इनका तिरस्कार कब तक

3:01 pm or August 13, 2015
pardhi

——-अनिल सी. कुमार——–

प्रदेश सरकार ने विमुक्त और घुमक्कड़ जातियों की पंचायत में अपने निवास पर कहा था कि किसी भी जाति को अपराधी नहीं कहा जाएगा। इसके बरक्स मध्यप्रदेश में पारधी जाति को आज भी अपराधी कहा जाता है। यहां बताना भी समीचीन होगा कि मध्यप्रदेश सरकार ने उनके लिए आश्रम, हॉस्टल और आवास बनाने की घोषण की थी, लेकिन इसे अमीलाजामा पहनाया नहीं जा सका। वहीं, यह सवाल भी मुंह बाए खड़ा है कि उनके लिए अलग से आश्रम या स्कूल-हॉस्टल क्यों खोले जाएं। क्या उन्हें मौजूदा व्यवस्था का हिस्सा बनाकर इन्हीं स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाना चाहिए, ताकि वे जिस भेदभाव और छुआछूत से दो-चार हो रहे हैं उससे भी मुक्ति मिले। वे आज भी ‘अपराधी जातिÓ का बदनुमा दाग लेकर बहिकृत सामाजिक जीवन जी रही है। मध्यप्रदेश के भोपाल, सीहोर, रायसेन, होशंगाबाद आदि जिलों में तो यही स्थिति है। इस जाति का इतिहास जुझारू और बहादुरी का रहा है। शिकार, सैनिकी पेशा इस जाति का व्यवसाय था। कई राजाओं के अंगरक्षक पारधी ही थे। इस कारण 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के समय अंग्रेजों की सत्ता के विरुद्ध हुए सशस्त्र संषर्घ में पारधियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था।

जो लोग और सिस्टम पारधियों को अपराधी कहता या मानता है उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेज इनसे खौफ खाते थे। वे मानते थे कि उन्हें गुलामी न स्वीकरने वाले पारधियों से बड़ा खतरा है। अंग्रेजों ने उनपर ‘अपराधी जातिÓ का ठप्पा लगाकर उन्हें समाज से दूर अलग शिविरों में ठूस दिया और उनपर कड़ी नजर रखने की व्यवस्था की। उनके दुर्भाग्य से देश को स्वाधीनता मिलने के बाद भी पारधी समाज पर लगा ‘अपराधी जाति’ का दाग मिट नहीं पाया और वर्षों से सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से मुख्य प्रवाह से बाहर हो चुका रह समाज आज भी उपेक्षित है। उन्हें दूसरी जातियों ने भी लगभग बहिष्कृत कर रखा है। इससे उनका आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक आदि विकास बुरी तरह अवरुद्ध है। अब पारधी समाज हाशिए पर फेंक दिया गया है। पारधी मिथ, इतिहास और परंपराओं में जकड़ी एक ऐसी जाति है, जिसे अंग्रेजों ने ‘अपराधिक जनजाति अधिनियम 1871’ के तहत सूचीबद्ध किया था। अंग्रेज चले गए, लेकिन धारणाएं नहीं गईं, तभी तो पारधी लोग गांव से बेदखल हैं।

1947 में देश आजाद हुआ। पुलिस विभाग बना, लेकिन तरीका अंग्रेजों के जमाने का ही चला। 1924 में देश में 52 गुनहगार बसाहट बनाए गए थे। महाराष्ट्र के शोलापुर में सबसे बड़ी गुनहगार बसाहट बनी। इसमें तार के भीतर कैदियों को रखा जाता था। 1949 को बाल साहेब खेर और उनके साथियों ने शोलापुर सेटलमेंट का तार तोड़ डाला। 1952 को डॉ. बीआर अंबेडकर ने गुनहगार घोषित करने वाले कानून को रद्द किया। 1960 को जवाहरलाल नेहरू ने शोलापुर दौरा किया, लेकिन यहां आज भी चोरी हुई तो पुलिस सबसे पहले पारधी को ही पकड़ती है। यहां सौ टके का सवाल उनकी पहचान को लेकर है। पारधी चोर नहीं हैं। वह चोर है भी, तो उन्हें चोरी के दलदल से बाहर निकालना होगा। इसमें समाज और पुलिस की भूमिका अहम हो सकती है, लेकिन समाज और पुलिस की व्यवस्था उसे चोर से ज्यादा कुछ नहीं मानती. पहली जरूरत उनके भीतर के डर को खत्म करना है।

