किस तरह से लोहियावादी और समाजवादी हैं मुलायम

2:57 pm or September 12, 2015
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 ——अरविंद जयतिलक——
जरा फर्ज कीजिए कि डा0 राममनोहर लोहिया आज जिंदा होते तो महागठबंधन से अलग हुए समाजवाद का लिबास ओढ़ रखे मुलायम सिंह यादव को लेकर उनकी धारणा क्या होती? क्या वह ऐसे समाजवादी झंडाबरदार को अपने नाम का पट्टा झुलाने की इजाजत देते जो ऐन वक्त पर पीठ फेर लेता है? क्या वह ऐसे राजनेता को अपनी पार्टी के नाम के आगे समाजवादी शब्द लगाने की छूट देते जिसके विचार, मूल्य और राजनीतिक सिद्धांत अतार्किक और कमजोर ही नहीं बल्कि अवसरवादितापूर्ण है? सच तो यह है कि डा0 लोहिया ऐसे अवसरवादी राजनेताओं से समाजवादी कहलाने का तमगा ही छीन लेते जो उनकी नाम का माला तो जपते हैं किंतु उनके बताए रास्ते पर चलने को तैयार नहीं।

इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि सीट बंटवारे के तहत मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी को अपेक्षा के अनुरुप सीटें नहीं मिली। यह भी सही है कि उन्हें सीट बंटवारे से अवगत भी नहीं कराया गया। लेकिन जिस तरह उन्होंने वितंडा खड़ा कर महागठबंधन से अलग होने का निर्णय लिया वह उनके कद के नेता को बिल्कुल शोभा नहीं देता। समाजवादी पार्टी के बोलवचन से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानों उनका दर्द कम सीटों को लेकर नहीं बल्कि इसके पीछे की सुविचारित रणनीति कुछ और ही है। अगर कम सीटें मिलने का दर्द होता तो निःसंदेह मुलायम सिंह यादव महागठबंधन के साथियों से बात कर बीच का रास्ता निकालते। इसलिए और भी कि वे महागठबंधन के अभिभावक थे। लेकिन वे ऐसा न कर स्वयं को शक के दायरे में ला दिया है। मनुहार के बाद भी जिस तरह वे जिद् पर अड़े हुए हैं उससे साफ लग रहा है कि वे महागठबंधन से अलग होने का मौका ढुंढ रहे थे। गौर करें तो उनकी भूमिका उसी समय से शक के दायरे में है जब उन्होंने समाजवादी विचारधारा से जुड़े सभी दलों के विलय के प्रस्ताव को नकार दिया। हालांकि वे महागठबंधन का हिस्सा जरुर बने लेकिन वे इसमें भी अपना ही फायदा तलाशते रहे। अगर महागठबंधन को लेकर उनकी नीयत साफ होती तो वे पटना की स्वाभिमान रैली में स्वयं पहुंचते न कि अपने अनुज व मंत्री शिवपाल सिंह यादव को भेजते। बावजूद इसके शिवपाल सिंह यादव ने रैली में कहा कि समाजवादी पार्टी हर कुर्बानी देने को तैयार है। अब मुलायम सिंह को बताना चाहिए कि कुर्बानी से पीछे क्यों हट रहे हैं?

गौर करें तो फायदे के लिए मुलायम सिंह का दो कदम आगे और चार कदम पीछे हटना पुरानी रवायत है। उनके लिए राजनीतिक मूल्य और सिद्धांत का तब तक कोई मूल्य-महत्व नहीं जब तक कि फायदा न मिले। याद होगा 2008 में अमेरिका से परमाणु करार के वक्त वे अंत तक वामदलों को विश्वास दिलाते रहे कि उनके साथ हैं। लेकिन ऐन वक्त पर पाला बदलकर कांगे्रस के साथ खड़े हो गए। इसी तरह उन्होंने 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में पहले ममता बनर्जी से गलबहियां की और बाद में पलटी मारकर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के साथ हो लिए। मुलायम सिंह यादव के महागठबंधन से अलग होने के निर्णय के पीछे कुछ अन्य मजबूरियां भी हैं। मसलन उन पर आय से अधिक संपत्ति का मामला है और उन्हें डर है कि केंद्र सरकार के इशारे पर सीबीआई परेशान कर सकती है। इसके अलावा नोएडा के पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह का मामला भी उनके सुपुत्र की सरकार की गले का फांस बना हुआ है। इस मामले की जांच सीबीआई कर रही है। समाजववादी पार्टी को डर है कि सीबीआई इस प्रकरण में उसे घसीट सकती है। दूसरा कारण यह भी है कि समाजवादी पार्टी महागठबंधन में शामिल होती है तो उसे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सीटें देनी होगी जो उसे मंजूर नहीं है। कहा तो यह भी जा रहा है कि लालू प्रसाद यादव की शह पर मुलायम सिंह यादव कठोर हुए हैं। दरअसल वे कांग्रेस और नीतीश कुमार के बीच बढ़ रही नजदीकियों को लेकर परेशान हैं। उन्हें डर है कि कांग्रेस और जदयू मिलकर उन्हें कमजोर कर सकते हैं। बहरहाल सच जो भी हो पर मुलायम सिंह यादव ने अगर महागठबंधन से अलग होने का निर्णय लिया है तो उसके फायदे और नुकसान जरुर टटोला होगा। विगत दो चुनाव के आंकड़ों पर गौर करें तो समाजवादी पार्टी ने 2005 के चुनाव में कुल 158 सीटों पर चुनाव लड़ी जिसमें दो सीटों पर उसे विजय मिली और 150 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हुई। इस चुनाव में उसे कुल 2.52 फीसद वोट हासिल हुआ। 2010 के चुनाव में समाजवादी पार्टी कुल 46 सीटों पर चुनाव लड़ी और सभी सीटों पर जमानत जब्त हो गयी। इस चुनाव में उसका वोट फीसद गिरकर 0.55 फीसद पर आ गया। इन आंकड़ों से समझा जा सकता है कि बिहार में समाजवादी पार्टी का कितना जनाधार है। दरअसल समाजवादी पार्टी की रणनीति वामदलों समेत राजद से नाराज पप्पू यादव और एनसीपी से मिलकर मोर्चा बनाकर भाजपा की राह आसान करने की है। बहरहाल कहना मुश्किल है कि यह मोर्चा आकार लेगा या नहीं लेकिन मुलायम सिंह यादव ने महागठबंधन से अलग होकर एक सच्चे समाजवादी और लोहियावादी कहलाने का नैतिक अधिकार जरुर खो दिया है।

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