असली आजादी कब मिलेगी ?

3:08 pm or August 14, 2015
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——-शशांक द्विवेदी——-

15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ था तबसे देश बहुत बदला है लेकिन “भारत और इण्डिया “ का भेद आज भी है । हम इसे पूरी तरह से मिटा नहीं पाए है और जो आज भी उतनी ही बड़ी चुनौती है जितनी आजादी मिलने के समय थी । आज भी देश के करोड़ों लोगों को “वास्तविक आजादी “ की दरकार है । आज भी 19 करोड़ लोग भारत में रोज भूखे पेट रहने को मजबूर हैं, । आज देश अपने आजादी की 68 वीं सालगिरह मना रहा है ऐसे में एक सवाल सबके सामने है कि क्या हमें वास्तविक आजादी मिल गई है ? क्या देश महात्मा गाँधी के आदर्शो पर चल रहा है ? राजतंत्र की तरह ही लोकतंत्र में भी शासक और शोषित दो वर्ग बन गएँ है । देश में आर्थिक उदारीकरण के बाद  एक  वर्ग का जबर्दस्त विकास हुआ है जबकि दूसरा वर्ग पिछड़ता गया  और करोड़ों नागरिको को अपनी बुनियादी और मूलभूत जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है । सबके लिए बेहतर शिक्षा ,चिकित्सा और आवास उपलब्ध नहीं है । देश में खाकर ग्रामीण भारत में प्राथमिक शिक्षा और चिकित्सा के हालात बहुत ही ख़राब स्तिथि में है । प्राइमरी विद्यालयों में शिक्षा का स्तर इतना ज्यादा ख़राब है कि कोई भी थोड़ा सा साधन संपन्न व्यक्ति भी अपने बच्चे को यहाँ नहीं पढ़ाना चाहता ।  वो किसी तरह से खुद इंतजाम करके या कर्ज लेकर बच्चों को निजी स्कूलों में पढाना चाहता है ।  देश के राजनेता ,सांसद ,विधायक ,मंत्री अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाते ,ना ही कभी पढाना चाहते । क्योकि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर ठीक नहीं है । जिस दिन से देश का शासक वर्ग अपने बच्चो को सरकारी स्कूलों में पढने को भेजेगा उसी दिन से यहाँ शिक्षा का स्तर ठीक होने लगेगा ।  यही हालत गाँव कस्बों के सरकारी प्राथमिक चिकित्सालयों की है जहाँ ठीक तरह से इलाज उपलब्ध नहीं है ।  कुलमिलाकर बुनियादी जरूरतों के लिए एक आम आदमी को बहुत जद्दोजहद करनी पड़ रही है ।  देश में खेती –किसानी के भी हालात बहुत ख़राब है और देश भर में सैकड़ों किसान हर रोज आत्महत्या करने को मजबूर है । आजादी के बाद से अब तक कोई भी सरकार ग्रामीण स्तर पर कृषि को ठीक से प्रोत्साहित नहीं कर पाई ,ना ही कृषि को जीविकोपार्जन का प्रमुख माध्यम बना पाई जबकि देश के करोड़ों लोग आज ही कृषि पर ही निर्भर है ।

देश को आजादी दिलाने के लिए  जिन क्रांतिकारियों ने हँसते हँसते अपनी जान न्योछावर कर दी क्या उनके बताये हुए रास्तों पर आज का भारत चल रहा है ? आजादी के इन 68  सालों में देश ने बहुत सारी उपलब्धियां हासिल की हैं लेकिन आज हमें जहाँ होना चाहिए हम आज वहाँ नहीं है । ईमानदारी और जीवन मूल्यों में बहुत कमी आयी है । लगातार बढ़ते भ्रष्टाचार और महगाई से देश के करोडों लोगों के लिए दो वक्त की रोटी जुटा भी मुश्किल होता जा रहा है।

