कौन सुनेगा बांध विस्थापितों की करुण कहानी?

3:29 pm or August 18, 2015
Dam Displacement

——जगजीत शर्मा——–

देश में प्राकृतिक असंतुलन दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। आधा हिंदुस्तान पानी से त्राहिमाम्-त्राहिमाम् कर रहा है, तो आधा हिंदुस्तान आधे से ज्यादा सावन महीने के बीत जाने के बावजूद पानी को तरस रहा है। धान की फसल उत्तर भारत के किसानों ने ट्यूबवेल के सहारे रोपी है। अब जब पानी की जरूरत है, तो छिटपुट बरसात हो रही है।   इसका कारण अनियोजित विकास, नदियों पर बनाए जा रहे बांध और उनकी ऊंचाई बढ़ाना है। बांधों की ऊंचाई बढ़ाने से लाखों लोगों का जीवन संकट में आ रहा है। इसकी ओर आजादी से लेकर आज तक किसी सरकार ने ध्यान नहीं दिया है।

मध्य प्रदेश में तो आदिवासी, गैर आदिवासी, गरीब, किसान और व्यापारी तो सरकार से पूछ रहे हैं कि ‘नर्मदा घाटी करे सवाल, जीने का हक या मौत का जाल।’ सरदार सरोवर की ऊंचाई 17 किमी बढ़ाने से होने वाले विस्थापन की आशंका से जूझ रहे लोग यही सवाल पूछ रहे हैं। इसके लिए हजारों लोगों ने 6 से 12 अगस्त खलघाट से बड़वानर राजघाट तक 85 किमी की जीवन अधिकार यात्रा तक निकाली। आजादी के बाद से अब तक करीब साढ़े तीन हजार परियोजनाओं के नाम पर लगभग दस करोड़ लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा है। हर साल बीतते-बीतते विस्थापन का दंश झेलने वालों की संख्या में लाखों का इजाहा ही होता जा रहा है। ऐसा नहीं है कि इन दस करोड़ लोगों ने सरकारी और गैर सरकारी बांध परियोजनाओं को आसानी से स्वीकार कर लिया है या भविष्य में विस्थापित होने वाले लोग कर लेंगे। जिस तरह आज नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े लोग हुंकार भर रहे हैं कि निमाड़ और पहाड़ के लिए अब यह जीने-मरने के सवाल के साथ-साथ तीस वर्षों के संघर्ष की परीक्षा की घड़ी भी है। मौजूदा समय से संघर्ष के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। इन पांच करोड़ लोगों ने शरीर में कूबत रहने और आशा की एक भी किरण दिखने तक संघर्ष किया और आज भी किसी न किसी रूप में कर रहे हैं। पिछले तीस साल से नर्मदा घाटी के आसपास बसे आदिवासी, गैर आदिवासी संगठित होकर आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन सरकार और इन परियोजनाओं से जुड़े लोगों को इससे कोई सरोकार नहीं है कि नर्मदा सरोवर की ऊंचाई बढ़ाने या विभिन्न नदियों पर बांध बनाने पर विस्थापित होने वाले लोगों के जीवन में किस तरह अंधेरा छा जाता है।

नदियों पर बनने वाले बांध के चलते विस्थापित होने वालों की व्यथा-कथा पर जयदीप हर्डीकर ने एक पुस्तक लिखी है, एक गांव था यहां। यह पुस्तक ऐसे विस्थापितों की दशा पर प्रकाश डालती है जिसे पढ़कर मन किसी का भी उद्वेलित हो सकता है। आप कल्पना कीजिए, जिस गांव में आपका जन्म हुआ हो, जिस गांव की मिट्टी में आपके पुरखों, बाप-दादाओं और परिजनों की मिट्टी दफन हो, एक दिन एकाएक एक सरकार रुक्का आता है कि यह गांव खाली करना पड़ेगा क्योंकि इस गांव की समस्त जमीन बांध, पार्क या सरकारी-गैर सरकारी परियोजना के लिए अधिग्रहीत की जाएगी, तो कैसा लगेगा? जिस जमीन, मकान, बाग-बगीचों में आपका बचपन बीता हो, आपकी स्मृतियां जुड़ी हों, उससे एकाएक कट जाने की पीड़ा क्या और कैसी होती है, इसे तो सिर्फ वही बता सकता है, जिसने इस पीड़ा को भोगा हो। उस पर गजब यह है कि सरकार इन विस्थापितों को इनकी अमूल्य जमीन के बदले जो कुछ भी देती है, वह बहुत मामूली होता है। जो जमीन सदियों से गांववालों के आजीविका का साधन रही हो, उस जमीन के बदले में दी गर्ई मामूली मदद उन्हें तोड़कर रख देती है। मुआवजा भी पूरा नहीं मिलता है। आधा से ज्यादा तो ठेकेदार नुमा नेता, अधिकारी और सरकारी मुलाजिम खा जाते हैं। जो इन्हें इनका हिस्सा नहीं देता, वे सालों साल कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाते रहते हैं और बदले में मिलता है सिर्फ सरकारी आश्वासन। कभी-कभी तो मिलता है पुलिसिया अत्याचार।

