भारत की कुटनीतिक विफलता

4:47 pm or October 19, 2015
K P Oli

——-अरविंद जयतिलक——–

नेपाल में नए संविधान लागू होने से नाराज मधेशी आंदोलन के दरम्यान दो बातें ऐसी घटित हुई हैं जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। एक, नेपाल यह जानते हुए भी कि सीमा पर व्यापार गतिरोध के लिए भारत नहीं बल्कि उसके मधेशी नागरिक जिम्मेदार हैं, के बावजूद उसने भारत पर आरोप मढ़ा कि उसने ही नाकेबंदी की है। दूसरा, यह कि उसने इस मामले को न सिर्फ संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाया बल्कि भारत को असहज करने के लिए धमकी भी दी कि अगर वह हमें पीछे ढकेलना जारी रखा तो उसे मजबूरन चीन की ओर हाथ बढ़ाना पड़ेगा। नेपाल से ऐसी उम्मीद नहीं थी। इसलिए कि वह न सिर्फ भारत का पड़ोसी देश है बल्कि सदियों से सांस्कृतिक डोर से भी बंधा हुआ है। बावजूद इसके उसने भारत के प्रति जिस तरह तल्खी जाहिर की है तो उसके ढेर सारे मायने हैं। नेपाल की यह तल्खी उसकी अपनी नहीं है। यह तल्खी चीन द्वारा उसके मुंह में डाली गयी है। चीन की मंशा नेपाल और भारत के संबंधों में दराद डालकर अपनी खतरनाक मंशा को अंजाम देने की है। यह किसी से छिपा नहीं है कि एक अरसे से चीन नेपाल को भारत से दूर करने की कोशिश में लगा है। इस हेतु वह नेपाल में अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है। इसके मुख्यतः दो कारण हैं। एक, वह नेपाल में अपने खिलाफ चलाए जा रहे निर्वासित जीवन बीता रहे तिब्बतियों के आंदोलन को कुचलना चाहता है और दूसरा दक्षिण एशिया में भारत के प्रभुत्व को कम करने के लिए उसके पड़ोसियों को अपने पाले में लाना चाहता है। संयोगवश उसे मौका मिल रहा है। या यों कहें कि यह मौका भारत दे रहा है तो यह गलत नहीं है। दो राय नहीं कि नेपाल को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में बाधा भारत ने नहीं बल्कि उसके ही नागरिक आंदोलनरत मधेशियों ने डाली। लेकिन अगर भारत सक्रियता दिखाया होता तो मधेशियों को यह अवसर नहीं मिलता और न ही नेपाल को चीन से प्रेम जाहिर करने का मौका मिलता। अब भारत को चाहिए कि वह नेपाल को विश्वास में ले। इसलिए और भी कि नेपाल में भारत के विरोधियों और चीन की पक्षधरता करने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है। नेपाल में कम्युनिस्टों एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो अपने यहां चीन की सक्रियता को पसंद कर रहा है। अब तो वह नेपाल के सामाजिक-सांस्कृतिक व राजनीतिक जनजीवन में भी चीन के हस्तक्षेप को जायज मानने लगा है। याद होगा गत वर्ष पहले सीपीएन माओवादी के अंतरराष्ट्रीय व्यूरो प्रमुख कृष्ण बहादूर माहरा और एक अज्ञात चीनी के बीच बातचीत का जारी टेप की खबर दुनिया के सामने आयी जिसमें माहरा द्वारा प्रचंड के नेतृत्व में नई सरकार के गठन के वास्ते 50 सांसदों की खरीद-फरोख्त के लिए 50 करोड़ रुपए की मांग की गयी। नेपाल की जनता इससे विचलित नहीं हुई। बल्कि चीन के इस कृत्य को जायज माना। अब भारत को चाहिए कि वह नेपाल को चीन के निकट जाने का मौका ही न दे। इसलिए कि संविधान लागू होने और सीपीएन-यूएमएल के नेता केपी शर्मा ओली के प्रधानमंत्री बनने से नेपाल की राजनीतिक परिस्थितियों में तेजी से बदलाव होगा और चीन इसका फायदा उठाना चाहेगा। अगर कहीं नेपाल और चीन के बीच प्रगाढ़ता बढ़ी, जिसकी संभावना प्रबल है तो फिर दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति चीन के मुकाबले कमजोर होगी। चीन भारत की घेराबंदी के लिए पहले से ही पाकिस्तान को अपना मोहरा बना चुका है। श्रीलंका, भूटान और म्यांमार पर भी डोरे डाल रहा है। अगर कहीं वह