सूचना अधिकार कानून के दस साल :- चुनौतियां और अपेक्षाएं

7:13 pm or October 12, 2015
RTI

——-चन्द्रहास बेहार———

सूचना का अधिकार अधिनियम,२००५ लागू हुए १० वर्ष पूरे हो चुके हैं, एक दृष्टि से इस अधिनियम को क्रांतिकारी/ अद्भुत अधिनियम कहा जा सकता है क्योंकि इसमें नागरिक को लोक प्राधिकारियों के कार्य के बारे में जानने के व्यापक अधिकार दिए गए हैं तथा लोक प्राधिकारियों के क्रिया कलापों में पारदर्शिता के कई प्रावधान रखे गए हैं. अन्य कई अधिनियमों की तुलना में इसकी कई अन्य विशेषताएं भी हैं

सूचना का अधिकार अधिनियम एक नया और अलग प्रकार का अधिनियम है. भारत के संविधान में विधि बनाने के अधिकार विधायिका [केंद्र में संसद और राज्यों में विधान मंडल] को हैं. किन्तु व्यवहारिक रूप से, लोकतंत्र में कार्यपालिका ही जन हित में, कोई कानून बनाने का प्रस्ताव विधायिका के समक्ष [प्रस्तावित कानून के पूर्ण प्रारूप के साथ] मंत्री के माध्यम से रखती है. यथास्थिति संसद या विधान मंडल में इस प्रारूप विधि के पास हो जाने पर राष्ट्रपति/ राज्यपाल के हस्ताक्षर के पश्चात् वह कानून लागू होता है. कार्यपालिका के पूरे तंत्र द्वारा गहन विचार तथा विधायिका के सदनों में व्यापक चर्चा एवं परीक्षण के बावजूद किसी प्रवृत विधि के प्रावधानों की शब्दावली ऐसी रह जाती है कि कई प्रावधानों के बारे में कुछ अस्पष्टतायें या रिक्तिता [gaps] विद्यमान रहतें हैं.साथ ही किन्ही प्रावधानों के निर्वचन भी एक से अधिक ढंग से किये जाने की संभावनाएं भी रहती हैं. विधि  के प्रावधानों का पालन करने वालों को ऐसी स्थिति में अपने स्वविवेक का प्रयोग कर निर्णय लेना होता है. किन्तु जब ऐसे मुद्दे,उच्च न्यायालय या उच्चत्तम न्यायालय के किन्ही पकरणों में निर्धारित हो जाते हैं तो वही निर्धारण इन बिन्दुओं के लिए कानून/ विधि का बल रखता है. ऐसा विधि शास्त्र के इस सर्व मान्य सिद्धांत के आधार पर है कि “न्यायिक पूर्व निर्णय भी (कुछ स्थिति में) विधि के स्रोत हैं” [“Judicial precedence is one of the sources of Law”]. विधि के प्रावधानों का क्रियान्वयन करने वाले अधिकारी तथा विवाद उत्पन्न होने पर उसका निराकरण करने वाली न्यायालय, उच्च/ उच्चत्तम न्यायालयों के इन न्याय दृष्टान्तों के अनुसार ही कार्यवाही करते हैं.

