आरक्षण पर संघ परिवार की उधेड़बुन

4:35 pm or September 26, 2015
bhagwat

——-डाॅ. महेश परिमल——–

आखिर वही हुआ, जिसका डर था। आरक्षण को लेकर एक बार फिर गुजरात पूरे देश में एक मॉडल के रूप में उभरा है। इस बार भी गुजरात से उठे सवाल पूरे देश में चर्चा का विषय बने हुए हैं। 1975 में गुजरात नवनिर्माण आंादोलन  के रूप में जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति ’ आंदोलन को जन्म दिया था, परिवर्तन के इस दौर में देश में पहली बार कांग्रेस के सहयोग के बिना सरकार मिली है। आज लोकसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने वाली गैरकांग्रेसी पार्टी के रूप में भाजपा सत्ता पर काबिज है। इस स्थिति में एक बार फिर गुजरात का पाटीदार आरक्षण आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर विष घोलने वाला कार्य क्रमश: तीव्र होता जा रहा है। पाटीदार आंदोलन की आड़ में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने प्रवर्तमान आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता करने की बात कही है। इसके साथ ही बयानों की बाढ़-सी आ गई है। हर कोई इसे राजनीतिक चश्मे से देख रहा है। उनके बयान से सत्ता एवं विपक्ष में भी दलीलों-तर्कों की बाढ़ आ गई है।

बिहार चुनाव को देखते हुए भाजपा ने मोहन भागवत के बयान से अपना पल्ला झाड़ लिया है। ऐसा पहली बार देखने में आया है कि सरसंघसंचालक के बयान को भाजपा ने खुद को दरकिनार रखा है। आरक्षण लागू रहेगा। खुद संघ के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने भी बयान जारी कर सफाई दी और कहा,भागवत ने आरक्षण के खिलाफ कुछ नहीं कहा है, बल्कि यह कहा है कि सभी कमजोर वर्गो को इसका लाभ मिलना चाहिए। बिहार चुनाव में राजग की ओर से जहां विकास का नारा दिया गया है, वहीं जमीन पर जातिगत समीकरण भी साधे गए हैं। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव तो यहां तक कहते हैं कि तुम आरक्षण खत्म करने की कहते हो, हम इसे आबादी के अनुपात में बढ़ाएंगे। माई का दूध पिया है तो आरक्षण खत्म करके दिखाओ? किसकी कितनी ताकत है पता लग जाएगा। दूसरी ओर  बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि मोहन भागवत का आरक्षण नीति की समीक्षा का आह्वान ओबीसी, एससी और एसटी के खिलाफ भाजपा का असली रंग और सोच दर्शाता है। बात जब बढ़ने लगी, तो केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को कहना पड़ा कि दलितों और पिछड़ों को आरक्षण के मुद्दे पर पुनर्विचार के पक्ष में भाजपा नहीं है। जनसंघ के समय से ही हम दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, अतिपिछड़ों के पक्ष में रहे हैं। इसके अलावा आर्थिक रूप से पिछड़ों का उत्थान कैसे हो इस पर सुझाव आए तो उसका भी स्वागत होना चाहिए। भागवत ने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा का सुझाव दिया था, लेकिन लालू और नीतीश कुमार ने इसे राजनीतिक रंग देते हुए बयान पर ऐसे प्रतिक्रिया दी, जैसे मौजूदा आरक्षण को खत्म करने की बात कही गई हो। बताते हैं कि महागठबंधन के अंदर इसी मुद्दे पर चुनावी अभियान तेज करने की रणनीति भी बनने लगी थी।

