संघ की संघ के लिए संघ द्वारा संचालित सरकार

2:51 pm or September 16, 2015
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संघ की संघ के लिए संघ द्वारा संचालित सरकार

——हरीश खरे——-

उदार सोच वाले लोग सिर्फ इसलिए अपना सर्वस्व क्यों खो रहे है कि प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों ने संघ प्रमुख और उनके सलाहकारों के समक्ष हाजिर होना स्वीकार किया है?

पंद्रह साल पहले इसी  महीने के शुरू में भारत के एक  प्रधानमंत्री  संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक अधिवेशन में भाग लेने के लियें अमेरिका गए थे। उस यात्रा के दौरान उन्हें स्टेटन द्वीप में विश्व हिंदू परिषद के एक समारोह में भाग लेने का अवसर मिला। जहाँ उन्होंने खुद  को  एक स्वयंसेवक घोषित किया। हाँ, ऐसा ही स्वयंसेवक जैसा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में होता है। यह सुनना  नागपुर घराने के लिए कर्णप्रिय था। एक प्रधानमन्त्री जो इस हिन्दू संगठन से कोई मतलब नहीं होने का  हमेशा नाटक करता रहा वह अचानक प्रायश्चित के मूड में आ गया।

नई दिल्ली वापस आने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी का उत्साह लंबे समय तक बरकरार नहीं रहा।आर.एस.एस. द्वारा प्रधानमंत्री से की जा रही अपेक्षाओं  और  एक प्रधानमंत्री द्वारा  ली गयी संवैधानिक शपथ के बीच जो टकराव था वह इतना साफ़ दिखाई दे रहा था की दोनों के बीच कोई सार्थक जुगलबंदी नहीं हो सकती थी।

हालांकि वाजपेयी ने अपनी नाममात्र की उपस्थिति दर्ज कराने के लिए संघ के वार्षिक गुरु दक्षिणा कार्यक्रम में उपस्थित होना  जारी रखा, किन्तु वे  नागपुर की टोली के  विरोध से नहीं डरते थे। गुजरात में 2002 के मुस्लिम विरोधी दंगों के बाद वाजपेयी के लिए इन स्वयंसेवक साथियों के साथ शिष्ट वार्तालाप जारी रखना साधारण तौर पर संभव नहीं था। चूंकि वाजपेयी संघ के गुरुओं द्वारा खींची गयी लकीरों के बाहर जाकर स्वयं की लकीर खींचना  चाहते थे, इसलिए संघ ने उन्हें कभी माफ़ नहीं किया।

पुनः 10 साल पहले जुलाई 2005 में नागपुर घराने द्वारा अधिकृत किये गए तीन गुरु भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी को यह कहने  के लिए दिल्ली गए कि वे  अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दें।आडवाणी ने मुहम्मद अली जिन्ना की दबी जुबान में थोड़ी प्रशंसा कर देने की भूल की थी।  भाजपा के सभी शीर्ष नेता इस मामले में शांत रहे और उन्होंने इस मामले को  इस प्रकार अनदेखा कर दिया, मानो उन्हें कुछ पता ही न हो। किन्तु नागपुर घराने की  ताकतों ने आडवाणी पर इस प्रकार हमला किया मानो वे सिर्फ एक ब्लॉक स्तर के राजनेता हों। इन ताकतों द्वारा आडवाणी  को निःशक्त कर दिया गया था। साल के अंत तक उन्होंने  पार्टी के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया।

नागपुर के आका अपने इस प्रथम सिद्धांत को  पुनः मजबूत  करना चाहते थे कि भाजपा के किसी भी नेता को लाइन से बाहर जाकर काम करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। वे वाजपेयी और उनके उदारवादी रवैये को पर्याप्त सहन कर चुके थे।

