आरटीआई दायरे में आने से परहेज क्यों

3:50 pm or September 7, 2015
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——अरविंद जयतिलक——-

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि केंद्र की राजग सरकार इस बात के लिए तैयार नहीं कि राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) के दायरे में लाया जाए। उसने सर्वोच्च अदालत में दायर हलफनामे में तर्क दिया है कि ऐसा करने से आंतरिक कामकाज प्रभावित होगा और राजनीतिक विरोधियों को दुर्भावनापूर्ण मंशा से जानकारी हासिल करने के लिए आवेदन करने में मदद मिलेगी। साथ ही यह भी कहा है कि चूंकि राजनीतिक दल धारा 2(एच) के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण हैं और सूचना का अधिकार कानून लागू करने की प्रक्रिया के दौरान राजनीतिक दलों को इस कानून के दायरे में लाने की परिकल्पना नहीं थी और न ही इस पर विचार किया गया ऐसे में राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार कानून के दायरे में लाना किस तरह न्यायसंगत होगा। सरकार का यह भी तर्क है कि चूंकि राजनीतिक दलों के वित्तीय मामले पहले से ही इनकम टैक्स के दायरे में है और राजनीतिक दलों द्वारा उपलब्ध करायी गयी जानकारी चुनाव आयोग अपने वेबसाइट पर डालता है ऐसे में राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार कानून के दायरे में लाना उचित नहीं होगा।

यहां जानना जरुरी है कि एक गैर सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फाॅर डेमोक्रेटिक रिफाम्र्स’ ने मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को 20 हजार रुपए से कम मिलने वाले धन के मामले में पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सर्वोच्च अदालत में याचिका दायर की है और राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार कानून के दायरे में लाने की मांग की गयी है। याचिका में कहा गया है कि राजनीतिक दल पब्लिक एथाॅरिटी हैं और उन्हें जो डोनेशन मिलता है वह उस पर टैक्स नहीं देते। 20 हजार से कम के चंदे की जानकारी भी उन्हें नहीं देना होता है। इससे पहले भी इस संगठन ने मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को मिलने वाले धन के मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चिचत करने के लिए याचिका दायर की गयी थी और उसमें कहा गया था कि राजनीतिक दल औद्योगिक घरानों से मोटा चंदा वसूलते हैं लेकिन चंदे का स्रोत सार्वजनिक नहीं करते। गौरतलब है कि याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने गत सात जुलाई को केंद्र सरकार, निर्वाचन आयोग, कांग्रेस तथा भाजपा समेत छः राजनीतिक दलों को नोटिस जारी किया और अब जवाब में सरकार ने हलफनामा दायर किया है।

यह समझना कठिन है कि जब राजनीतिक दल पारदर्शी हैं और उनके कामकाज में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं है तो फिर उन्हें सूचना का अधिकार कानून के दायरे में आने से भय क्यों? उनकी यह दलील कि आरटीआई के दायरे में आने से विरोधी राजनीतिक दल कानून का दुरुपयोग करेंगे एक किस्म से कुतर्क भर है। उन्हें समझना होगा कि दुनिया में ऐसा कोई कानून नहीं है जिसका दुरुपयोग न होता हो। लेकिन इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि कानून का बनना ही बंद हो जाए? सच तो यह है कि राजनीतिक दल आरटीआई के दायरे में आने से इसलिए बच रहे हैं कि उनके कामकाज में अनियमितता है और वे उन्हें देश के सामने नहीं आने देना चाहते। साथ ही वे इस बात को लेकर भी भयभीत हैं कि सूचना अधिकार कानून के दायरे में आने से उन्हें अपने पदाधिकारियों की नियुक्ति से लेकर चुनाव में प्रत्याशियों के चयन, रैली में होने वाले खर्च, पार्टी बैठकों में लिए गए निर्णय और पार्टी की आय के स्रोत से जुड़ी सभी जानकारी देना होगा। इससे बचने के लिए ही तर्क दे रहे हैं कि चूंकि उनका संगठन गांव से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर है, ऐसे में हजारों सूचना अधिकारियों की नियुक्ति और मांगी गयी सभी सूचनाओं का जवाब देना उनके लिए संभव नहीं होगा।

