लोकतंत्र के लिए खतरनाक है यह आकर्षण

6:14 pm or July 28, 2014
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हरे राम मिश्र-

भी कुछ दिन पहले की बात है, मुंबई के उप नगरीय इलाके कल्याण से कथित तौर पर चार मुस्लिम लड़को के इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड सीरिया यानी आईएसआईएस की ओर से ईराकी सेना के खिलाफ, ईराक में लड़ने के लिए घर से भाग जाने की खबरें अखबारों में छपीं। आरिफ एजाज माजिद, शाहीन फारूकी, फहद तनवीर शेख, अमन नईम टंडेल जिनकी उम्र पच्चीस वर्ष से ज्यादा नहीं थी, अपने परिवारों को सूचित किए बिना ही घर छोड़ कर इराक में आईएसआईएस द्वारा लड़ी जा रही जंग में मदद के लिए चले गए। चारों लड़के उच्च शिक्षित और संभ्रान्त परिवारों के हैं। बहरहाल, घर वालों की शिकायत पर खुफिया एजेंसियों की जांच में उनके ईराक जाने और वहां के हिंसक संघर्ष में शामिल होने की खबरें अखबारों मे आयी हैं। आईएसआईएस के प्रति बढ़ रहे आकर्षण को देखकर खुफिया एजेंसियों ने देश के युवाओं के धार्मिक यात्रा के नाम पर ईराक जाने और फिर आइएसआइएस में शामिल होने की आशंका भी जताई है। यहां सवाल केवल देश के सुन्नी मुस्लिम समुदाय में आईएसआईएस के प्रति बढ़ रही उत्सुकता और आकर्षण का नहीं है, ब्रिटेन और अन्य मुस्लिम देशों के युवाओं में भी आईएसआईएस के प्रति खासा आकर्षण देखा जा रहा है।

अगर गौर किया जाए तो देश के सुन्नी मुस्लिम युवाओं का आईएसआईएस के प्रति यह आकर्षण कई गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर इन युवाओं के बीच इस आकर्षण की असल वजह क्या है। क्या वे अब यह मान चुके हैं कि इस देश का लोकतांत्रिक ढांचा उनके लिए, उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए, प्रासंगिक नहीं रहा। क्या यह मान लेना चाहिए कि मुस्लिम समुदाय अपने मूल में ही लोकतांत्रिक व्यवस्था का विरोधी है और मौका मिलते ही वह इसे मिटाकर इस्लामी मुस्तफा का षासन लाने को प्रयास रत हो जाता है। या फिर क्या इस पूरे प्रकरण को महज शिया-सुन्नी की धार्मिक समस्या के बतौर ही देखा जाना चाहिए। क्या मुस्लिम समुदाय एक इस्लामी षासन में ही अपनी समस्याओं का हल देखता है और मौका मिलने पर अखिल वैश्विक इस्लाम की अवधारणा जो कि ‘निजाम-ए-मुस्तफा’ की बात करती है, के नजदीक अपने को पाता है। क्या यह लोकतंत्र उसके लिए उबाऊ है।

यहां एक सवाल और उठता है कि अगर आईएसआईएस ने ईराक फतह कर लिया तो फिर क्या होगा। इस समय ईराक में दस हजार भारतीय काम कर रहे हैं। यही नहीं अगर वहां का पूरा तंत्र फेल होता है तो भारत और अन्य कई देशों द्वारा इराक के पुर्ननिर्माण में निवेश किए गए उन पैसों का क्या होगा। अगर ईराक में लड़ने गए लोग वापस लौटकर अपने मुल्कों में आईएसआईएस गतिविधियां बढ़ाएंगे तो फिर क्या होगा। अगर आतंकवादी संघटन में शामिल मुंबई के इन युवकों ने कल वापस लौटकर भारत को ही लक्ष्य किया, तो इसके परिणाम क्या होंगे। आखिर उनके इस संगठन में शामिल हो जाने को किसकी असफलता माननी होगी। क्या यह महज धार्मिक आकर्षण का मामला था या फिर इस मुल्क के लोकतंत्र से मुस्लिम समुदाय के मोहभंग होने का प्रारंभिक प्रमाण। इस तथ्य पर भी गंभीरता से सोचना चाहिए।

गौरतलब है कि कथित वैष्विक खलीफा अबू बकर अल बगदादी का उदय इस्लाम की उस वहाबी धारा का एक रूप है जो अमेरिका द्वारा सउदी अरब की छत्र छाया में पाला पोसा गया है। आज अरब देशों के बीच तेल संसाधनों पर नियंत्रण और दुनिया पर इसके मार्फत प्रभाव जमाने की अमेरिकी निर्देशन में जो राजनीति जल रही है वह पूरे अरब जगत को सुलगा रही है। सउदी अरब द्वारा इस्लाम के प्रचार के नाम पर जिस वहाबियत का प्रचार किया जा रहा है उससे पूरी दुनिया वाकिफ है। आईएसआईएस अमरीका पोशित वहाबी आतंकवाद का ही एक चेहरा है जिसका सीधा उद्देष्य सत्ता पर कब्जा करना और एक इस्लामी राज्य की स्थापना है। इसलिए आईएसआईएस की गतिविधियां एक धार्मिक मसला तो बिल्कुल ही नहीं है।