आज भी वे कई मामलों में उन जातियों से अच्छबीमारियों का इलाज जड़ी-बूटियों से कर लेते हैं, जो आज की ऐलोपैथिक दवाओं से अच्छी और ज्यादा असरकारी हैं। क्षेत्र भ्रमण के दौरान कई बातों ने चौका दिया। मसलन, उनके साथ आज भी छुआछूत की जाती है। उन्हें आज भी अपराधी की तरह देखा जाता है। उन्हें आज भी शिकारी समझा जाता है। (यहां लोग भूल रहे हैं कि वन्यजीवों के जो शिकारी या तस्कर पकड़े गए, उनमें ज्यादातर दूसरी जातियों के हैं।) वे शिकार छोड़कर खेती की ओर लौटे, लेकिन जिस जमीन को उन्होंने जोत के लायक बनाया उसे दबंग और किसान छीन रहे हैं। वे इसके लिए जातिय संघर्ष से लेकर आगजनी, बलवा, लूटपाट, पारधी महिलाओं के साथ बलात्कार तक कर चुके हैं। बैतूल की मुलताई तहसील का चौथिया कांड याद आ गया। अध्ययन और भ्रमण के दौरान भोपाल, सीहोर, होशंगाबाद और रायसेन जिले के पारधियों की वस्तुस्थिति जानी-समझी। उनकी बेहतरी के लिए सिस्टम कोई कदम उठाए, इस दिशा में यह एक छोटा सा प्रयास है।
पारधी जाति के लोगों ने बातचीत में बताया कि वे वन्यजीवों के बारे में गहन जानकारी रखते हैं। उन्हें जंगल में पेड़ों, दवाओं, जड़ी-बूटियों की भी खादी जानकारी है। इसलिए, वे अपना इलाज खुद कर लेते हैं। उन्होंने कुछ बीमारियों के लिए नुस्खे और जड़ी-बूटियां भी बताईं। एक बारगी लगा कि उनकी जानकारी या ज्ञान का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है। उनका ज्ञान पीढिय़ों में आगे बढ़ रहा है, लेकिन दूसरे लोगों के काम नहीं आ पा रहा है। वे अपने बच्चों और युवाओं की तमाम दवाओं के बारे में बताते हैं। दूसरी ओर पारधी शिकार के बारे में सबसे ज्यादा जानकारी रखने वाली जाति है। वह दुनिया की सबसे ईमानदार जाति में से एक है, इसलिए वह राजा के सुरक्षा सलाहकार भी बनते थे। जिसे आज की जुबान में एनएसजी कमाण्डो कह सकते हैं। आज भी एक पारधी गांव के 25 से 50 खेतों की रखवाली करता है। सारे पारधी मिलकर एक-दूसरे के खेतों में नहीं जाने का उसूल बनाते हैं,। किसी के खेत में चोरी हुई तो उस खेत का पारधी नुकसान की भरपाई करता है। वह अपने खुफिया नेटवर्क से चोरी का पता लगा लेता है। इस मामले को जाति पंचायत में उठाता है। इस पंचायत में आरोप साबित होते ही नुकसान से 5 गुना दण्ड वसूला जाता है। गांव के पारधी को रखवाली के बदले सलाना अनाज मिलता है। इस लिहाज से पारधी गांव की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण कड़ी है।

पारधियों में बाल विवाह का प्रचलन है। इसके लिए उनके बीच जागरुकता अभियान की जरूरत है। क्षेत्र भ्रमण के दौरान सामने आया कि कई किशोरों की शादी कर दी गई थी। इसकी बड़ी वजह आंटा-शांटा प्रभा है, जिसमें बच्चों के माता-पिता पहले ही तय कर लेते हैं कि वे एक दूसरे को एक-एक लड़की और एक-एक लड़का देंगे। इससे उनका शारीरिक विकास अवरुद्ध होने के साथ ही बीमारियां भी होती हैं, लेकिन अच्छी बात यह है कि पारधी वन औषधि के जानकार हैं। वे ज्यादातर मामलों में अपना इलाज खुद कर लेते हैं। हालांकि, कम उम्र शादी, बच्चे और परिवार की जिम्मेदारी आने से स्वास्थ्य पर बुरा असर तो पड़ता है। होशंगाबाद के बम्हनगांव कला, मंगवारी, सीहोर के सलकनपुर, रायसेन के नासीपुर, भोपाल के नेहरू नगर और करोंद आदि में भी बहिष्कार आधारित जीवन जीने के मामले सामने आए हैं।

