फिर दिखने लगा स्वदेशी जागरण मंच

4:52 pm or October 5, 2015
Swadeshi Jagran Manch

——-हरे राम मिश्र——–

जैसा कि संघ परिवार की सियासत पर नजर रखने वालों का कयास था, स्वदेशी जागरण मंच नाम का संगठन ठीक फिर उसी समय सक्रीय हुआ है जब मोदी सरकार की छवि आम जनता में विदेशी पूंजीपतियों के हित में काम करने वाले की बन रही है। पिछली बार भी यह संगठन ठीक उसी समय नजर आया था जब भूमि अधिग्रहण बिल पर मोदी सरकार बुरी तरह घिरी हुई थी और पूरे देश में सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे थे। उस समय भी अचानक से स्वदेशी का राग अलापता यह संगठन मोदी सरकार से बिल को वापस लेने के लिए ज्ञापन भेजते देखा गया था। दरअसल, अचानक से सरकार के खिलाफ सक्रीय दिखने का स्वेदेशी जागरण मंच का इतिहास कोई नया नहीं है। इससे पहले भी पिछली अटल बिहारी सरकार में यह संगठन उस समय अधिक सक्रीय हो गया था जब अटल बिहारी विदेशी मुद्रा इकठ्ठा करने के एजेंडे के तहत विदेशी कम्पनियों से भारत में निवेश करने का आह्वान कर रहे थे और नौरत्नों को बेचने की कोशिश की जा रही थी तथा और इसके तहत एक अलग से ही विनिवेश मंत्रालय बना दिया गया था। जिसके चलते वाजपेयी सरकार की छवि बड़े देशी-विदेशी पूंजीपतियों की सरकार की बन गई थी।

यानी स्वदेशी जागरण मंच ‘सच कम भ्रम ज्यादा’ की संघ परिवार की रणनीति का एक ऐसा पत्ता है जिसे जरूरत पड़ने पर निकाला जाता है और यह जरूरत शायद अब आ पड़ी है। इसीलिए हम देखते हैं कि नरेंद्र भाई मोदी जब विदेशी निवेश ले आने के नाम पर सिर्फ विदेश दौरे ही नहीं कर रहे हैं बल्कि वहां की छोटी-छोटी कम्पनियों के मालिकांे तक से निवेश के लिए गले पड़ रहे हैं और वहीं भारत में छोटी पूंजी के व्यवसाई बदहाल हो रहे हैं, स्वदेशी जागरण मंच प्रभात फेरी पर निकल पड़ा है। मंच लोगों को समझा रहा है कि वे विदेशी सामानों का इस्तेमाल न करें क्योंकि इससे आंतरिक पूंजी का निर्माण नहीं होगा, विदेशी पूंजी देश को कंगाल कर देगी और अपने साथ अपसंस्कृति भी ले आएगी। इस तरह का ज्ञान इस संगठन ने पिछले दिनों 25 सितम्बर यानी पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जन्मदिन से 2 अक्टूबर यानी महात्मा गांधी की जयंती तक चलाए जा रहे ‘स्वदेशी सप्ताह’ के तहत दिया। इसे भी संयोग ही कहा जाएगा कि ठीक पूरे सप्ताह संघ परिवार के सबसे काबिल स्वयं सेवक मोदी विदेशी निवेश कराने देश से बाहर थे। यानी ठीक उसी काम के लिए वे बाहर गए थे जिस काम के खिलाफ उनके गुरूभाई लोग अंदर माहौल बना रहे थे।

यानी एक तरफ स्वयं सेवक प्रधानमंत्री विदेशी पूंजी लाने के लिए महीने में बीस दिन विदेश में ही रह रहे हैं तो वहीं इससे नाराज हो रही जनता के बीच संघ परिवार के दूसरे स्वयं सेवक विदेशी पूंजी का विरोध कर रहे हैं। यह अंतरविरोध आखिर चाल-चरित्र और चेहरा पर जोर देने वाले संघ परिवार में क्यांे है ?

दरअसल, संघ परिवार अपने सैकड़ों आनुषांगिक संगठनों के जरिए एक साथ भांति-भांति की आवाजें निकालने और मुद्राएं अख्त्यिार करने में माहिर है और यही शायद उसकी शक्ति का सबसे बड़ा राज है। जो वह भारतीय जनता की सबसे बड़ी कमजोरी ‘भूलने की आदत’ का लाभ उठा कर अर्जित करता है। इसीलिए हम देखते हैं कि उसके नेता बहुत ही आत्म विश्वास से आज यह कह रहे हैं कि भाजपा तो जातिय आरक्षण की शुरू से ही समर्थक रही है। जबकि उसका पूरा इतिहास ही पिछड़ों और दलितों के आरक्षण के विरोध का रहा है। जिसके कारण उसने बिहार में कर्पूरी ठाकुर की सरकार से समर्थन वापस लेकर सरकार को गिरा दिया था क्योंकि ठाकुर ने राजकीय नौकरियों में पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू करना चाहा था। इसीतरह, उसने विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार से इसीलिए समर्थन वापस ले लिया कि उन्होंने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करते हुए पिछड़ों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का कानून लागू कर दिया था। उस समय संघ परिवार से जुडे़ छात्र संगठन एबीवीपी ने कई जगहों पर पिछड़े छात्रों पर जानलेवा हमले ही नहीं किए थे बल्कि सामाजिक न्याय का विरोध करते हुए स्वर्ण छात्रों को उकसा कर आत्मदाह भी करवाया था। इसी तरह मौजूदा प्रधानमंत्री जो अपने को पिछड़ा बताते हैं गुजरात में संघ परिवार द्वारा पिछड़ों के आरक्षण के खिलाफ चलाए गए आंदोलन के सिपाही रहे हैं। संघ का यही रवैया हम दलितों के सामाजिक न्याय के प्रति भी देख सकते हैं जिसने देश का पहला लोकसभा चुनाव ही इस एजेंडे पर लड़ा था कि अगर उनकी सरकार बन गई तो वे नेहरू द्वारा दलितों को भी मंदिर में प्रवेश का अधिकार के देने वाले संविधान को पलट कर मनु का संविधान लागू करेंगे। उस दौर में संघ के सारे कथित बड़े विचार करपात्री जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, गोलवलकर इसी एजेंडे पर काम कर रहे थे।

यानी, संघ परिवार एक तरफ तो खुल कर बड़ी पूंजी, स्वर्ण-सामंती तत्वों के पक्ष में काम करता है लेकिन जैसे ही जनता उससे सचेत होती है वह तुरंत पैंतरा बदलते हुए दूसरा स्वर निकालने लगता है। आज जरूरत इस बात की है कि देश के वास्तविक सवालों पर नकली मुद्राएं अख्तियार करने वालों को समाज समझे, उनके इतिहास को याद रखे और भ्रम की राजनीति करने वालों से जनता उनके ही इतिहास के हवाले से सवाल पूछे। क्योंकि उस देश या समाज का भविष्य कभी भी उज्जवल नहीं हो सकता जिसे इतिहास भूल जाने की बिमारी हो।

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