आज आईएसआईएस अचानक पूरे विश्व समुदाय को चुनौती दे रहा है और उसकी आंच भारत तक पहुंच चुकी है। दरअसल, यह पूरा खेल ही अमेरिका और एफबीआई प्रायोजित है। सीरिया का संकट जब शुरू हुआ तो सबसे पहले ईरान और खुद सीरिया ने खासतौर पर अमेरिका और उसके साथी देशों को चेताया था कि वे सीरिया में गृहयुध्द भड़का रहे अलकायदा के ही आतंकवादियों का ग्रुप है। सभी इस चेतावनी को नजरन्दाज करते रहे और सीरिया को कथित रूप से आजाद कराने के लिए वहां के आतंकी संगठनों की मदद करते रहे। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी चेतावनी जारी कि सीरिया के आंतकी गुटों को मदद नहीं मिलनी चाहिए। गृहयुध्द से परेशान होकर सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद ने अमेरिका से हाथ मिलाया। अगले दिन सीरिया में गृह युध्द थमता नजर आया। लेकिन जिन आतंकी संगठनों को इंसानी खून मुंह लग चुका थाए वो कहां चुप बैठते। उन्होंने एक नई मुहिम शुरू की वो सीरिया और इराक के कुछ हिस्सों को मिलाकर अपना आईएसआईएस स्टेट बनाएंगे और फिर निकल पड़े। इस पर कभी बात नहीं की जाती कि मिडिल ईस्ट के संकट पर सऊदी अरब की क्या भूमिका रहती है।

अमेरिकी मीडिया समेत वैश्विक मीडिया ने आईएसआईएस संकट को शिया सुन्नी संकट का नाम दिया है लेकिन असल में यह वहाबी आतंकवाद है, जिसकी पैदाइश अलकायदा के रूप में सबसे पहले सऊदी अरब में हुई। जिसने ओसामा बिन लादेन से लेकर अबू बकर अल बगदादी तक की मंजिल बिना सऊदी अरब की मदद के तय नहीं की है। आईएसआईएस वहाबी विचारधारा को फैलाने के मकसद से बनाया गया है। आईएसआईएस हर उस देश और धर्म के खिलाफ हैं जो अमन और लोकतंत्र चाहते हैं। सवाल देश के मुस्लिम नौजवानों का इसके प्रति बढ़ रहे आकर्षण का है।

दरअसल, जहां इन्हें पाला-पोसा जाता है, वहां खुद लोकतंत्र नहीं है। अरब देषों ने लोकतंत्र के लिए अपने दरवाजे अभी बंद कर रखे हैं। अरब देशों के प्रति सुन्नी मुस्लिम युवाओं में बढ़ा आकर्षण वास्तव में तेल संसाधनों से अचानक उपजी समृध्दि और अमरीका प्रायोजित चकाचौंध को देखकर है। यह चकाचौंध गैर लोकतांत्रिक देशों की गंभीर बुराइयों को उपेक्षित कर देता है। इसी प्रायोजित अरबी चकाचौंध ने कुछ हद तक इस समाज को लोकतंत्र से दूर कर दिया है। वास्तव में पैन इस्लामिक अवधारणा भले ही दुनिया के मुसलमानों को आपस में जोड़ती है लेकिन जब यह सउदी माडल की बात करता है बेहद खतरनाक हो जाता है। क्योंकि वहां लोकतंत्र के लिए कोई स्थान नहीं है। वहाबियों के निशाने पर शिया देश या समुदाय इसलिए हैं कि वे सबसे पहले इनके विरोध में उठ खड़े होते हैं।

कुल मिलाकर, आज अगर एक लोकतांत्रिक देश का युवा लोकतंत्र के विकल्प के रूप में राजशाही या फिर इस्लामी शासन का सपना देख रहा है तो उसके लिए इस देश का राजनीतिक तंत्र जिम्मेदार है। आखिर इन्हें आजादी के साठ सालों में ऐसा कुछ क्यों नही मिला जो इनकी इस अवधारणा को मजबूत करता कि लोकतंत्र ही सबसे अच्छी शासन पध्दति है। आज अगर देंखें तो मुल्क का लोकतंत्र जिस मुहाने पर खड़ा है वहां यह किसी के सामने एक उदाहरण बनने लायक भी नहीं रह गया है। जब मुसलमानों को लोकतंत्र से सिवाय छल के कुछ भी नहीं मिला तो फिर उनका आकर्षण आईएसआईएस की ओर क्यों न हो। सांप्रदायिकता ने मुसलमानों में गहरा असुरक्षा बोध पैदा किया है। इसके लिए संघ जैसी ताकतें भी जिम्मेदार हैं। इस असुरक्षाबोध को खत्म कर पाने में हमारा पूरा राजनैतिक तंत्र विफल रहा है। अभी भी वक्त है इस दिशा में ठोस करने का,ताकि मुसलमानों को लगे कि यह लोकतंत्र भी उनके लिए है। क्या मोदी सरकार मुसलिम युवाओं के इस आकर्षण का खात्मा करने के लिए उन्हें सत्ता और प्रषासन में ईमानदारी से उसकी वाजिब हिस्सेदारी देने को तैयार है।

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