नेपाल को भी साधने में सफल रहा तो भारत की मुश्किलें बढ़ सकती है। भारत को गौर करना होगा कि चीन नेपाल के निकट जाने के लिए विकास के नाम पर अरबों डाॅलर खर्च कर रहा है। उसने अपने सामरिक हित को ध्यान में रखते हुए व नेपाल में रेलवे लाईन बिछाने और बेहतरीन सड़कों के निर्माण का काम तेज कर दिया है ताकि जरुरत पड़ने पर भारत तक आराम से पहुंचा जा सके। इसके अलावा वह नेपाल के अन्य क्षेत्रों मसलन शिक्षा, बिजली में भी भरपूर धन खर्च कर रहा है। वह नेपाल के लोगों को प्रभावित करने के उद्देश्य से वहां पुस्तकालय, विज्ञान प्रयोगशाला के अतिरिक्त हजारों की संख्या में स्कूल खोल रहा है। महत्वपूर्ण बात यह कि चीन को माओवादियों का खुला समर्थन मिल रहा है। नेपाल में माओवादियों की एक विशाल आबादी वैचारिक रुप से स्वयं को चीन के निकट पाती है। चीन इस वस्तुस्थिति से सुपरिचित है। इसलिए वह उसका भरपूर फायदा उठा रहा है। साथ ही वह वैचारिक निकटता का हवाला देकर भारत विरोधी माओवादियों को भड़का रहा है। दूसरी ओर नेपाल के माओवादी नेता भी स्वयं को भारत विरोधी प्रचारित करने से बाज नहीं आ रहे। चीन की शह पर ही वे 1950 की भारत-नेपाल मैत्री संधि का विरोध कर रहे हैं। जबकि यह संधि भारत के लिए सामरिक लिहाज से अति महत्वपूर्ण है। चीन नेपाली माओवादियों को आर्थिक मदद और राजनीतिक समर्थन देकर भारत के साथ चली आ रही जल बंटवारे और सिंचाई से संबंधित व्यवस्था में भी खलल डाल रहा है। ध्यान देना होगा कि चीन से नेपाली माओवादियों को मिल रही आर्थिक मदद से भारतीय नक्सली ताकतवर हो रहे हैं। नक्सलियों के पास से चीन निर्मित थामसन बंदूकें बरामद होना इसका सबूत है। मौजूदा परिस्थितियों पर गौर करें तो चीन की विस्तारवादी नीति कम्युनिस्ट सोच वाले नेपाली माओवादियों को दिग्भ्रमित करने में कामयाब है। दूसरी ओर चीन नेपाल के नए संविधान में ज्यादा अधिकारों की मांग कर रहे मधेशी समुदाय पर भी डोरे डालना शुरु कर दिया है। उसने मधेशी समुदाय को भरोसा दिया है कि वह उनका दुश्मन नहीं बल्कि हितैषी है। वह चाहता है कि संविधान में उनका वाजिब हक मिले। दरअसल चीन मधेशी समुदाय के बीच अपनी छवि सुधारना चाहता है। वह नहीं चाहता है कि मधेशी समुदाय उसे एक खलनायक के रुप देखे। दरअसल मधेशी समुदाय इस निष्कर्ष पर है कि चीन उनके अधिकारों के विरुद्ध है और वह कम्युनिस्ट नेताओं के जरिए उनका विरोध करा रहा है। यही वजह है कि मधेशी चीन के झंडे को जला रहे हंै। इससे चीन परेशान है और अब वह मधेशियों के हितों की बात कर रहा है। अब भारत को चीन के बदलते रुख से सतर्क हो जाना चाहिए। अगर वह मधेशियों पर डोरे डालने में सफल हुआ तो भारत के हित में नहीं होगा। वह नेपाल की वहीं गत बना देगा जो आज तिब्बत की है। कुछ राजनीतिक विश्लेशकों द्वारा तर्क दिया जा रहा है कि नेपाली माओवादियों की खौफ से भारत को भय नहीं खाना चाहिए। उनका कहना है कि माओवादियों के बहुमत के बावजूद भी नेपाली संविधान विविधतापूर्ण है और ऐसे में वहां न तो माओवादियों की तानाशाही चलने वाली है और न ही चीन की दाल गलने वाली। लेकिन यह तर्क बेमानी है। सच तो यह है कि नेपाल में संविधान लागू होने और मधेशियों को उनका हक न मिलने से माओवादी मजबूत हुए हैं। ऐसे में स्वाभाविक रुप से नेपाल में चीन की सक्रियता बढ़ेगी और भारत विरोधी ताकतें मजबूत होंगी। अब समय आ गया है कि भारत अपनी परंपरागत नेपाल नीति में परिवर्तन लाए। यह पर्याप्त नहीं कि वह एक मधेशी समुदाय की सहानुभूति और समर्थन हासिल करने के लिए शेष नेपाली तबके का समर्थन खो दे। यह भारत के हित में नहीं होगा।

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