पिछले सप्ताह, सरसंघचालक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रियों को तलब करके जब फिर से इस बात पर जोर दिया तो स्पष्ट हो गया कि यह पहला सिद्धांत ही था। ठीक है, यदि आप एक स्वयंसेवक हैं, तो आपको पदानुक्रम में उच्च श्रेणी के लोगों द्वारा तलब किये जाने पर हाजिर होना पड़ेगा।   सुषमा स्वराज, जैसा कि वे स्वीकार कर चुकी है, आर.एस.एस. की भक्त नहीं है, और न ही अरुण जेटली है। वे  दिल्ली में अपने ‘उदार और सभ्य “मित्रों के समक्ष संघ से अपनी दूरी के  तथ्य को जाहिर करने में  भले ही कामयाब  रहे हों लेकिन दोनों में से किसी के भी पास सिवाय संघ के  हुक्म की तामील करने के अलावा कोई चारा नहीं था।

खुला रहस्य

दार सोच वाले लोग सिर्फ इसलिए अपना सर्वस्व क्यों खो रहे है कि प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों ने संघ प्रमुख और उनके सलाहकारों के समक्ष हाजिर होना स्वीकार किया है? अंततः मोदी और संघ का सम्बन्ध कोई नई बात नहीं है।

यह कोई रहस्य नहीं था कि आर.एस.एस. द्वारा मोदी को किया गया खुला समर्थन ही उन्हें भाजपा द्वारा प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाने में निर्णायक साबित हुआ।  2014 की चुनावी प्रक्रिया में मोदी के लिए  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा काम किया जाना भी कोई गोपनीय मामला नहीं था। यह एकदम खुला और भलीभांति लिपिबद्ध  दस्तावेज था।

मोदी ने अपने गुजरात के  दिनों से ही यह आधिकारिक रूप से तय कर रखा है कि आर.एस.एस. और उसके पदाधिकारियों की आकांक्षाओं की पूर्ति  कैसे की जाये। मोदी होशियार जरूर है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे वाजपेयी की तरह समझदार भी हों। उन्होंने बड़ी चतुराई से छोटे लोगों और उनकी छोटी जरूरतों को समझ लिया है।

सच कहें तो, मोदी ने आर.एस.एस. से अपने रिश्तों के बारे में कभी भी किसी को अंधेरे में नहीं रखा। फिर भी नई दिल्ली स्थित बुद्धिजीवियों और  अन्य चिंतकों में से  श्रेष्ठ और ख्यात लोग  मोदी के  विकास मन्त्र के झांसे में आते  है तो यह उनकी समस्या है- मोदी की नहीं।

अफसोस करने की बजाय प्रत्येक उदारवादी सोच के व्यक्ति को  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा अपना मुखौटा हटा देने के फैसले का स्वागत करना चाहिए। अब इसका अन्धकार वाला कोई पक्ष नहीं है।

जो पहले ही घटित हो चुका, उसे देखिये। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जो खुद को नैतिक मूल्यों का अकेला ही ठेकेदार मानता है, अब वह भाजपा के पथभ्रष्ट और अनैतिक मुख्यमंत्रियों शिवराज सिंह चौहान (मध्यप्रदेश) और वसुंधरा राजे (राजस्थान) के बचाव में व्यर्थ ही अपने शब्दों को बर्बाद कर रहा है। यह पता लगाना ज्ञानवर्धक होगा कि रातोंरात उद्योगपति बने ललित मोदी के बारे में जयपुर में संघ की प्रातःकालीन शाखा में किस प्रकार बताया गया। इसी तरह यह जानना सारगर्भित होगा कि भोपाल में व्यापम नामक भयावह घोटाले के सन्दर्भ में क्या स्पष्टीकरण दिया गया।

दरअसल, किसी ने भी इस बात पर गौर नहीं किया कि आर.एस.एस. ने अब स्वयं को भाजपा का प्रवक्ता बना लेने तक सीमित कर लिया है।

