नेपाल में धर्मनिरपेक्षता की जीत

5:06 pm or September 22, 2015
Nepal Constitution

——कृष्ण प्रताप सिंह——-

पिछले आठ वर्षों से लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता का स्वाद ले रहे हमारे पड़ोसी देश नेपाल ने अंततः ‘अपनी जड़ों की ओर लौटकर’ फिर से हिन्दू राष्ट्र बनने से साफ इनकार कर दिया। वहां की राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के अध्यक्ष कमल थापा और सांसद अमृत बोहरा ने छः सौ एक सदस्यों वाली संविधानसभा की बैठक में देश के प्रस्तावित संविधान से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने और पुरानी हिन्दू पहचान बहाल करने की मांग की तो उन्हें इतने सदस्यों का समर्थन भी नहीं मिल पाया कि वे अपनी मांग के पक्ष में मतदान पर जोर दे पाते। इसके लिए उन्हें कम से कम 61 सदस्यों का समर्थन चाहिए था, लेकिन यह संख्या इक्कीस पर ही अटक गयी और सभा के अध्यक्ष सुभाषचंद्र नेमबांग को मांग खारिज कर देने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई।

राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी भले ही अपने नाम में प्रजातंत्र शब्द को ढोती आ रही हो, नेपाली जानते हैं कि वह हिन्दुत्व के साथ उस राजशाही की भी समर्थक है, आठ साल पहले जिसे ‘क्रांतिकारी’ माओवादियों ने अपने नेता प्रचंड के नेतृत्व में मुख्य धारा में आने के अपने प्रयत्नों के तहत उखाड़ फेंका था। नेपाल को ‘धर्मनिरपेक्ष गणराज्य’ घोषित करने का श्रेय भी माओवादियों के ही खाते में है। लेकिन अब इस गणराज्य के खिलाफ ‘प्रतिक्रांति’ में विफल रहने के बाद राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी को उसकी विफलता का दंश कम और यह कारण ज्यादा सतायेगा कि उसकी यह विफलता सिर्फ माओवादियों की दी सौगात नहीं है।

माओवादी तो अपनी नौ महीने की सत्ता में दलितों, महिलाओं, उत्पीडि़त जनजातियों और विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों की पवित्र आकांक्षाओं का बोझ ढोते-ढोते थककर बाहर हो गये और उनका तिरस्कार झेल रहे हैं। अपने सत्ता में रहते गठित पहली संविधान सभा में वे देश के नये लोकतांत्रिक संविधान का निर्माण नहीं करा सके और इन दिनों जो दूसरी संविधानसभा अस्तित्व में है, उसमें तीसरे नम्बर पर चले गये हैं। लम्बे संक्रमणकाल ने उनकी शक्ति क्षीण करके रख दी है, जबकि उनका इकबाल ऐसा खो गया है कि भले ही उन्होंने संघीयता का अपना एजेंडा कायम रखा हो, वे किसी भी मामले में अपनी पसंद को तरजीह नहीं दिलवा पा रहे।

उनकी इतनी दुर्दशा के बावजूद देश की पहचान के मुद्दे पर राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के बुरी तरह गच्चा खा जाने का अर्थ है कि गैरमाओवादी पार्टियां भी पूरे मन से हिन्दू राष्ट्र या राजशाही की वापसी नहीं ही चाहतीं। समझती हैं कि भले ही राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी जनाक्रोश के डर से अभी सीधे-सीधे राजशाही की वापसी की बात नहीं कर रही, हिन्दू पहचान का सवाल आगे करके उन्हीं वर्गो के हितों की सेवा करना चाहती है, जो पिछले ढाई सौ बरसों से राजतंत्र के ढांचे को मजबूत करते आ रहे थे।