पुराने अधिनियमों के सम्बन्ध में कई न्याय दृष्टांत प्रतिपादित हो चुके हैं इसलिए उन अधिनियमों की अस्पष्टतायें या रिक्तिताएं [gaps] के बारे में सिद्धांत काफी हद तक स्पस्ट प्रतिपादित हो चुकें हैं. किन्तु सूचना का अधिकार अधिनियम एक तो नया है दूसरा अन्य अधिनियमों से बिलकुल अलग है, इसलिए इसके कई प्रावधानों के सम्बन्ध में न्याय दृष्टांत अब धीरे धीरे आना प्रारंभ हुए हैं. जो भी न्याय दृष्टांत बने हैं उनके सम्बन्ध में भी एक दूसरी प्रकार की कठिनाई आ रही है. इस अधिनियम के अंतर्गत देश भर में  पदनामित हजारों जन/ लोक सूचना अधिकारी एवं अपीलीय अधिकारी अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी हैं जिन्हें अर्ध न्यायिक प्रक्रियाओं का पालन करना होता है. केन्द्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोगों के सूचना आयुक्तों को भी अर्ध न्यायिक तरीके से द्वितीय अपील एवं शिकायतों का निपटारा करना होता है. इन सभी में से कई अधिकारी ऐसे हैं जिन्हें न्यायिक पृष्ठभूमि नहीं होने के कारण, न्याय दृष्टान्तों को समझने या सही ढंग से उनका निर्वचन करने में कठिनाई आ रही है जिसके कारण उनसे त्रुटियाँ होना सम्भावित है. शासन तंत्र के लोगों की मानसिकता, स्वाभाविकत:, हजारों वर्षों से ऐसी रही है कि वे पारदर्शिता के पक्षधर नहीं रहे हैं. इसलिए कई प्रकरणों में अनजाने या अपनी इस मानसिकता के कारण अवचेतन रूप से न्याय दृष्टान्तों का ऐसा निर्वचन कर रहे हैं जिससे आवेदक को सूचना न देना पड़े.

विधि शास्त्र में, पूर्व निर्णय [Precedence] के सम्बन्ध में व्यापक व्याख्या है. पूर्व न्याय/ न्याय दृष्टांत को उसके सही परिप्रेक्ष्य में देखना होता है. पूर्व निर्णय प्राधिकारिक [authoritative] अर्थात उसके सिद्धांत अनिवार्य रूप से मान्य योग्य अथवा अनुनयी [persuasive] अर्थात प्रतिपादित सिद्धांत सुझावात्मक/ सलाहात्मक होते हैं. अत:पूर्व निर्णय को उसके उपरोक्त उल्लेखित दो भागों में श्पष्ट रूप से समझने की आवश्यकता होती है. एक भाग निर्णय का, निर्णय सार [ Ratio] होता है जबकि उस निर्णय का कुछ भाग इतरोक्ति [obiter dicta] हो सकती है. न्याय शास्त्र के अनुसार निर्णय सार [ratio] तो पूर्व न्याय/ न्याय दृष्टांत के रूप में बंधनकारी होते हैं किन्तु निर्णय के वे भाग जो न्यायालय अपने तर्क के प्रवाह में किसी ऐसे सिद्धांत का प्रतिपादन करें जिसे वे किसी निर्णय-विशेष का आधार न मानते हों अर्थात जो आनुषांगिक रूप में कही गई हों; इतरोक्ति [obiter dicta] कहलाती है और निर्णय के ऐसे भाग पूर्व न्याय के सिद्धांत के रूप में बन्धकारी नहीं होते हैं वरन केवल अनुनायात्मक [persuasive] होते हैं.

इसके अतिरिक्त पूर्व निर्णय को न्याय दृष्टांत के रूप में बंधनकारी मानने के लिए, जिस प्रकरण विशेष में निर्णय दिए गए उसके तथ्य एवं परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाना होता है कि क्या हमारे समक्ष विचाराधीन प्रकरण के तथ्य एवं परिस्थितियां वैसी ही हैं जैसे की पूर्व निर्णय में थी.

उच्च न्यायालयों/ उच्चत्तम न्यायालयों के निर्णयों को पूर्व न्याय/ न्याय दृष्टांत के रूप में मान्य करने की उपरोक्त क्लिष्टता के मद्देनजर सूचना का अधिकार से सम्बन्धित अधिकारियों द्वारा गलत निर्वचन के कुछ उदाहरण सामने आ रहे हैं.

