हम भी इंसान हैं, डायन नहीं!

3:56 pm or August 24, 2015
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——जगजीत शर्मा——–

गांव मेें किसी की बकरियां अचानक मर गईं, गाय या भैंस बीमार हो गई, बच्चा बीमार है या फिर अचानक मर गया, किसी के घर में बच्चे नहीं हो रहे हैं, इसका क्या मतलब है? इसका एक ही मतलब है कि गांव में कोई डायन है? ‘डायनÓ…जी हां, डायन…। सभ्य समाज में ऊपर कही गई बातों को सुनकर भले ही लोगों के मुंह से एकाएक निकल पड़े, यह क्या बेवकूफी है, लेकिन झारखंड, उड़ीसा, असम, नगालैंड, उत्तर प्रदेश बिहार, पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान आदि राज्यों के गांवों का सच यही है। डायन, टोनहिन, चुड़ैल, भुतनी, प्रेतनी, डाकिनी, कलंकिनी आदि वे शब्द हैं जो प्राचीनकाल से अब तक औरतों के खिलाफ एक हथियार के रूप में प्रयोग किए जाते रहे हैं। डायन घोषित की गई महिला या महिलाओं के बाल काट लेना, उनके साथ बलात्कार करना, उनको नंगा करके गांव भर में घुमाना, उनके जननांगों को क्षति पहुंचाना, मुंडन कर देना, उनकी हत्या कर देना आदि अमानवीय व्यवहार अंधविश्वासी समाज में जैसे जायज बनकर रह गया है। डायन, भुतनी, चुड़ैल आदि शब्दों को गढ़कर स्त्री को अधिक से अधिक बुरी बताने के लिए कई तरह के किस्से, कहानियां, मिथक और कहावतें गढ़ी गईं। ‘डायन भी सात घर छोड़ देती हैÓ जैसे मुहावरे स्त्री अस्मिता पर न केवल घातक प्रहार करते हैं, बल्कि बच्चों के मन में बचपन से ही उनके प्रति कलुषित धारणाएं पैदा कर देते हैं।

भारत के विभिन्न राज्यों में डायन बताकर प्राचीनकाल से अब तक कितनी महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया गया, इसका कोई आंकड़ा दे पाना कतई संभव नहीं है। पिछले सौ-पचास साल का आंकड़ा यदि हम इकट्ठा कर भी लें, तो यह सच्चाई नहीं बदलने वाली है कि डायन शब्द की उत्पत्ति के पीछे पुरुषवादी सत्ता का हाथ रहा है। जो भी स्त्रियां पुरुषों के अनुकूल नहीं रहीं, उनके लिए ही पुरुषों ने यह शब्द ईजाद किया। डायन मतलब बुरी औरत..जो पुरुषों का कहा नहीं मानती, जो बच्चों को खा जाती है, जिसकी वजह से देश, गांव, समाज और परिवार पर विपत्ति टूट पड़ती है। मजेदार बात यह है कि पुरुषों ने शब्द डायन गढऩे के बाद यह खूबसूरत हथियार महिलाओं के ही हाथ में थमा दिया कि लो! जब हमें जरूरत महसूस हो, हमारे इशारे पर उन स्त्रियों को डायन का खिताब देकर मार दो, जो हमारे इशारे पर चलने से इंकार करती हैं, जो पितृसत्ताक व्यवस्था या पुरुषवादी सत्ता के खिलाफ बगावत करती हैं। यह खेल आज भी जारी है। आज इसका कुछ रूप भले ही बदल गया हो, लेकिन किसी भी महिला को डायन घोषित करने के पीछे की मानसिकता वही हजारों साल पुरानी है। अपने निहित स्वार्थों के लिए किसी भी विवश, लाचार, गरीब, अशिक्षित महिला को डायन बताकर मार दो। अफसोसजनक बात तो यह है कि इस साजिश में अब महिलाएं भी बराबर की भागीदार हैं, यह सोचे बिना कि ऐसा करके वे अपने को ही किसी न किसी रूप में कमजोर कर रही हैं।

हजारों साल बीत जाने के बावजूद इस देश की महिलाओं को यह सोचने-समझने का मौका ही नहीं दिया गया कि वे जब किसी महिला को डायन बताने के लिए प्रेरित की जाती हैं, तो उसके पीछे कारण क्या रहते हैं? आखिर औरत ही डायन क्यों होती है, पुरुष क्यों नहीं? डायन, चुड़ैल, भूतनी, कुटनी, वेश्या जैसे शब्दों की तलवार महिलाओं को ही रक्तरंजित क्यों करती है? भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस कहकर किसी पुरुष को मार दिया गया हो, ऐसी घटनाएं वर्तमान में तो क्या, अतीत में भी शायद ही देखने को मिले। और यदि एकाध हैं, भी तो उसके दूसरे समाजशास्त्रीय कारण रहे हैं। कुछ राज्यों में तो औरतों को डायन बताकर मार देने की परंपरा आज भी अबाध गति से जारी है। अगर हम डायन बताकर मारी जाने वाली महिलाओं की आर्थिक दशा पर गौर करें, तो हम पाते हैं कि अब तक ज्ञात सभी घटनाओं में लगभग 98 फीसदी महिलाएं या तो गरीब रही हैं, विधवा रही हैं या फिर तलाकशुदा। डायन बताकर मारी गई कुंवारी लड़कियों की भी आर्थिक दशा ऐसी ही रही होगी। अमीर घरों की महिलाओं को डायन बताकर मार देने की घटना न के बराबर है। इसका एक ही अर्थ निकलता है कि डायन कही जाने वाली औरतों के पीछे उनकी गरीबी, असहायता, शोषण-दोहन और यौन उत्पीडऩ जैसी प्रवृत्तियां उत्प्रेरक के रूप में काम करती रही हैं। अब तक जितने भी मामले सामने आए हैं, उनमें कुछ बातें तो कामन हैं, जैसे, संपत्ति विवाद, यौन शोषण, आपसी रंजिश आदि। इन कारणों से एक बात तो समझ में आती है कि कुछ लोग या समुदाय अपने ही नाते-रिश्तेदार महिलाओं को उनकी संपत्ति हड़पने, उनका यौन शोषण करने या फिर जमीन का बंटवारा न करना पड़े, इसके लिए कुछ महिलाओं या पुरुषों को लालच देकर डायन घोषित करके मार देते हैं।  यह सदियों से होता चला आ रहा है।