इसे यों भी समझ सकते हैं कि राजशाही के खात्मे के बाद नेपाल में जो लोकतंत्र स्थापित हुआ, वह कैसा भी हो, उसके गुणों व मूल्यों से अभी इन पार्टियों का मोहभंग नहीं हुआ है। तभी तो उनके वे धड़े भी संविधान सभा में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी का साथ देने की हिम्मत नहीं दिखा पाये, जिन्होंने, कहते हैं कि, परदे की आड़ में उसे ऐसा करने का वचन दिया था। मोहभंग के लिए आठ साल का वक्त वैसे भी बहुत ज्यादा नहीं होता और इतने में मोहभंग हो भी जाये तो नतीजे के तौर पर हम अनिवार्य रूप से पीछे नहीं लौट जाते। रेलगाड़ी के देर से चलने से नाराज होकर बैलगाड़ी में भला कौन जा बैठता है? लोकतंत्र की खुली हवा में सांस लेने की सहूलियत हो तो धर्मराज्य का बंद पिंजरा भला किसे अच्छा लगेगा? दुनिया भर में धर्म व पूंजी आधारित राष्ट्रों में वहां के निवासियों की दुर्दशा हर किसी के लिए खुला हुआ सबक है। शायद इसीलिए भारत में भी आजादी के लगभग सात दशकों में ढेरों नाउम्मीदियों के बावजूद लोकतंत्र व धर्मनिरपेक्षता के विरोधी न उन्हें पूरी तरह बदनाम कर पाये हैं और न धर्मनिरपेक्षता को संविधान से निकाल पाये हैं।

अब नेपाल के हिंसा व आगजनी पर आमादा हिन्दुत्ववादियों की पुलिस व सुरक्षाबलों से भिड़ंत आदि की कार्रवाइयों में उनकी झुंझलाहट साफ पढ़ी जा सकती है। यह झुंझलाहट जितनी नेपाल में, उससे कहीं ज्यादा ज्यादा भारत में दिखायी दे रही है। राजशाही के पतन के वक्त भी ‘मुद्दई सुस्त और गवाह चुस्त’ का ऐसा ही समां दिखा था। तब एक प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट ने अपने कार्टून में टिप्पणी की थी कि नेपाल में राजशाही इसलिए पराजित हो गयी कि राजा ‘उधर’ यानी नेपाल में था और उसकी फौज ‘इधर’ यानी भारत में! इस बार इधर के हिन्दुत्ववादी कुछ ज्यादा ही झुंझलाए हुए हैं और उनका मूड इतना खराब है कि वे अपनी प्रतिक्रियाएं तक संयत नहीं रख पा रहे, दिल्ली और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुुनावों में ‘लाल किले’ में सेंध लगाने में मिली सफलता का जश्न भी नहीं मना पा रहे, तो कारण यह है कि अनावश्यक उत्साह के अतिरेक में उन्होंने नेपाल की पहचान से जुड़े इस मामले को अपने तईं उसका आंतरिक मामला नहीं रहने दिया था। वे अपनी पूरी कूबत से वहां हिन्दू पहचान के पक्ष में सक्रिय और इस कारण खासे उम्मीद से थे। लेकिन क्या करते, नेपाल की संविधानसभा में मतदान का अधिकार उन्हें नहीं था।

नेपाल को हिन्दू राष्ट्र बनाने में इन ‘इधर’ वालों की दिलचस्पी इस वाकये से समझी जा सकती है कि गत जुलाई में प्रचंड नयी दिल्ली आये तो इन्होंने उनके एक कथन का अनर्थ करके प्रचारित कर डाला कि प्रचंड न सिर्फ नेपाल के भावी संविधान से धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाने पर राजी हो गये हैं, बल्कि ‘नेपाली जनता की इच्छा का सम्मान करते हुए’ उसे फिर से हिन्दू राष्ट्र बनाने की मुहिम में भी लगे हैं। सचाई यह है कि प्रचंड ने न ऐसा कोई संकेत दिया था और न ही ऐसी कोई बात कही थी, जिसका ऐसा अर्थ निकाला जा सके। उन्होंने कहा था-लोकतंत्र में राज्य का कोई धर्म नहीं होता। उसका तो आधारभूत सिद्धांत ही यही है कि राज्य धर्म के बाहर रहकर लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा व सम्मान करे। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ भी यही है। फिर भी हम ऐसे किसी शब्द संयोजन पर विचार कर रहे हैं जो सारे नेपालवासियों को संतुष्ट कर सके।
अब जब साफ है कि धर्मनिरपेक्षता का हटना सबकी तो क्या ज्यादातर की संतुष्टि का भी कारण नहीं है तो इधर और उधर दोनों के हिन्दुत्ववादियों के लिए अपनी झुं्रझलाहट को बेपरदा करने से बेहतर होगा कि वे किसी तर्कसंगत सोच के साथ सामने आयें। बेवजह का वितंडा न खड़ा करें और नेपाल के लोकतंत्र को जनाकांक्षाओं की डगर पर लम्बा सफर तय करने दें। राजशाही वाले हिन्दूराष्ट्र के मुकाबले लोकतांत्रिक नेपाल हम सबके हितों के ज्यादा अनुकूल होगा।

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