पारधियों के लिए प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहीं अर्चना ने बताया कि पारधियों और दूसरी जातियों के बीच जमीन संघर्ष भी हमेशा से रहा है। वन विभाग ने उन्हें मुख्यधारा में जोडऩे के मकसद से जमीनें दी। उनके पट्टे दिए। यह पठार या वन भूमि है। शुरुआत में यह जोतने लायक नहीं थी। पारधियों ने मेहनत कर इसे जोतने लायक बनाया। एक समय के बाद जब इसमें पैदावार अच्छी होने लगी, तो दबंगों और किसानों की नजरों में अखरने लगी। फिर जमीन के लिए जातियों के बीच संघर्ष होने लगा। उन्होंने पारधियों पर अपराधी होने सहित कई आरोप लगाए। उनकी जमीनों पर कब्जा किया। पारधियों को जो जमीनें मिली थीं, उनका कुछ ही हिस्सा अब पारधियों के पास है।

पारधियों के ज्यादातर बच्चे हीन भावना से पीडि़त हैं। क्षेत्र भ्रमण के दौरान सीहोर जिले के सलकनपुर में होशंगाबाद रोड के किनारे रह रहे पारधी परिवारों ने बातचीत में बताया कि वे अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन स्कूल में दूसरे बच्चे उनके बच्चों को पारधी-पारधी कहकर चिढ़ाते हैं इसलिए, वे स्कूल जाने से मना करते हैं। स्कूल लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर है। रोज-रोज छोडऩे भी नहीं जा सकते। बच्चे रास्ते से लौट आते हैं। इसी से मिलता-जुलता मामला नासीपुर के पारधी परिवारों के बच्चों का है। उन्होंने बताया कि भेदभाव के कारण बच्चे परेशान हो जाते हैं। उनके मन में हीन भावना आ जाती है। वे खुद को छोटा समझने लगते हैं। इससे स्कूल जाने का मन नहीं करता। बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। हालांकि, वे अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। इसके लिए यदि उनके टोला में स्कूल खुल जाए तो वे जमीन भी दान कर देंगे। इसका प्रस्ताव अधिकारियों के सामने रखा है, लेकिन कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। औबेदुल्लागंज के अर्जुन नगर में भी लगभग ३० परिवार रहते हैं, लेकिन इनके बच्चे भी पढ़ नहीं सके। औबेदुल्लागंज बड़ा कस्बा है। इसके बावजूद बच्चे नहीं पढ़ पाएं, यह बात पचाने लायक नहीं लगती, लेकिन कारण इनका भी वही है। ये बच्चे भी जातिगत संबोधन और चिढ़ाने के कारण तंग आ जाते हैं। एक शिक्षित और जागरूक समाज ही व्यवस्था की खामियों के खिलाफ लड़ सकता है, लेकिन पारधियों के बच्चों के साथ हो रहे भेदभाव और छुआछूत को देखते हुए यह भरोसा करना भी बेमानी होगा कि वे कभी पढ़ पाएंगे। पारधी जाति की पहचान उन्हें शिक्षित बनाकर ही बदली जा सकती है। प्रदेश सरकार ने पारधियों की बस्तियों में बिजली की व्यवस्था और जिनके पास आवास नहीं है उनके लिए आवास और बच्चों के लिए आश्रम व छात्रावासों की संख्या व सीटें बढ़ाने की घोषणा की थी, लेकिन इसे अमलीजामा पहनाया नहीं जा सका। हालांकि, होना तो यह चाहिए कि मौजूदा स्कूलों में व्याप्त भेदभावपूर्ण रवैया खत्म कर उन्हें वहीं पढ़ाया जाए, ताकि सभी साथ रहें।

Tagged with:     , ,

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in