भूकंप से निपटने की चुनौती

3:30 pm or October 30, 2015
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——-अरविंद जयतिलक———

पाकिस्तान व अफगानिस्तान समेत भारत के उत्तरी हिस्से में आए भीषण भूकंप में 250 से अधिक लोगों की मौत और अनगिनत लोगों का बुरी तरह घायल होना प्रमाणित करता है कि भूकंप से निपटने की चुनौती बरकरार है। भूकंप का केंद्र अफगानिस्तान के हिंदुकुश के पर्वत में था, इसलिए सर्वाधिक तबाही पाकिस्तान में हुई है। उसके खैबर पख्तुनवाह प्रांत और संघ प्रशासित क्षेत्र फाटा में सैकड़ों लोग मारे गए हंै और अनगिनत इमारतें जमींदोज हुई हैं। चूंकि भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 7.5 रही, इस नाते उसका असर भारत में भी महसूस किया गया। हालांकि जानमाल का नुकसान नहीं हुआ लेकिन भूकंप की वजस से अफरातफरी का माहौल बन गया। अभी भी लोगों के मन में भूकंप का खौफ पसरा ही है। अगर भूकंप का पूर्वानुमान लग गया होता तो पाकिसतान व अफगानिस्तान में इतने बड़े पैमाने पर लोगों की जान नहीं जाती। लेकिन विडंबना है कि वैज्ञानिकता के इस चरम युग में अभी तक भूकंप का पूर्वानुमान लगाने का भरोसेमंद उपरकण विकसित नहीं किया जा सका है। अभीऐसी कोई वैज्ञानिक तरकीब ईजाद नहीं हुई है जिससे भूकंप का सटीक पूर्वानुमान लगाया जा सके। अभी तक वैज्ञानिक सिर्फ भूकंपीय संवेदनशील इलाकों को चिंहित करने में ही सफल हुए हैं। हालांकि इस दिशा में वैज्ञानिक सक्रिय हैं और वे रुस और जापान में आए अनेक भूकंपों के पर्यवेक्षण से पूर्वानुमान के संकेत सामने लाने में सफल रहे हैं। हालांकि भूकंप की सूचना प्रकृति भी देती है। मसलन सांप, चींटी, दीमक तथा अन्य जंतु अपने बिलों से बाहर निकल आते हैं। मछलियां जल से बाहर निकलने लगती हैं। बतख पानी में जाने से बचते हैं और चिडि़यां तेजी से चहचहाने लगती हैं। कुत्ते रोने लगते हैं। यह प्रकृति द्वारा प्रदत्त पशुओं में संवेदन-शक्ति होती है, जिसे वे अभिव्यक्त करते हैं। लेकिन इन पर गौर नहीं किया जाता है। हालांकि यह संकेत पूरी तरह वैज्ञानिक और भरोसेमंद नहीं है। भूकंप कभी भी आ सकते हैं। भूकंप के लिए कुछ क्षेत्र बेहद संवेदनशील हैं। येे क्षेत्र पृथ्वी के वे दुर्बल भाग हैं, जहां वलन (फोल्डिंग) और भ्रंश (फाल्टिंग) जैसी हिलने की घटनाएं अधिक होती हैं। विश्व के भूकंप क्षेत्र मुख्यतः दो तरह के भागों में हैं एक-परिप्रशांत (सर्कम पैसिफिक) क्षेत्र जहां 90 फीसद भूकंप आते हैं और दूसरे-हिमालय और आल्पस क्षेत्र। भारत के भूकंप क्षेत्रों का देश के प्रमुख प्राकृतिक भागों से घनिष्ठ संबंध है। हिमालयी क्षेत्र भूसंतुलन की दृष्टि से एक अस्थिर क्षेत्र है। यह अभी भी अपने निर्माण की अवस्था में है। यही वजह है कि इस क्षेत्र में सबसे अधिक भूकंप आते हैं। भारत और यूरेशिया प्लेटों के बीच टकराव हिमालय क्षेत्रों में भूकंप का प्रमुख कारण है। ये प्लेटें 40 से 50 मिमी प्रति वर्ष की गति से चलायमान है। इस प्लेट की सीमा विस्तृत है। यह भारत में उत्तर में सिंधु-सांगपो सुतुर जोन से दक्षिण में हिमालय तक फैली है। यूरेशिया प्लेट के नीचे उत्तर की ओर स्थित भारत प्लेटों की वजह से पृथ्वी पर यह भूकंप के लिहाज से सबसे संवेदनशील क्षेत्र है। वैज्ञानिकों की मानें तो कश्मीर से नार्थ ईस्ट तक का इलाका भूकंप की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। इसमें हिमाचल, असम, अरुणाचल प्रदेश, कुमाऊं व गढ़वाल समेत पूरा हिमालयी क्षेत्र शामिल है। निश्चित रुप से उत्तरी मैदान क्षेत्र भयावह भूकंप के दायरे से बाहर है लेकिन पूरी तरह सुरक्षित भी नहीं हैं। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बारे में बताया गया है कि भूगर्भ की दृष्टि से यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील है। दरअसल इस मैदान की रचना जलोढ़ मिट्टी से हुई है और हिमालय के निर्माण के समय सम्पीडन के फलस्वरुप इस मैदान में कई दरारें बन गयी है। यही वजह है कि भूगर्भिक हलचलों से यह क्षेत्र शीध्र ही कंपित हो जाता है। गौरतलब है कि भारत में कई बार भूकंप से जनधन की भारी तबाही हो चुकी है। 11 दिसंबर 1967 में कोयना के भूकंप द्वारा सड़के तथा बाजार वीरान हो गए। हरे-भरे खेत ऊबर-खाबड़ भू-भागों में बदल गए। हजारों व्यक्तियों की मृत्यु हुई। अक्टुबर, 1991 में उत्तरकाशी और 1992 में उस्मानाबाद और लातूर के भूकंपों में हजारों व्यक्तियों की जानें गयी और अरबों रुपए की संपत्ति का नुकसान हुआ। उत्तरकाशी के भूकंप में लगभग पांच हजार लोग कालकवलित हुए। 