नेशनल क्राइम ब्यूरो रिकॉड्र्स के मुताबिक साल 2000 से 2012 के बीच झारखंड में 363 महिलाओं की हत्या डायन बताकर की गई। देशभर में ये आंकड़ा 2097 हत्या का था। नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़े के मुताबिक साल 2008-13 तक झारखंड में 220, उड़ीसा में 177, आंध्र प्रदेश में 143, हरियाणा में 117, मध्यप्रदेश में 94, छत्तीसगढ़ में 61 और राजस्थान में 4 महिलाओं की हत्या की गई। झारखंड में ये समस्या विकराल रूप में है। उड़ीसा, आंध्र प्रदेश भी ऐसी हत्याओं के मामले में ज्यादा पीछे नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि इन प्रदेशों की सरकारों ने इसे रोकने के लिए कानून नहीं बनाए। सरकार ने अपने तरफ से कोशिश की और कर रही है, लेकिन लोगों की मानसिकता में अभी नकारात्मक बातें भरी पड़ी हैं। तंत्र-मंत्र, जादू-टोना पर विश्वास अब भी कायम है। झारखंड में डायन प्रथा विरोधी कानून साल 2001 से ही लागू है। इसके बाद भी समाज में कोई खास बदलाव नहीं आया है। राजस्थान सरकार ने डायन प्रथा विरोधी कानून, 2015 पास करके ऐसी हत्याओं पर रोक लगाने की कोशिश की है।

असम में तो पिछले पांच सालों में 70 से अधिक महिलाओं को डायन बताकर मार दिया गया। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि राज्यों में हर साल डायन के नाम पर महिलाओ ंकी बलि ली जा रही है। पुलिस और प्रशासन बहुत दबाव पडऩे और मीडिया में बात उछल जाने पर फौरी तौर पर कुछ कार्रवाइयां करके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है। कुछ लोग गिरफ्तार किए जाते हैं, बाद में जमानत पर छूटकर चले आते हैं, कई बार तो क्या, ज्यादातर मामलों में आरोपी सुबूत के अभाव में बरी तक हो जाते हैं। इस अभिशाप के खिलाफ आवाज सदियों से नहीं उठती रही है, लेकिन इस अभिशाप के खिलाफ असम ने जो पहल की है, वह बेमिसाल है। असम की ही एक बहादुर महिला 62 वर्षीय बीरूबाला डायन बताकर मार देने वाले अंधविश्वास के खिलाफ पिछले कई सालों से लड़ रही है। वह अब तक 42 से अधिक महिलाओं की जान इस डायन प्रथा रूपी अभिशाप से बचा चुकी है। अब असम ही नहीं, बल्कि कई राज्यों में महिलाएं और पुरुष धार्मिक अंधविश्वासों के प्रति जागरूक हो रहे हैं। वे इसके खिलाफ आवाज भी उठाने लगे हैं, लेकिन अभी इस मामले में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। हां, असम जैसे राज्य ने पहल कर दी है। असम विधानसभा ने पिछले दिनों डायन हत्या निषेध विधेयक पारित किया है। यह विधेयक कितना कारगर होगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन अगर सरकारी मशीनरी ठीक से डायन हत्या निषेध विधेयक पर अमल करे, तो बहुत हद तक ऐसी हत्याओं को रोका जा सकता है।

असम में लागू किए गए नए कानून के अनुसार, किसी को डायन करार देना या फिर डायन के नाम पर किसी का शारीरिक और मानसिक उत्पीडऩ करने को संज्ञेय अपराध माना जाएगा और गैर जमानती धाराएं लगाई जाएंगी। डायन करार देने वाले अभियुक्तों को तीन से पांच वर्ष के करावास की सजा और उससे 50 हजार से पांच लाख रुपये तक का जुर्माना वसूलने का प्रावधान रखा गया है। डायन के नाम पर किसी के साथ शारीरिक और मानसिक उत्पीडऩ करने पर पांच से दस साल तक की सजा और अधिकतम पांच लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है। डायन बताकर हत्या करने के आरोप में धारा 302 लगाई जाएगी। डायन के नाम पर किसी को आत्महत्या के लिए विवश करने पर सात वर्ष से अधिकतम आजीवन करावास की सजा का प्रावधान है।

साथ ही ऐसे अपराध में दोषी व्यक्ति से 5 लाख रुपये जुर्माना भी वसूला जाएगा। अगर किसी मामले की जांच में कोई लापरवाही सामने आई, तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई का प्रावधान रखा गया है।

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