने-माने फिल्मकार अनुराग कश्यप के पहले निर्देशक के तौर पर काम कर चुके हैं। उन्होंने ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ और ‘अगली’ जैसी फिल्मों के निर्माण के दौरान अनुराग के साथ काम किया है। अनुराग की शैली नीरज के निर्देशन में भी देखने को मिली है। बनारस को इससे पहले शायद ही किसी फिल्मकार ने इतना अलग फिल्माया हो। दुष्यंत कुमार की मशहूर शायरी ‘तू किसी रेल सी गुजरती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूं’ के जरिए नीरज कहानी में काव्यात्मक रंग भरकर उसे और मधुर बना देते हैं। नीरज बिना किसी बहस के दर्शकों को उद्वेलित करते हैं और साफगोई से अपनी बात रखते हैं। वरुण ग्रोवर के संवाद सीधे-सपाट और समझ में आने वाले हैं। कहीं-कहीं बनारसी भाषा का प्रयोग है किन्तु उससे किसी तरह का कोफ़्त नहीं होता।

गीत-संगीत: इंडियन ओशॅन का संगीत फिल्म के हिसाब से उम्दा है। फिल्म के गीत भी वरुण ग्रोवर ने लिखे हैं। ‘मन कस्तूरी रे…जग दस्तूरी रे…बात हुई ना पूरी रे’ जैसे गीत फिलहाल सुनने को नहीं मिलते।

सारांश: ‘मसान’ जैसी फिल्मों की हिंदी सिनेमा को ज़रूरत है मगर अफ़सोस कि एक बड़ा दर्शक वर्ग ऐसी उम्दा फिल्मों को सिरे से खारिज कर देता है। ‘मसान’ आपके अंदर के भावों को जगाकर उन्हें झकझोर देती है और आप निर्णय नहीं कर पाते कि कौन सही था और कौन गलत? ‘मसान’ स्याह होते हुए भी सिनेमा की दृष्टि से उजली है जिसकी चमक कई दशकों तक मिसाल के रूप में कायम रहेगी।

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