कृपया चुनावी भाषणों को गालियों में तब्दील मत कीजिए

2:42 pm or August 13, 2015
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——शैलेन्द्र चौहान——-

एक समय था जब नेता एक-दूसरे के प्रति शालीन भाषा का इस्तेमाल करते थे। वे इसका ख्याल रखते थे कि राजनीतिक बयानबाजी व्यक्तिगत आक्षेप के स्तर पर न आने पाए। उनकी ओर से ऐसी टिप्पणियों से बचा जाता था जो राजनीतिक माहौल में कटुता और वैमनस्य पैदा कर सकती थीं। दुर्भाग्य से आज वह लक्ष्मण रेखा मिट गई है। नेताओं के बीच एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने की होड़ जिस तरह बढ़ती जा रही है उससे भारतीय लोकतंत्र की मर्यादा को आघात लग रहा है। बिहार विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की गरिमा का कोई ख्याल न रखते हुए जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया वह आहत करने वाली है। हद तो तब हो गई भाजपा के स्थानीय संयोजक शकुनि महाराज ने नीतीश कुमार को अब तक का सबसे लुच्चा सीएम कह डाला।  इस पर भी भाजपा शीर्ष नेताओं को कोई शर्म नहीं आई।  भारत में लोकतंत्र के भविष्य के लिए यह शुभ संकेत नहीं है। पिछले दिनों भाजपा कई मंत्री, सांसद और विधायक सांप्रदायिक सौहार्द को बिगड़ने की कोशिश करते नजर आए हैं लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है यह तो उनकी रणनीति का हिस्सा है। भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक विरोध स्वाभाविक है, लेकिन यह निराशाजनक है कि व्यक्तिगत आक्षेपों के कारण यह विरोध कटुता में तब्दील हो कर दिया जाये। देश की संसद और विधान सभाओं में भी हमारे जनप्रतिनिधि संयत और मर्यादित आचरण नहीं करते। राजनीतिक पार्टियां रणनीति बनाकर संसद और विधानसभा में हो-हल्ला करती हैं और कामकाज नहीं चलने देतीं। पार्टी नेतृत्व भी ऐसे नेताओं की चुनावी उपयोगिता देखता है, उनका आचरण नहीं। सूचना क्रांति के इस युग में अब नेताओं की कोई भी टिप्पणी जनता की निगाह से छिप नहीं सकती। बावजूद इसके वे किसी तरह का संयम दिखाने के लिए तैयार नहीं दिखते। नेताओं के चुनावी भाषण एक-दूसरे को चुनौती देने, तरह-तरह के आरोप लगाने और व्यक्तिगत आक्षेप करने तक सीमित रह गए हैं। नीतियों और मुद्दों की चर्चा तो बहुत दूर की बात हो गई है। चूंकि चुनाव के समय जनता का एक बड़ा वर्ग नेताओं के इस तरह के बयानों के प्रति रुचि प्रदर्शित करता है इसलिए मीडिया भी उन्हें महत्व देने से परहेज नहीं करता। वैसे भी जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले नेताओं के तौर-तरीके क्या हैं? इस देश में फिलहाल ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिससे जनता को प्रत्याशी की उन क्षमताओं के बारे में पता लगे जो किसी योग्य जन प्रतिनिधि या फिर शासन का संचालन करने वाले शख्स में होनी चाहिए।