भाजपा के दो अन्य मुख्यमंत्री- हरियाणा और महाराष्ट्र के, जो दोनों ही संघ के ब्रेन वाशिंग फैक्ट्री सिस्टम के शानदार उत्पाद है,  वे  सुशासन या आर.एस.एस. ब्रांड के लिए मामूली विज्ञापन मात्र  रह गए है।

लोगों को  भड़काने की नई चाह प्रदर्शित करने के अलावा मनोहरलाल खट्टर की बाबा रामदेव से बेहूदी आसक्ति और देवेंद्र फडणवीस की प्रतिबन्धों में रूचि- इन दो चीजों ने  शायद ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिष्ठा में वृद्धि की है।

लोकतंत्र विरोधी तर्क

यह अधिक दिलचस्प है कि मोदी और उनके मंत्रियों की संघ की गुप्त सभा में उपस्थिति पर भाजपा समर्थकों ने धृष्टतापूर्वक सफाई देते हुए संघ की तुलना सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद से की है। उन्होंने कहा है कि मोदी और उनके मंत्रियों का संघ की बैठक में उपस्थित होना यू.पी.ए. सरकार के मंत्रियों और  मनमोहन सिंह का राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की बैठक में उपस्थित होने से भिन्न नहीं है।

यद्यपि यह हकीकत है किन्तु इसके बावजूद एन.ए.सी. (राष्ट्रीय सलाहकार परिषद) सरकार द्वारा गठित,  एक राजपत्रित संस्था थी।  इस हकीकत के बावजूद सोनिया गांधी वैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त एक राजनीतिक दल की प्रमुख है।  वे स्वयं के चुनाव चिन्ह  के साथ चुनावी मैदान में उतरती है।  तब भी सोनिया गांधी और मोहन भागवत के बीच नैतिकता आधारित  तुलना  के किसी भी सुझाव का  विरोध नहीं किया जाना चाहिए।

शायद, यह भी संतोष की बात होनी चाहिए कि आर.एस.एस. सिर्फ एक सांस्कृतिक संगठन होने के अपने नकली आवरण से बाहर आ गया है।  लोकतांत्रिक ताकतों को इसका स्वागत करना चाहिए और इसे सूचना के अधिकार के दायरे में लाने की  मांग करनी चाहिए। बहरहाल, इसके द्वारा बौद्धिक प्राधान्य को लक्ष्य करने का नया प्रयास गंभीर चिंता का विषय है। उदाहरण के लिए, मोदी सरकार में संस्कृति मंत्री महेश शर्मा, जो कि एक  मँजे हुए भगवा खिलाडी है, उन्होंने तर्क दिया है कि मोदी और भाजपा के लिए मतदान करके मतदाताओं ने शिक्षा, संस्कृति और अन्य संस्थानों के ‘भगवाकरण’ के लिए जनादेश दिया है। क्या  सिर्फ 31% मतों के साथ  मोदी सरकार यह विश्वास करना चाहती हैं कि उसे  आर.एस.एस. के एजेंडे को लागू करने के लिए एक लाइसेंस दे दिया गया है?

यह एक लोकतंत्र विरोधी तर्क है और इसमें एक प्रकार की नैतिक दुर्गन्ध भरी हुयी है। प्रधानमंत्री और उनके मंत्रीगण सरसंघचालक के समक्ष जो भी आज्ञाकारिता  प्रस्तुत करने को चुने, उन्हें यह याद रखने  की जरुरत है  कि वे अभी भी किसी चीज से बंधे हुए है जिसे  भारत का संविधान  कहा जाता है। भारत अभी भी एक संवैधानिक प्रजातंत्र है और उसके शासक, भले ही लोकसभा में उनकी कितनी भी सीटें  क्यों न हो, वे अभी भी एक मजबूत संसद और स्वतंत्र न्यायपालिका के प्रति जवाबदेह हैं,

(हरीश खरे “द ट्रिब्यून” के प्रधान संपादक  है)

“द  ट्रिब्यून” से साभार

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