वर्तमान में आरक्षण व्यवस्था जाति आधारित है। सदियों से दमित, शोषित और पीड़ित वर्ग को देश की मुख्यधारा में लाने के लिए उन्हें शिक्षा, व्यवसाय और नौकरी में विशेष छूट देने का प्रावधान रखा गया है। उन्हें दी जाने वाली इस सुविधा को हम आरक्षण के नाम से जानते हैं। पहले नौकरी में दस वर्ष की समयसीमा रखी गई थी। दस वर्ष बाद इसे फिर से लागू कर दिया गया। इस पर पुनर्विचार किया जाता, इसके पहले ही इसे राजनीतिक रंग देना शुरू कर दिया गया। अब इस रंग इतना अधिक गहरा हो गया है कि इस छूना भी मुश्किल हो गया है। इस पर कुछ भी बोलना अब मुसीबत मोल लेने जैसा हो गया है। हिंदुत्व विचारधारा के रंग में रंगी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ कई दशकों से इसे हिंदू समाज के विभाजन का एक कारक मानता आया है। अलबत्ता अस्पृश्यता  और आदिवासी समुदाय के शोषण के समय हिंदू समाज की एकता किस तरह से संभालकर रखी जाए, इसका जवाब संघ के पास नहीं है। इसके बाद भी सामाजिक समरसता मंच, वानवासी कल्याण आदि संस्थाओं के माध्यम से संघ परिवार दलित, आदिवासी समाज को मुख्यधारा में शामिल करने का दावा कर सकता है। जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था से दलित, आदिवासी समुदाय का उत्थान होता नहीं है। शोषित समुदाय का एक वर्ग विशेष ही संविधान में दी गई सुविधाओं का लाभ प्राप्त करता है। इसके अलावा एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जो इन सुविधाओं को प्राप्त करने का अधिकार रखने के बाद भी उससे वंचित है। इससे आरक्षण व्यवस्था को विफल माना जाना चाहिए। इसमें बदलाव कर उसे आर्थिक आधार पर मापदंड तैयार कर आरक्षण व्यवस्था लागू करनी चाहिए, ऐसा संघ परिवार का अघोषित मंतव्य रहा है। पिछले माह ही संघ परिवार के संघ परिवार के विचारक मा.गो. वैद्य ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए गए साक्षात्कार में इस आशय के विचार व्यक्त किए थे।

गुजरात का पाटीदार आंदोलन आखिर किसके दिमाग की उपज है? पहली नजर में तो इसे स्वयंभू माना जा रहा है। पर परदे के पीछे इसे कौन संचालित कर रहा है? इसे सभी जानना चाहते हैं। अनेक थ्योरी सामने आई है, इसमें कभी-कभी संघ परिवार का भी नाम उछाला जाता रहा है। अलबत्ता आंदोलन जिस तरह से सत्ता पक्ष के लिए भारी साबित हो रहा है, उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है, यदि इसकी डोर संघ परिवार के हाथ में होती, तो भी वह इससे इंकार ही करता। क्योंकि इस आंदोलन ने जिस तरह से उग्र रूप दिखाया है, उससे हर कोई अपना हाथ खींचना चाहेगा। वैसे भी गुजरात भाजपा की राजकीय प्रयोगशाला रहा है। देश भर में आज भाजपा को जो राजनीतिक शक्ति मिली है, उसके मूल में गुजरात ही है। 80 के दशक में कांग्रेस द्वारा आजमाई गई विशेष थ्योरी रामबाण सिद्ध हुई थी। इसके खिलाफ भाजपा ने अपना हिंदू कार्ड खेला, इससे मिलने वाली सफलता ही उसे शिखर तक ले आई। इन हालात में एक बार फिर आरक्षण का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है, तो गुजरात की राजनीति को समझना आवश्यक हो जाता है। 80 के दशक में माधवसिंह सोलंकी ने क्षत्रिय, आदिवासी और मुस्लिम (खाम) वोट बैंक को महत्व देना शुरू किया, यह अभियान कांग्रेस के लिए खूब लाभदायी साबित हुआ। इस समय गुजरात विधानसभा की 80 सीटों पर खाम का ही दबदबा था। माधव सिंह की यह नीति इतनी सफल हुई कि 1985  के चुनाव में कांग्रेस ने विधानसभा की 182 सीटों में से 149 सीटों पर अपना कब्जा जमा लिया। जो आज भी एक रिकॉर्ड है। मोदी की लहर के बाद भी भाजपा इतनी सीटें हासिल नहीं कर पाई। खाम फार्मूले की सफलता ने विपक्ष को चारों खाने चित्त कर दिया। उसी समय शुरू हुए आरक्षण आंदोलन ने विपक्ष दलों को अपनी अस्मिता को बचाए रखने का अवसर दिया। आरक्षण विरोधी आंदोलन ने सवर्णों को एकजुट कर दिया। इन सवर्णों का ध्रुवीकरण भाजपा और चिमनभाई पटेल की तरफ हो रहा था, इसी समय आरक्षण आंदोलन ने अचानक नया मोड़ ले लिया, अब यह हिंदू-मुस्लिम दंगे के रूप में तब्दील हो गया। इधर दलित समुदाय का झुकाव भाजपा की तरफ होने लगा। कांग्रेस को हराने के लिए शुरुआत में भाजपा ने चिमनभाई पटेल का सहारा लिया। इसके बाद राममंदिर आंदोलन के कारण भाजपा का वर्चस्व बढ़ा, तो भाजपा ने अकेले ही कमान संभाल ली। इसके बाद आज तक कांग्रेस उभरकर सामने नहीं आ पाई। उसकी सक्रियता केवल आंदोलन, विरोध और बयानबाजी तक ही सीमित होकर रह गई।