भुखमरी मापने वाले सूचकांक ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2014 (जीएचआई)  की रपोर्ट के मुताबिक,   19 करोड़ लोग भारत में रोज भूखे पेट रहने को मजबूर हैं, 30.7 प्रतिशत बच्चे (5 साल से कम उम्र के) भारत में अंडरवेट हैं। 58 प्रतिशत बच्चों की ग्रोथ इंडिया में 2 साल से कम उम्र में रुक जाती है। 4 में से हर एक बच्चा भारत में कुपोषण का शिकार है। तीन हजार बच्चे देश में कुपोषण से पैदा होने वाली बीमारियों के कारण रोज मरते हैं।दुनियाभर में 5 साल से कम उम्र में मरने वाले बच्चों में भारत का 24 प्रतिशत हिस्सा है ।  संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के बेहद गरीब लोगों में से एक लगभग तिहाई भारत में रहते हैं तथा यहां कुपोषण और भुखमरी से होने वाली सालाना मौतों के आंकडें भी चिंताजनक है । इस रिपोर्ट ने  देश के कथित विकास पर बड़े सवाल खड़े कर दिए है । वास्तव में इस  देश में विकास कौन कर रहा है ? अमीर और अमीर होते जा रहें है जबकि मंहगाई ने तो गरीब की कमर ही तोड़ दी है । महगांई लगातार बढ़ती जा रही है जिसकी वजह से उसके लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना मुश्किल होता जा रहा है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की जनता से “अच्छे दिन आने वाले है “ का नारा दिया था लेकिन अभी तक तो अच्छे दिन आये नहीं है । गरीब के अच्छे दिन कब आयेंगे ?आयेंगे भी या नही या ये सिर्फ वादा बन कर ही रह जायेगा ।

आज के समय में भारत काफी तरक्की कर रहा है । आज भारत विश्व की चौथे नंबर की अर्थव्यवस्था है । आज लगभग हर क्षेत्र में भारत अच्छी तरक्की कर रहा है । हमारी क्षमता का लोहा सारी दुनिया मान रही है । लेकिन इतनी तरक्की होने के बावजूद भारत आज भी गरीब राष्ट्रों में शुमार है । भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए गरीबी एक अभिशाप बनकर उभरी है । इसलिए राष्ट्रहित में यह आवश्यक है की इसका उन्मूलन किया जाये । आज जीडीपी के  आंकड़े   सिर्फ  कागजों तक ही सीमित है । असल में तो आज भी झुग्गी झोपडी में रहने वाले लोग 40 से 50 रूपये रोजाना कमाते है । उनका जीवनस्तर काफी निम्न है । उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है । देश की एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यापन कर रही है । इसलिए अब इस गंभीर समस्या की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित होना चाहिए । विश्व संस्थाएं ,विश्व बैंक आदि भी निर्धनता दूर करने के लिए काफी मदद करते है । लेकिन वह मदद भ्रष्टाचार के कारण गरीबों तक नहीं पहुँच पाती । इसके कारण उनकी स्तिथि में कोई सुधार  नहीं हुआ है । इससे निपटने के लिए सबसे पहले सरकार को भ्रष्टाचार दूर करना पड़ेगा । तभी सही मायने में गरीबी का उन्मूलन होगा । इसके लिए सरकार के साथ-साथ जनता का भी फ़र्ज़ बनता है कि अपनी कमाई का छोटा सा हिस्सा गरीबो को देना चाहिए तभी भारत सही मायने में विकसित देश कहलायगा । आज देश में हालत ऐसे है कि गरीब की सुनने वाला कोई नहीं है सरकारी विभागों में लाल फीताशाही इतनी हावी है कि वह अपने छोटे छोटे कामों और दो वक्त की रोटी के लिए दर दर भटकता रहता है । केंद्र और राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाओ पर गरीब को कभी सही प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता और अधिकांश योजनाये भ्रष्टाचार की भेट चढ जाती है । गरीबों के लिए सिर्फ योजनाये बनाने से कुछ नहीं होगा ,उनका सही क्रियान्वन हो यह भी सुनिश्चित करना पड़ता है । क्योकि उपर से नीचे तक बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार है ,इसको खत्म करना पड़ता है ।

आज देशवासियों को एक वास्तविक आजादी की दरकार है जिसमें उन्हें भय ,भूख और भ्रष्टाचार से आजादी मिल सके । उन्हें रोटी कपड़ा और मकान की बुनियादी सुविधाएँ सुनिश्चित की जा सकें । शिक्षा और चिकित्सा का मौलिक अधिकार हासिल हो । बिना इन सब के  हमारी आजादी आज भी अधूरी है  और वास्तविक आजादी पाने के लिए हर देश वासी को फिर से संकल्प लेना होगा ।

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