गौर करें तो इस दलील में तनिक भी दम नहीं है। इसलिए कि जब राजनीतिक दल अपने संगठन का विस्तार कर सकते हैं तो वे सूचना देने वाले पदाधिकारी की नियुक्ति क्यों नहीं कर सकते। मजे की बात यह कि इस मामले में सभी राजनीतिक दलों की मनःस्थिति एक जैसी है। कोई भी दल इस कानून के दायरे में आने के लिए तैयार नहीं। याद होगा सभी राजनीतिक दलों सहमति से ही आरटीआई कानून में संशोधन के लिए लोकसभा में एक विधेयक पेश किया गया जिसका मकसद राजनीतिक दलों को जनप्रशासन की परिभाषा से अलग करना था। विधेयक को 12 सितंबर 2013 को संसद की स्थायी समिति के समक्ष भेजा गया किंतु 15 वीं लोकसभा भंग होने के साथ ही विधेयक लटक गया। बहरहाल राजनीतिक दलों को देश को बताना चाहिए कि सूचना अधिकार कानून के दायरे में आने से किस तरह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचेगा? जब उनके पास छिपाने को कुछ नहीं तो फिर सबकुछ सार्वजनिक करने में आपत्ति क्यों है? उन्हें तो खुश होना चाहिए कि सूचना का अधिकार कानून के दायरे में आने से उन्हें जनता की कसौटी पर खरा उतरने का एक मौका मिलेगा। उनका यह तर्क कि मौजूदा कानून और चुनाव आयोग उन पर नियंत्रण और नियमन में सक्षम है उचित नहीं है। अगर ऐसा होता तो चुनाव आयोग राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने का समर्थन नहीं करता।

सवाल यह भी है कि जब राजनीतिक दल सरकार से रियायती दर पर जमीन और बंगला हासिल करते हैं, आयकर में छूट लेते हैं, चुनाव के दौरान आकाशवाणी एवं दूददर्शन पर मुफ्त में पार्टी की नीतियों का प्रसारण करते हैं तो फिर उन्हें सूचना अधिकार कानून के दायरे में क्यों नहीं आना चाहिए? क्या वे कानून और संविधान से उपर हैं? क्या उनकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वे अपनी जवाबदेही के दायरे का विस्तार करें? लेकिन जिस तरह वे कुतर्क गढ़कर बचने की कोशिश कर रहें हैं यह उनके नीयत पर सवाल पैदा करता है। दरअसल उनकी सबसे बड़ी चिंता आय के उन स्रोतों को लेकर है जिसे वे किसी कीमत पर सार्वजनिक होने देना नहीं चाहते। यह तथ्य है कि राजनीतिक दल कुल चंदे की 20 फीसद राशि देने वाले दाताओं के नामों को तो उजागर करते हैं लेकिन 80 फीसद चंदा जो 20-20 हजार रुपए के कूपन बेचकर कमाते हैं उन नामों का खुलासा नहीं करते। इसका कोई कानूनी प्रावधान भी नहीं है। लेकिन अगर वे सूचना अधिकार कानून की परिधि में आते हैं तो उन्हें मांगी गयी सूचनाओं के तहत ऐसे नामों का खुलासा करना ही होगा। यही नहीं उन पर जनता की निगाहबानी भी बढ़ जाएगी और उनसे पाई-पाई का हिसाब देना होगा। उनकी चिंता इस बात को भी लेकर है कि उनसे प्रत्याशियों के चयन का आधार और सरकार बनाने के लिए राजनीतिक जोड़-तोड़ से जुड़ी सूचनाएं भी मांगी जा सकती है। साथ ही उन्हें चुनावों में परिवारीजनों, बाहुबलियों और माफियाओं को टिकट देने से जुड़ी सूचनाएं भी देनी होगी। मजे की बात यह कि राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता ही सूचना अधिकार कानून के तहत अपने दलों से सबसे अधिक सूचनाएं सार्वजनिक करने की मांग करेंगे। यह किसी से छिपा नहीं है कि राजनीतिक दलों के नियंता अपने संबंधियों को लाभ पहुंचाने के लिए अपने ही दल के जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करते हैं। चूंकि इस तरह की कई चिंताओं से राजनीतिक दल डरे हुए हैं यही वजह है कि वे सूचना अधिकार कानून के दायरे में आने को तैयार नहीं।

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