26 जनवरी 2001 को गुजरात के भुज कस्बे में आए भूकंप से 30000 से अधिक लोगों की जानें गयी। बेहतर होगा कि वैज्ञानिक न सिर्फ भूकंप के पूर्वानुमान का भरोसेमंद उपकरण ही विकसित करें बल्कि आवश्यक यह भी है कि भवन-निर्माण में इस प्रकार की तकनीक का प्रयोग किया जाए जो भूकंप आपदा का सहन कर सके। इसलिए और भी कि भूकंप में सर्वाधिक नुकसान भवनों इत्यादि के गिरने से होता है। दुनिया के सर्वाधिक भूकंप जापान में आते हैं। इसलिए उसने अपनी ऐसी आवास-व्यवस्था विकसित कर ली है जो भूकंप के अधिकतर झटकों को सहन कर लेती है। इसके अलावा जनसाधारण को इस आपदा के समय किए जाने वाले कार्य व व्यवहार के बारे में भी प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। वैसे तो प्रकृति के कहर से बचने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तरीका उसके साथ सामंजस्य है। पर विडंबना है कि विकास की अंधी दौड़ में मानव प्रकृति के विनाश पर आमादा है। यह तथ्य है कि अंधाधुंध विकास के नाम पर मनुष्य प्रति वर्ष 7 करोड़ हेक्टेयर वनों का विनाश कर रहा है। पिछले सैकड़ों सालों में उसके हाथों प्रकृति की एक तिहाई से अधिक प्रजातियां नष्ट हुई हैं। जंगली जीवों की संख्या में 50 फीसद कमी आयी है। जैव विविधता पर संकट है। वनों के विनाश से प्रतिवर्ष 2 अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआक्साइड वायुमण्डल में घुल-मिल रहा है। बिजली उत्पादन के लिए नदियों के सतत प्रवाह को रोककर बांध बनाए जाने से खतरनाक पारिस्थितिकीय संकट खड़ा हो गया है। जल का दोहन स्रोत सालाना रिचार्ज से कई गुना बढ़ गया है। पेयजल और कृषि जल का संकट गहराने लगा है। भारत की गंगा और यमुना जैसी अनगिनत नदियां सूखने के कगार पर हैं। वे प्रदुषण से कराह रही हैं। सीवर का गंदा पानी और औद्योगिक कचरा बहाने के कारण क्रोमियम और मरकरी जैसे घातक रसायनों से उनका पानी जहर बनता जा रहा है। जल संरक्षण और प्रदुषण पर ध्यान नहीं दिया गया तो 200 सालों में भूजल स्रोत सूख जाएगा। लेकिन विडंबना है कि भोग में फंसा मानव इन सबसे बेफिक्र है। नतीजतन उसे मौसमी परिवर्तनों मसलन ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण, ग्रीन हाउस प्रभाव, भूकंप, भारी वर्षा, बाढ़ और सूखा जैसी अनेक विपदाओं से जुझना पड़ रहा है। 1972 में स्टाकहोम सम्मेलन, 1992 में जेनेरियो, 2002 में जोंहासबर्ग, 2006 में मांट्रियाल और 2007 में बैंकाॅक सम्मेलन के जरिए जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंता जतायी गयी। पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कानून बनाए गए। लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ। मनुष्य आज भी अपने दुराग्रहों के साथ है। प्रकृति से खिलवाड़ का उसका तरीका और जघन्य हो गया है। लिहाजा प्रकृति भी प्रतिक्रियावादी हो गयी है। उसकी रौद्रता के आगे बचाव के वैज्ञानिक साधन बौने हो गए हैं। अमेरिका, जापान, चीन और कोरिया जिनकी वैज्ञानिकता और तकनीकी क्षमता का दुनिया लोहा मानती है, वे भी प्रकृति की कहर के आगे घुटने के बल हैं। अलास्का, चिली और कैरीबियाइ द्वीप के आइलैंड हैती में आए भीषण भूकंप की बात हो या जापान में सुनामी के कहर की, बचाव के वैज्ञानिक उपकरण धरे के धरे रह गए। समझना होगा प्रकृति सार्वकालिक है। मनुष्य अपनी वैज्ञानिकता के चरम बिंदू पर क्यों न पहुंच जाए प्रकृति की एक छोटी-सी खिलवाड़ सभ्यता का सर्वनाश करने में सक्षम है। लेकिन विडंबना है कि मनुष्य प्रकृति की भाषा और व्याकरण को समझने को तैयार नहीं है। वह अपनी समस्त उर्जा प्रकृति को गुलाम बनाने में झोंक रहा है। 21 वीं सदी का मानव अपनी सभ्यताओं और संस्कृतियों से कुछ सीखने को तैयार नहीं। उसका चरम लक्ष्य प्रकृति की चेतना को चुनौती देकर अपनी श्रेष्ठता साबित करना है। मानव को समझना होगा कि यह समष्टि विरोधी आचरण है और प्रकृति पर प्रभुत्व की लालसा की एक क्रुर हठधर्मिता भी। इसके अलावा भविष्य में आने वाले विपत्ति का संकेत भी। यह भयावह भूकंप प्रकृति की एक छोटी-सी प्रतिक्रिया है और इससे सबक लेने की जरुरत है।

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