एक उदाहरण उच्चत्तम न्यायालय के पूर्व निर्णय/ न्याय दृष्टांत आर के जैन बनाम  भारत संघ से सम्बन्धित है. इस प्रकरण में उच्च न्यायालय दिल्ली के न्याय दृष्टांत अरविन्द केजरीवाल विरुद्ध केन्द्रीय सूचना आयोग तथा केरल उच्च न्यायालय के न्याय दृष्टांत “सेंटर फार अर्थ साइंसेस स्टडीस विरुद्ध अनसन सेबास्तियन” और उच्चत्तम न्यायालय के न्याय दृष्टांत “गिरीश राम चन्द्र देशपांडे विरुद्ध केन्द्रीय सूचना आयोग” के निर्णयों का उल्लेख करते हुए निम्नलिखित बिंदु प्रतिपादित हुए हैं –

  • लोक प्राधिकारी के किसी कर्मचारी से सम्बन्धित सूचनाएं जैसे उसके वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन और उससे सम्बंधित नस्तियां/ टिप्पणियाँ; पदोन्नति से सम्बन्धित नस्तियां; उसके चल अचल सम्पन्तियों, उसके द्वारा बैंक से लिए गये कर्ज, उसके द्वारा प्राप्त उपहार/ भेंट [gifts], उसके विरुद्ध की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही के अभिलेख आदि सेवा सम्बन्धी विषय व्यक्तिगत जानकारी हैं तथा धारा (२) में परिभाषित “पर व्यक्ति” से सम्बंधित सूचनाएं/ जानकारी हैं.
  • व्यक्तिगत जानकारी होने से इनके सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने का आवेदन प्राप्त होने पर धारा 8 (१) (J)/ (न्य) आकर्षित होता है अर्थात जानकारी यदि लोक क्रियाकलाप या लोक हित से सम्बंधित न हो अथवा सम्बंधित कर्मचारी के एकान्तता पर अनावश्यक अतिक्रमण हो तो ऐसी सूचना सामान्यत: नहीं दी जायेगी, ऐसी सूचना/ जानकारी तभी दी जा सकेगी यदि इनका प्रकटन व्यापक लोक हित में हो.
  • ऊपर उल्लेखित सूचनाएं यदि गोपनीयता रखने की दृष्टि से हों तो धारा 11 आकर्षित होता है जिसके अंतर्गत सम्बन्धित कर्मचारी जो “अन्य व्यक्ति” की परिभाषा में आता है, को अपना पक्ष रखने के लिए अवसर देने के पश्चात ही सूचना/ जानकारी दिये जाने या न दिए जाने का निर्णय लिया जा सकता है.

संक्षेप में कहा जाय तो इस निर्णय में यही सिद्धांत प्रतिपादित हुआ है कि किसी कर्मचारी की पदोन्नति, अनुशासनात्मक कार्यवाही, सम्पन्ति विवरण आदि से सम्बंधित सूचनाएं व्यक्तिगत सूचनाएं है अत: धारा 8 (१) (न्य) आकर्षित होता है तथा इनके लिए धारा 11 की स्थिति हो तो सम्बंधित कर्मचारी को अभ्यावेदन  का अवसर देने के पश्चात ही, यदि सूचना दिया जाना व्यापक हित में पाया जाए तभी, सूचना/ जानकारी दी जानी होगी. इसमें यह निष्कर्ष नहीं है कि इस प्रकार की सूचनाएं नहीं दी जायेंगी. किन्तु कई अवसरों पर मैंने पाया है कि अधिकांश जनसूचना अधिकारी [एवं प्रशिक्षण देने वाले कुछ प्रशिक्षक] इस न्याय दृष्टांत का ऐसा निर्वचन करते हैं कि इस न्याय दृष्टांत में इन प्रकार की सूचनाएं नहीं देने का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ है.

सुचना का अधिकार अधिनियम के ग्यारहवें वर्ष में प्रवेश के इस अवसर पर यही अपेक्षा की जानी चाहिए कि इस अधिनियम के क्रियान्यवन में संलग्न सभी स्तर के अधिकारी न्याय दृष्टांतों को उनके सही परिप्रेक्ष्य में ही समझकर कार्यवाही/ विनिश्चय करें. प्रशिक्षकों से भी यही अपेक्षा है कि किसी न्याय दृष्टांत का उल्लेख करते समय उसके निर्णय सार [ratio] का ध्यान रखकर उसके अनुरूप ही निर्वचन कर अपनी बात रखें.

लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के सेवानिवृत्त अधिकारी  हैं

Tagged with:     , ,

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in