बदलते परिदृश्य में भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन

3:06 pm or October 27, 2015
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——-अरविंद जयतिलक——–

बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच नई दिल्ली में 26 से 29 अक्टुबर तक होने जा रहे तीसरे भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन पर दुनिया भर की निगाहें है। इस शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए पांच उप-क्षेत्रों में बंटे अफ्रीका के तकरीबन 40 से अधिक देशों ने भारत आने की पुष्टि कर दी है। गौर करें तो इस अर्थ में यह सम्मेलन अफ्रीका से बाहर अफ्रीकी देशों का सबसे बड़ा जमावड़ा होगा। माना जा रहा है कि यह सम्मेलन 2008 में नई दिल्ली और 2011 में इथियोपिया की राजधानी आदिस अबाबा शिखर सम्मेलन के मुकाबले अपेक्षाकृत अधिक परिणामदायक होगा। गौरतलब है कि 8-9 अप्रैल, 2008 को नई दिल्ली में आयोजित भारत-अफ्रीका मंच सम्मेलन आयोजित हुआ था जिसके तहत सहयोग के लिए अफ्रीका-भारत ढांचा मजबूत करने के लिए महत्वकांक्षी खाका तैयार हुआ था। उल्लेखनीय है कि भारत-अफ्रीका मंच सम्मेलन की इस संरचना का निर्माण भारत और अफ्रीका के बीच पहले से ही मौजूद ऐतिहासिक एवं प्राचीन संबंधों के ठोस आधार पर किया गया है तथा जो उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद तथा नस्लवाद के विरुद्ध लंबे संघर्ष के दौरान और मजबूत हुए थे, जिसमें भारत और अफ्रीका सहभागी हैं मौजूदा सम्मेलन को लेकर भारत और अफ्रीकी यूनियन दोनों बेहद उत्साहित हैं और उन्हें भरोसा है कि वे न सिर्फ आर्थिक व तकनीकी सहयोग क्षेत्र में नई इबारत गढेंगे बल्कि सभ्यागत रिश्तों को भी नई ऊंचाई देंगे।

भारत और अफ्रीका के रिश्ते सदियों पुराने हंै। आज की तारीख में भारतीय मूल के 2.7 मिलीयन लोग अफ्रीका में रह रहे हैं। भारत ने अफ्रीका की विउपनिवेशीकरण प्रक्रिया को गति दी है और साथ ही अफ्रीका के कई देशों के लोकतंत्र की बहाली में भी अपनी सारगर्भित भूमिका निभायी है। आज अफ्रीका के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी नए आयाम गढ़ रही है। आर्थिक और तकनीकी सहयोग की दृष्टि से भारत और अफ्रीका दोनों एकदूसरे के निकट और बेहद उपयोगी हैं। दोनों में उभरता हुआ मध्य वर्ग है और दोनों नए उत्पादों के साझा उपभोक्ता व प्रचारक भी हैं। गौर करें तो अफ्रीका प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से बेहद समृद्ध है। वह भारत की बढ़ती उर्जा आवश्यकताओं संबंधी समस्याओं के निदान में फलदायी साबित हो रहा है और साथ ही भारत को बड़ी मात्रा में तेल व गैस उपलब्ध करा रहा है। भारत विश्व में उर्जा का पांचवा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। तकरीबन 70 फीसद तेल आयात करता है। अफ्रीका भारत को तेल निर्यात कर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती दे सकता है। भारत फरवरी 2010 में 14 लाख टन अफ्रीकी कोयले का आयात कर अफ्रीकी देशों में कोयले का सबसे बड़ा खरीददार देश बन चुका है। चूंकि भारत पर्चेजिंग पाॅवर पार्टी के संदर्भ में विश्व की सर्वाधिक उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और इस शताब्दी के मध्य तक विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने को तैयार है, ऐसे में भारत और अफ्रीका का निकट आना दोनों के लिए फायदेमंद है। दो राय नहीं कि वृहत संरक्षित संसाधनों वाला अफ्रीका महाद्वीप आने वाले वर्षों में विश्व की अगली कतार में होगा। अफ्रीका में अपार प्राकृतिक संसाधन, तीव्र नगरीकरण से बढ़ता घरेलू बाजार एवं नए निर्यात अवसर विद्यमान है। महत्वपूर्ण बात यह कि भारत की प्रौद्योगिकी अफ्रीका की दशाओं के साथ बेहतर तालमेल खाती है। अफ्रीकी देश भारतीय आइटी ज्ञान का लाभ लेना चाहते हैं और भारत को चाहिए कि आगे बढ़कर इस अवसर का लाभ उठाए। अफ्रीका भारत के वस्तुओं और सेवाओं के लिए भी एक बड़ा गतिशील तथा निर्बाध बाजार है। गौर करें तो इस दशक में भारत एवं अफ्रीका के मध्य व्यापार में दस गुना वृद्धि हुई है। साझा व्यापार 70 अरब डाॅलर के पार पहुंच गया है।

