कहीं हवा हवाई तो नहीं स्वच्छ भारत मिशन?

5:03 pm or October 5, 2015
Swachh Bharat Mission

——जगजीत शर्मा——-

स्वच्छ भारत अभियान को शुरू हुए एक वर्ष बीत चुके हैं। पिछले वर्ष 2 अक्टूबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अक्टूबर 2019 तक पूरे देश को खुले में शौच मुक्त और स्वच्छ बना देने का वायदा किया है। उनकी योजना है कि वर्ष 2019 को हम जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनाएं, तो पूरा देश स्वच्छ हो। खुले में शौच करने पर रोक लगाई जा चुकी हो। इसके लिए उन्होंने योजना का नाम भी बदल दिया, ताकि लोगों को यह बोध होता रहे कि हमें भारत को स्वच्छ बनाना है। स्वच्छ भारत अभियान का पहले नाम निर्मल भारत अभियान था। यह नाम भी वर्ष 2012 में दिया गया था, जो अपनी पूर्ववर्ती योजनाओं केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम (1986-1999) और संपूर्ण स्वच्छता अभियान (1999) का बदला हुआ रूप था। स्वच्छ भारत अभियान इन दिनों जिस रफ्तार से भारत को स्वच्छ कर रहा है, उससे अब इसकी सफलता पर संदेह व्यक्त होने लगा है। सरकार आंकड़ों की बाजीगरी दिखाकर भले ही चार वर्ष बाद 2 अक्टूबर 2019 को भारत को स्वच्छ घोषित कर दे, जैसा कि कुछ महीने पहले केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने देश के सभी स्कूलों में शौचालय निर्माण के लक्ष्य प्राप्त कर  लेने की सूचना देशवासियों को देते हुए केंद्र सरकार की पीठ थपथपाई थी।

केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर वर्ष 2019 तक पूरे देश में नौ करोड़ अस्सी लाख शौचालयों का निर्माण करना है। साल 2014 में यूनिसेफ के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 595 मिलियन से भी अधिक लोग खुले में शौच जाते हैं। अगर हम वर्ष 2012 के आंकड़ों की ही बात करें, तो देश के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग ग्यारह करोड़ घरों में शौचालय नहीं बने हैं। सरकार अब तक एक करोड़ दस लाख घरों में शौचालय निर्माण की सहायता उपलब्ध कराने में सक्षम हो पाई है। वहीं ग्रामीण विकास मंत्रालय के मुताबिक, मार्च 2011 तक 7 करोड़ 80 लाख शौचालय बनाए गए। लेकिन, मार्च 2011 की जनगणना के मुताबिक़ केवल सिर्फ 5 करोड़ 10 लाख घरों में ही शौचालय थे।

इसका साफ मतलब है कि अभी नौ करोड़ नब्बे लाख शौचालय का निर्माण करना बाकी है। इतना बड़ा लक्ष्य कैसे प्राप्त होगा, बस यही विचारणीय है। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार से पहले की सरकारों ने इस दिशा में कोई पहल ही नहीं किया। आजादी के बाद से लेकर आज तक केंद्र में सत्तारूढ़ हुई सरकारों ने बराबर इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे घरों में शौचालय का निर्माण करें, खुले में शौच और पेशाब न करें। जिन दिनों सोशल मीडिया, किस्म-किस्म के टीवी चैनल और दूर संचार के संसाधन इतने विकसित नहीं थे, तब भी केंद्र और राज्य सरकारें समाचार पत्रों, रेडियो, नाटक मंडलियों और मेले-ठेले में लाउडस्पीकर के सहारे बराबर लोगों की इस प्रवृत्ति के खिलाफ प्रचार किया करती थीं। हां, उनकी सफलता का प्रतिशत शायद उतना ज्यादा नहीं था, जितना आजकल प्रचार किया जा रहा है। केंद्र सरकारों ने पैसा भी बहुत खर्च किया, लेकिन लोगों की खुले में शौच करने की मानसिकता बदलते समय लगा। पूरी तरह आज भी मानसिकता नहीं बदली जा सकी है, लेकिन खुशी की बात यह है कि नई पीढ़ी की लड़कियां और लड़के इस दिशा में जागरूक हो रहे हैं। इस दिशा में राज्य सरकारें भी जागरूक होकर बढ़-चढ़कर काम कर रही हैं। 15 सालों तक स्वच्छता अभियान के लिए अलग रखे गए 25,885 करोड़ रुपये का करीब 88 फीसदी हिस्सा खर्च भी किया जा चुका है। वर्ष 2014-15 में स्वच्छता  अभियान के लिए आवंटित 3,569 करोड़ रुपये की तुलना में 123 फीसदी यानि 4,380 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। अभियान के तहत 2 लाख रुपये स्कूलों या पंचायतों को सामूहिक शौचालयों के निर्माण के लिए दिया जा रहा है। घरों में निजी शौचालय बनाने को कुल 12 हजार रुपये दिए जा रहे हैं जिसमें से 9 हजार रुपये केंद्र सरकार और बाकी रुपये राज्य सरकार खर्च कर रही है।

भारत स्वच्छ मिशन की सफलता पर संदेह का कारण है इसकी रफ्तार। जिस रफ्तार से अभी काम हो रहा है, उस रफ्तार पर यह लक्ष्य वर्ष 2032 तक भी नहीं हासिल किया जा सकेगा। देश में अभी नौ करोड़ नब्बे लाख  शौचालय बनाए जाने हैं। यदि चार साल में यह लक्ष्य पूरा करना हो, तो 46 शौचालय प्रति मिनट बनाने होंगे। वर्ष 2014-15 में सरकार ने जिस गति से काम किया, उसके मुताबिक 11 शौचालय प्रति मिनट बनाए गए। मॉनीटर डेलोइट-2014 की एक रिपोर्ट बताती है कि निर्मल भारत अभियान के तहत 2001 से अब तक 200 अरब रुपये आवंटित किए गए, पर वास्तव में सिर्फ 115 अरब रुपये ही खर्च हो पाए हैं। दरअसल, स्वच्छ भारत मिशन की सफलता पर संदेह के पुख्ता कारण हैं। पहली बात तो यह है कि लक्ष्य बहुत बड़ा है। चार साल में इतने शौचालयों का निर्माण कर पाना, बहुत मुश्किल है। दूसरी बात यह है कि सरकार का सारा जोर आंकड़ों पर है, उसकी जमीनी हकीकत से नहीं। सरकार यह तो बताती है कि पिछले साल भर में इतने शौचालय बनवाए गए, लेकिन इनमें से हकीकत में उपयोग के लायक कितने थे, यह नहीं बताती है। नियंत्रक और महालेखाकार (सीएजी) ने अपने एक हालिया रिपोर्ट में कहा है कि निर्मल भारत अभियान के तहत छत्तीसगढ़ में बनाए गए टॉयलेट में से करीब 60 फीसदी बेकार पड़े हुए हैं। यही बात मोदी के स्वच्छ भारत अभियान को पलीता लगाने के लिए काफी है।

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