भाजपा की यह सफलता राष्ट्रीय स्तर पर सफल नहीं हो पाए, इसलिए राममंदिर के लिए आडवाणी की, साेमनाथ-अयोध्या रथयात्रा को बिहार में लालू प्रसाद यादव ने रोक दी और स्वयं को मुस्लिमों का सच्चा मसीहा साबित करने की कोिशश की। भाजपा को पीछे करने के लिए वी.पी. सिंह ने ताक पर रखे मंडल आयोग की सिफारिशों को सामने लाने की जहमत उठाई। उन्होंने सामाजिक-शैक्षणिक रूप से िपछड़े लोगों को आरक्षण देने की सिफारिश को स्वीकार कर लिया। यह समय देश की राजनीति में तीव्र बदलाव का था। मंडल कार्ड के कारण भाजपा के हिंदू वोटबैंक, जिसमें सवर्णों और दलितों का लगभग समान हिस्सा था, वह तहस-नहस हो गया। विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में जातिवाद समीकरण बदल गए। उत्तर प्रदेश में बसपा, सपा और बिहार में लालू-नीतिश ने मंडल कार्ड के माध्यम से भाजपा के वोटबैंक में सेंधमारी कर दी। आखिरकार भाजपा इन दो राज्यों में हाशिए पर आ गई। अब जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लोगों का झुकाव एक बार फिर भाजपा की बढ़ रहा है, तोे संघ परिवार पुराने जख्म नहीं भूल पाया है। एक बार फिर जातिवाद का कार्ड खेला जा रहा है। भाजपा का वोटबैंक बिखर जाए, इसके पहले आर्थिक आरक्षण का मुद्दा सामने लाकर राष्ट्रीय बहस के नाम पर नए सिरे से वोटबैंक जुगाड़ने की जुगत चल पड़ी है। इसलिए इस समय के हालात कुछ संदेहास्पद हो गए हैं।

बिहार चुनाव की रणभेरी बज चुकी है, तब संघ परिवार आरक्षण का मामला सामने लाता है, तो भाजपा का राजनीतिक घाटा होगा, यह तय है। भागवत के बयान का विरोध सबसे पहले रविशंकर प्रसाद ने किया था। वे बिहार भाजपा के कद्दावर नेता है। िवपक्ष से सबसे उग्र प्रतिक्रिया लालू प्रसाद ने दी थी। जिसमें उन्होंने सीधे नरेंद्र मोदी को निशाना बनाकर कहा था कि हिम्मत है, तो आरक्षण खत्म करके दिखाओ। लालू के इस तेवर में पूरी तरह से राजनीति ही दिखाई दे रही है। आडवाणी की रथयात्रा को रोककर लालू ने खुद को हाईलाइट किया था, इस बार भी आरक्षण पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देकर स्वयं को उभारने की ही कोिशश की है। इस तरह से वे स्वयं को दलित-मुस्लिमों का एकमात्र मसीहा के रूप में प्रोजेक्ट करना चाहते हैं। संघ या भाजपा के लिए आर्थिक आरक्षण पर चर्चा आगामी लोकसभा चुनाव का मुद्दा हो सकता है, परंतु लालू के लिए तो बिहार विधानसभा चुनाव तो प्रतिष्ठा का प्रश्न है। इसलिए वे इसी चुनाव में अपना सब कुछ दांव पर लगाकर चुनावी वैतरणी पार करना चाहते हैं। इस पूरे माहौल में कांग्रेस अभी तक असमंजस में है। वह न तो गुजरात के पाटीदार आंदोलन पर कुछ बोल पा रही है, और न ही अपने वोटबैंक को बचाए रखने के लिए कुछ कह पा रही है। आने वाले दिनों में आरक्षण को लेकर और भी उग्र बयान सामने आएंगे, यह तय है। इसे देखते हुए संघ ने तुरंत ही अपने बयान पर स्पष्टीकरण देना शुरू कर दिया। अब यह बात सामने आ रही है कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था बदलने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। परंतु आरक्षण बनाए रखने के लिए एक गैरराजनीतिक समिति पर पुनर्विचार किया जाए, इस पर जोर दिया जा रहा है।

इस विवादास्पद मुद्दे पर कुछ भी बोलने के लिए प्रधानमंत्री अब इस देश में नहीं हैं। वे आयरलैड के दौरे पर रवाना हो गए हैं। इसलिए अब यह प्रार्थना की जानी चाहिए कि इस मामले पर भाजपा का कोई मंत्री, विधायक या सांसद कुछ ऐसा न कहे, जिससे मामला हाथ से निकल जाए। सभी राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेंक रहे हैं, किंतु उनकी संकुचित मानसिकता और स्वार्थी दृष्टि के कारण ही भारत का मेहनतकश वर्गकी रोटी ही दांव पर लगाई जाती है।

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