एसोसिएटेड चैंबर्स आॅफ कामर्स एंड इंडस्ट्री आॅफ इंडिया यानी एसोचैम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि आगामी वर्षों में अफ्रीकी महाद्वीप का वाणिज्यिक महत्व बढ़ेगा तथा भातर का द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डाॅलर से अधिक होगा। मौजूदा समय में भारत वर्तमान में वैश्विक स्तर पर दक्षिण अफ्रीका का 10 वां सबसे बड़ा और पूर्वी एवं दक्षिण एशिया में सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार देश है। भारत बिना तराशे हीरे का विश्व का सबसे बड़ा आयातक देश है जिसमें से अधिकांश अफ्रीका से ही आयात किया जाता है। दूसरी ओर भारत कटे हुए एवं तैयार हीरे का निर्यातक है। भारत अपने भेषजों, प्रौद्यगिकी एवं औद्योगिक हार्डवेयर का निर्यात करना चाहता है और अफ्रीकी तांबा, कोबाल्ट, सोना, हीरा एव ंतेल आयात करने में रुचि दिखाता है। अच्छी बात है कि भारत अफ्रीका में व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की पहल तेज हुई है। घाना, टोगो, बेनिन, सूडान, इथियोपिया, केन्या, तंजानिया से रिश्तों में प्रगाढ़ता आयी है। भारत इन देशों से फुटवियर, बैट्रिज एवं संचयक, रेडियो टेलिग्राफिक, लौह एवं इस्पात, सूती कपड़ा, फीता, बेलबूटे, ट्रांसमीटर, टीवी रिसीवर, कलपुर्जे, प्लास्टिक के सामान संबंधी व्यापार करता है। भारत ने अपने बाजार में अफ्रीका के न्यूनतम विकसित देशों यानी एलडीसी की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए 2008 में ही शुल्क मुक्त टैरिफ वरीयता योजना को एकतरफा विस्तारित कर दिया। आज अफ्रीका के तरकीबन 34 देश इस योजना के अंतर्गत लाभ उठा रहे हैं। यह योजना उन्हें भारत को शुल्क मुक्त निर्यात करने की अनुमति प्रदान करती है और इससे उनके निर्यात में वृद्धि हो रही है। दूसरी ओर भारत सरकार अवसंरचना विकास, खनिज अंवेषण, आइटी शिक्षा एवं अन्य क्षेत्रों में अफ्रीकी देशों में उपलब्ध निवेश के अवसरों को लाभ उठाने के लिए व्यापार एवं उद्योग जगत का उत्साहवर्धन कर रही है। फार्मा, लौह एवं इस्पात, वहान संयोजन एवं कपड़ा क्षेत्र में संयुक्त उद्यम स्थापित किए गए हैं। सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से सरकार द्वारा भारत-अफ्रीकी राजधानियों में क्षेत्री काॅक्लेवों का गठन किया गया है। मौजूदा समय में उभरते बाजारों से बड़ी कंपनियों का अंतर्राष्ट्रीय विस्तार विज्ञान एवं टेक्नाॅलाजी में सहायक साबित हो रहा है। इसी के दृष्टिगत भारत ने 8 पूर्वी अफ्रीकी देशों के साथ टीम-9 यानी टेक्नो-इकाॅनामिक एप्रोच फॅार अफ्रीका-इंडिया मूवमेंट कार्यक्रम की शुरुआत की, जिसके अंतर्गत योजनाओं, बाजार एवं प्रभाव के क्षेत्र में सूचनाओं का आदान प्रदान संभव हुआ है।

दरअसल इस पहल के पीछे सोच यह रही है कि भारत अपने विकास एवं प्रौद्यगिकी संबंधी अनुभवों को बुरकीना फासो, चाड, कोट डी आइवर, इक्वेटोरियल गायना, घना, गायना बिसाऊ, माली, कांगों और सेनेगल के साथ बांटेगा जिसमें सरकारें निजी तथा सांस्थिक क्षेत्रों के बीच पारस्परिक क्रिया को सुलभ बनाने में सहयोग प्रदान करेगी। इस कार्यक्रम के अंतर्गत सूचना प्रौद्योगिकी, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं लघु और मध्यम स्तर के उद्योग, आधारभूत संरचना, उर्जा, टेक्सटाइल्स, परिवहन, कृषि, पर्यटन को शामिल किया गया है। भारत को अफ्रीकी देशों के प्रति विशेषकर उनके तेजी से बदलते राजनीतिक समीकरणों के मद्देनजर अधिक संवेदनशीलता का परिचय देना होगा। समझना होगा कि सभी अफ्रीकी देशों के साथ एक समान नीति नहीं अपनायी जा सकती। भारत को चाहिए कि वह अफ्रीकी देशों के साथ वरीयता व्यापार समझौता नीति अपनाए। जैसा कि नामिबिया में भारत ने साउथ वेस्ट अफ्रीकन पीपुल आर्गेनाइजेशन के साथ अपनी अलग पहचान बनायी है। अन्य देशों के साथ भी इसी तरह की रणनीति अपनानी होगी। भारत और अफ्रीका दोनोंएचआइवी-एड्स, जलजनित रोग मलेरिया और डेंगू सहित विभिन्न स्वास्थ्य चुनौतियों से जुझ रहे हैं। दोनों को इससे निपटने की कारगर रणनीति तैयार करने की जरुरत है। देखना दिलचस्प होगा कि नए परिदृश्य में भारत-अफ्रीका मंच सम्मेलन क्या उपलब्धियां अर्जित करता है।

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