गत वर्ष के इन नेताओं के बयानों के कुछ उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं है। कुछ उदहारण देखें – बिहार से भारतीय जनता पार्टी के सांसद और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह जब कहते हैं कि अगर राजीव गांधी गोरी चमड़ी वाली सोनिया गांधी के बजाय काली चमड़ी वाली किसी नाइजीरियन महिला से शादी करते तो भी क्या कांग्रेस पार्टी उस महिला को अपना नेता स्वीकार करती? गिरिराज सिंह के कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ रंगभेदी बयान पर नाराज़गी तो जताई जा सकती है लेकिन यह कोई हैरत की या नई बात नहीं है। गत वर्ष लोकसभा चुनाव के दौरान हाजीपुर में एक चुनाव सभा को संबोधित करते हुए भी सिंह ने एक बयान दिया था कि नरेंद्र मोदी के विरोधियों के लिए भारत में कोई जगह नहीं है और उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए। तब मंच पर पार्टी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी भी बैठे थे। लेकिन गडकरी ने उनके बयान की आलोचना में एक शब्द भी नहीं कहा. बड़बोले केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह बिहार के भूमिहारों के प्रभावशाली नेता हैं। भाजपा को यह उम्मीद रही होगी कि आने वाले विधानसभा चुनाव में वे बहुत उपयोगी साबित हो सकते हैं। वहीँ साध्वी निरंजन ज्योति भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ज़रूरत पड़ने पर बहुत काम की सिद्ध होंगी। इसलिए नेतृत्व ऐसे तत्वों को सजा देने की बजाय शह देता है। यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। आश्चर्य की बात यह है कि पार्टी नेतृत्व ने कभी भी इस तरह के बयानों की खुलकर आलोचना नहीं की। असलियत तो यह है कि भाजपा ने ऐसे नेताओं को दंडित करने के बजाय पुरस्कृत ही किया है। लोकसभा चुनाव के बाद गिरिराज सिंह को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल करके उन्हें इसका पुरस्कार दिया गया।पहली बार केंद्र में मंत्री बने गिरिराज ने केजरीवाल की तुलना राक्षस मारीच से कर दी और प्रधानमंत्री को राम कहा। इसमें संदेह नहीं कि चुनाव के समय नेताओं के बीच गर्मागर्मी बढ़ जाती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे अपने भाषणों में मर्यादा की दीवार ही गिरा दें। संप्रग सरकार के कार्यकाल के दौरान कांग्रेस का आरोप रहा कि भाजपा ने एक रचनात्मक विपक्ष की भूमिका अदा नहीं की और विरोध के नाम पर विरोध करने के उसके रवैये ने संप्रग सरकार को सही तरह काम नहीं करने दिया। इसके विपरीत भाजपा कांग्रेस पर अहंकारी रवैया प्रदर्शित करने का आरोप लगाती रही है। आज ठीक उसका उलटा हो रहा है आज कांग्रेस वही कर रही है जो भाजपा करती थी और राहुल गांधी भाजपा पर अहंकारी होने का आरोप लगा रहे हैं। पता नहीं क्या सही है, और क्या गलत लेकिन जो कुछ स्पष्ट है वह यह कि हमारे देश की राजनीति का स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है। मुश्किल यह है कि गिरावट का दौर थमता नहीं दिख रहा। राजनीतिक दल विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए गड़े मुर्दे उखाड़ने और उनके जरिये सनसनीखेज आरोप लगाने का काम कर रहे हैं। ऐसे माहौल में यह आवश्यक हो गया है कि राजनीतिक दल इस पर विचार करें कि बयानबाजी का स्तर कैसे सुधारा जाए? केवल चुनाव के समय ही नहीं, बल्कि सामान्य अवसरों पर भी राजनेताओं के लिए अपने भाषणों में संयम और शालीनता का परिचय देना आवश्यक है। किसानों की आत्महत्याओं तक को इन्होंने अपने निम्नस्तरीय बोलों से नहीं बख्शा।इससे पहले भी दिल्ली गैंगरेप और महिलाओं से जुड़े संवेदनशील मसलों पर कुछ नेता बेतुके और विवादित बयान दे चुके हैं। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय सलाहकार अशोक सिंघल ने बयान में कहा था कि महिलाओं का पाश्चात्य रहन-सहन दुष्कर्म सहित हर तरह के यौन उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार है। मध्य प्रदेश में भाजपा के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय तो और एक कदम आगे निकले। उन्होंने रामायण का उदाहरण देते हुए कहा कि सीताजी (महिलाएं) ने लक्ष्मण रेखा पार की, तो रावण उनका हरण कर लेगा। इसलिए महिलाओं को अपनी मर्यादा के भीतर ही रहना चाहिए। व्यापम घोटाले की पड़ताल कर रहे एक पत्रकार की मौत के सम्बन्ध में उनका रवैया पूरी तरह निंदनीय ही था। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पुत्र और सांसद अभिजीत मुखर्जी ने दिल्ली गैंगरेप के विरोध में हो रहे विरोध प्रदर्शन पर कहा था कि रेप के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने वाली महिलाएं डिस्को में जाने वाली होती है। जिन्हें हकीकत मालूम नहीं होती, वह केवल कैंडल मार्च पर उतर आती है। हालांकि बाद में राष्ट्रपति की पुत्री शर्मिष्ठा मुखर्जी ने अपने भाई के बयान पर असहमति जताते हुए कहा था कि यह बयान महिलाओं का अपमान है और उन्हें तुरंत ये वापस लेना चाहिए। सार्वजनिक संवाद का यह स्तर और राजनीतिक पार्टियों की चुप्पी भारतीय लोकतंत्र में आई गिरावट का सबूत है। प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष अपनी इस फिक्र का जिक्र तो करते हैं लेकिन कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं। यह जनमानस में संदेह पैदा करता है। क्या वास्तव में वे इसके लिए प्रतिबद्ध हैं ? अब तक ऐसा लगता तो कतई नहीं है. शायद हाथी  के दांत खाने के और व दिखाने के और हैं। जनमानस निराश है, उद्वेलित है। वह कानूनविदों को आदर्श के रूप में देखता है। इन कर्मों का उसके ऊपर एक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. ऐसे विवादित और अमर्यादित बयानों पर रोक लगाने के लिए देश के कानूनविदों , बुद्धजीवियों ,विधि आयोग समेत सभी दलों को इस बात पर गम्भीरता से चिंतन करने की आवश्यकता है। वर्ना ऐसे बयानों की अटूट श्रंखला यूँ ही चलती रहेगी और इससे उपजे तू-तू मै-मै से देश का विकास कैसे होगा यह तो मोदी जी ही बताएंगे लेकिन यह तय है, पूरे विश्व में जहां वह भारत की मजबूती का परिचय देने की कोशिश कर रहे हैं वहीँ इन गैर जिम्मेदार बयानों से देश की छवि अवश्य धूमिल होती जा रही है।

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