नर्मदा घाटी की ऊंचाई बढ़ाने का विरोध करने वाले पिछले तीस सालों से जो भोग रहे हैं, वह अकथनीय है। नर्मदा घाटी के 248 गाँवों में बसे 2 लाख पहाड़ी आदिवासी और पश्चिमी निमाड़ के किसान मजदूर, मछुआरे, छोटे व्यापारी हैं। इनकी आजीविका यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों और हरे-भरे खेतों पर निर्भर हैं। बाँध की ऊँचाई बढ़ाकर इन्हें डुबोने की तैयारी हो गई है। पर्यावरण मन्त्रालय द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट सरकार के इस फैसले के प्रतिकूल है। सरदार सरोवर 122 मी. की ऊंचाई पर ही हजारों हेक्टर जमीन, सैकड़ों मकान डूब-प्रभावित हो चुके हैं।

यह कैसी विडंबना है कि एक तरफ तो सरकार मानती है कि बांधों की ऊंचाई बढ़ाने से प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि होती है, इसके बावजूद हर साल देश के किसी न किसी क्षेत्र में सरकार बांधों की ऊंचाई बढ़ाने को तत्पर नजर आती है। पिछले दिनों पर्यावरण और वन मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में यह माना कि जून 2013 में उत्तराखंड में आई बाढ़ और भू स्खलन की सबसे बड़ी वजह इन इलाकों में बनाई गई बांध परियोजनाएं ही हैं। केदारनाथ धाम जैसे इलाके में हुए भूस्खलन में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 5,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे, जबकि कई स्वतंत्र संस्थाओं के मुताबिक यह आंकड़ा तकरीबन दोगुना था। हिमालयी समाज और इतिहास के जानकार डॉ. शेखर पाठक कहते हैं, ‘हिमालयी पहाड़ों के उपजाऊ खेत सिर्फनदियों के किनारों पर हैं और ये सब इलाके बांध बनने से डूब जाते हैं। ऐसे में पुनर्वास का मसला सिर्फ लोगों का नहीं, उनकी आजीविका के पुनर्वास का भी है और इस लिहाज़ से टिहरी के अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं।Ó एक तरफ सरकार हिमालय में बांध परियोजनाओं के इस नकारात्मक असर को स्वीकार रही है, दूसरी तरफ एशिया के सबसे ऊंचे और दुनिया के दूसरे सबसे ऊंचे बांध को खड़ा करने की तैयारी में है। यह दोहरी नीति क्यों? नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री के रूप में ताजपोशी होने के कुछ ही दिनों बाद उन्होंने जिस तरह गुपचुप बांध की ऊंचाई 122 मीटर से 139 मीटर तक बढ़ाने का फैसला लिया, वह सचमुच हैरान कर देने वाला है। दरअसल, हमारे देश में विस्थापितों की जीविका की क्षति, पुनर्वास-पुनस्र्थापन एवं मुआवजा उपलब्ध कराने हेतु एक राष्ट्रीय कानून का अभाव है। दुखद तो यह है कि सन् 1894 में बने ऐसे कानून को आजादी के इतने सालों बाद तक ढोया गया। इस कानून में बेहतर पुनर्वास और पुनस्र्थापन का सिरे से अभाव था। सरकार अब एक नये कानून का झुनझुना पकड़ाना चाहती है। इस संबंध में देश में कोई राष्ट्रीय कानून नहीं होने से तमाम व्यवस्थाओं ने अपने-अपने कारणों से लोगों से उनकी जमीन छीनने का काम किया है। देश भर में अब तक 18 कानूनों के जरिये भूमि अधिग्रहण किया जाता रहा है। देश में भाखड़ा नंगल, गांधी सागर, सरदार सरोवर, नर्मदा सागर आदि दशकों पुराने दर्जन भर से भी ज्यादा ऐसे बांध हैं, जिनके विस्थापितों की समस्या आज तक अनुसलझी है।

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