प्रधानमंत्री मोदी ने स्वास्थ्य के मोर्चे पर भारत को विफल कर दिया है : लैंसेट स्टडी

5:52 pm or October 26, 2015
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——बेतवा शर्मा——

चिकित्सा जगत की अग्रणीय पत्रिका “द लैंसेट” प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर अपनी एक रिपोर्ट के माध्यम से बड़ा हमला करने जा रही है। रिपोर्ट में मोदी के मई 2014 में सत्ता में आने के बाद से स्वास्थ्य को दरकिनार कर दिए जाने को लेकर उन्हें आड़े हाथों लिया गया है जबकि यह चेतावनी भी दी गयी है कि यदि देश मधुमेह और ह्रदय रोग जैसी गैर-संक्रामक बीमारियों से मुकाबले के लिए निवेश करने में असफल रहता है तो यह “विनाशकारी” होगा।

वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा लिखी गयी यह अध्ययन रिपोर्ट 11 दिसम्बर को प्रकाशित होगी जिसमे मोदी द्वारा यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज को लेकर किये गए अपने चुनावी वादे को पूरा नहीं करने के लिए भी उनकी आलोचना की जायेगी।

“द टाइम्स ऑफ इंडिया” के साथ साक्षात्कार में “द लैंसेट” के प्रधान संपादक  रिचर्ड होर्टन, ने कहा कि भारत के लिए “स्वास्थ्य एक राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है”,  लेकिन मोदी इसे गंभीरता से नहीं ले रहे है।

होर्टन ने कहा –“मुझे भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र में कोई नई नीतियां, कोई नया विचार, कोई महत्वपूर्ण सार्वजनिक प्रतिबद्धता और सबसे महत्वपूर्ण कोई वित्तीय प्रतिबद्धता दिखाई नहीं देती है,” ।

उन्होंने कहा –-“जब से मोदी सत्ता में आये है, स्वास्थ्य पूरी तरह से गायब है। भारत खतरे में है। यदि प्रधानमंत्री मोदी स्वास्थ्य से नहीं निपटते है, तो भारत की अर्थव्यवस्था जो बढ़ती जनसंख्या के साथ जुडी हुयी है, स्थाई नहीं होगी।

होर्टन ने कहा कि भारत की मुख्य समस्यायें सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में निवेश की कमी और एक अनियंत्रित निजी क्षेत्र में तीव्र वृद्धि है।

उन्होंने कहा –” अनियंत्रित निजी क्षेत्र -जिसमे कई मामलों में देखभाल की गुणवत्ता घटिया है और बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रही सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के बीच का असंतुलन भयावह है।”

यह देखते हुए कि भारत वर्तमान में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1% खर्च करता है, होर्टन ने मोदी से इस आंकड़े में वृद्धि करने, यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज का विस्तार करने, मातृ और शिशु मृत्युदर को कम करने और गैर-संक्रामक बीमारियों की महामारी को रोकने के लिए अपनी व्यक्तिगत नेतृत्व क्षमता का प्रयोग की अपील की है।

दो मार्ग

होर्टन ने कहा कि  भारत चौराहे पर खड़ा है, जहां या तो वह अपने नागरिकों के स्वास्थ्य में निवेश करने का निश्चय कर सकता है अथवा यह निश्चय कर सकता है कि समस्या इसी तरह भीतर ही भीतर फैलती रहे और दिखाई न दे।

लैंसेट प्रमुख ने कहा –“फिलहाल, भारत किनारे पर है और वह दो मार्गों पर जा सकता है” । “वह स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश और यहां के लोगों में निवेश करके भारत के लिए उन्नतिशील और फलता-फूलता भविष्य बनाने का मार्ग चुन सकता है जो वैश्विक मामलों में अपनी भूमिका निभा सके। या फिर वह वैसा ही कर सकता है जैसा इस समय कर रहा है और स्वास्थ्य की सतत उपेक्षा कर सकता है। यदि वह दूसरा रास्ता चुनता है तो वह देशभर में महामारियों का प्रकोप देखेगा जो भविष्य को अस्थाई करेगा और राष्ट्रीय सुरक्षा को समाप्त कर देगा।

उन्होंने कहा –“मुझे लगता है कि यह बहुत गंभीर बात है । फिलहाल मोदी ने यह तय नहीं किया है कि वे कौनसा मार्ग चुनेंगे।

यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के वादे पर, होर्टन ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को कहा कि मोदी ने अपना वादा पूरा नहीं किया है।

उन्होंने कहा –“प्रकाशित होने जा रही रिपोर्ट  में हम स्वास्थ्य हेतु वित्तीय सहायता और सेवा प्रदान करने के बारे में बात करेंगे। भारत में समस्या यह है कि स्वास्थ्य को राजनीतिकी एजेंडे के रूप में पूर्णतया त्याग दिया गया है। मोदी के आने से पहले स्वास्थ्य एक मुद्दा था, हालाकि वह इतना ऊँचा नहीं था जितना होना चाहिए था लेकिन वह निश्चय ही एजेंडे में था। जबसे मोदी सत्ता में आये है, स्वास्थ्य पूरी तरह से गायब हो गया है  और सरकार द्वारा स्वास्थ्य को केंद्रीय राजनीतिक उद्देश्य के रूप में नहीं रखना भारतीय जनसंख्या के लिए निराशापूर्ण अवस्था है ।

मां और बच्चे की देखभाल – राष्ट्रीय शर्म

मां और बच्चे की देखभाल में कुछ सुधार को स्वीकार करते हुए  होर्टन ने कहा कि भारत में अभी भी प्रतिवर्ष 6 लाख बच्चे 5 साल से कम उम्र में ही मर जाते है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है । यह “राष्ट्रीय शर्म” की बात है।”

उन्होंने कहा –“मातृ एवं शिशु देखभाल सभ्य समाज के सूचकांक हैं। एक सभ्य समाज को अपनी माताओं और बेटियों को मरने नहीं देना चाहिए। भारत दुनिया में अपनी बड़ी भूमिका निभाना चाहता है, संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में जाना चाहता है जो भारत के लिए बड़े जायज लक्ष्य है । लेकिन मैं नहीं मानता कि वह ऐसे में विश्व नेता होने का दावा कर सकता है जबकि उसके ही अनेक बच्चे और माताएं भयानक गरीबी से मर रहे हों।

 (हफिंगटन पोस्ट से साभार)

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