अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष के सर्वेक्षण के निहितार्थ

1:27 pm or July 21, 2014
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सुनील अमर-

न्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष के एक ताजा सर्वेक्षण के अनुसार भारत में ईंधन पर दी जाने वाली सरकारी सहायता का अधिकांश हिस्सा अमीर लोग ले रहे हैं। रिपोर्ट कहती है कि ऐसी योजनाओं का लक्ष्य ठीक से न रखे जाने के कारण हालत यह है कि देश के 10 प्रतिशत सबसे अमीर परिवारों को देश के 10 प्रतिशत सबसे गरीब परिवारों के मुकाबले 07 गुना अधिक फायदा मिल रहा है! अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष की यह रपट हालाँकि सिर्फ ईंधन पर दिए जाने वाले अनुदान से सम्बन्धित है लेकिन सच्चाई यही है कि देश में चल रही सभी अनुदानित योजनाओं का ऐसा या इससे भी बुरा हाल है। यह रहस्योद्धाटन मुद्राकोष ने भले ही अब किया हो लेकिन देश में दशकों से इस बाबत आवाजें उठती रही हैं कि अनुदान का लाभ प्राय: ही बिचौलिए और असरदार लोग ले रहे हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली तो भ्रष्टाचार के ऐसे आरोपों का पर्याय ही बन चुकी है। यहाँ सवाल यह है कि इतनी जगजाहिर सी बात मुद्राकोष के सामान्य ज्ञानकोष में इतनी देर से कैसे आई! यहाँ समय का भी ध्यान रखने की जरुरत है कि मुद्राकोष ने अपनी इस रपट को भारत के वार्षिक बजट पेश किए जाने के ऐन पहले ही क्यों जारी किया है।

भारत जैसे विशाल और विकासशील देश में गरीब जनता को विभिन्न सरकारी योजनाओं की मार्फत अनुदान दिया जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और दुनिया की सभी लोकप्रिय सरकारें ऐसा करती हैं। इस तरह का अनुदान अगर वांछित व्यक्तियों तक न पहुॅच कर कहीं और जा रहा है तो इसमें दोश सरकार की शासन प्रणाली का है, गरीबों का नहीं। भाजपा सरकार के केन्द्र में आकार लेने से पहले से ही ऐसा बातें चर्चा में आने लगी थीं कि यह सरकार गरीबों से सम्बन्धित सब्सिडी योजनाओं पर प्रहार कर सकती है। गत सप्ताह संसद में पेश किए गए वार्षिक बजट में केन्द्रीय वित्त मंत्री ने इस बात पर खासा जोर दिया कि राजकोषीय घाटा बहुत ज्यादा बढ़ता जा रहा है और इसे काबू में करने के उपाय करने होंगे। वित्तमंत्री की इस सोच में संभव है कि मुद्राकोष की हिदायत काम कर रही हो। हालाँकि देश के बहुत से अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत जैसी अर्थव्यवस्था वाले विकासशील देषों में इस तरह का राजकोषीय घाटा होना सामान्य बात है लेकिन भारतीय वित्त मंत्री के दृष्टिकोण से लगता है कि उन्हें इस घाटे की पूर्ति के लिए अनुदान में कटौती ही एकमात्र रास्ता दिख रहा है। सवाल यह है कि क्या अनुदान में कटौती करने से योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्तियों को ज्यादा ठीक से मिलने लगेगा या सरकार की मंशा कुछ और है?

अर्थशास्त्र के जानकार इस प्रश्न का जवाब इस तरह देते हैं कि देश में राजकोषीय घाटा अगर कम होता है तो इसका लाभ दुनिया के उन कारपोरेट समूहों को होगा जो भारत में पूँजी लगाऐंगें क्योंकि इस तरह से पूँजी लगाने वालों को सरकार से तमाम तरह की आर्थिक रियायतें और सहूलियतें मिलती हैं। इसका सहज मतलब यह हुआ कि सरकार गरीबों का पेट और ज्यादा काटकर उद्योगपतियों की तिजोरी भरने के लिए धन की व्यवस्था करने की जुगत में हैं। शपथ ग्रहण के समय से ही इस सरकार ने मॅहगाई बढ़ाने और गरीबों की खाल उतारने के जैसे रंग दिखाए हैं उससे तो संभावना इसी बात की बनती है कि खाद, खाद्य और ईंधन जैसी भारी-भरकम सब्सिडी वाली योजनाओं के धन में कटौती होनी तय है। सरकारी ऑंकड़ों के मुताबिक खाद यानी रासायनिक उर्वरक, खाद्य पदार्थों तथा ईधन पर अभी करीब 3 लाख करोड़ रुपये का अनुदान दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि मोदी सरकार इसमें 20 प्रतिशत से अधिक की कटौती कर सकती है। इसी प्रकार रसोई गैस पर करीब 45000 करोड़ रुपए का अनुदान है जिसे यह सरकार धीरे-धीरे करके खत्म करना चाहती है। खाद्य बिल और मनरेगा आदि कल्याणकारी योजनाओं पर भी खर्च करीब ढ़ाई लाख करोड़ रुपए बैठता है। सरकार की मंशा इन सबमें कटौती करने की लगती है ताकि इस धन से ‘अन्य’ कार्य किए जा सकें।

देश में गरीबों की स्थिति पर बीते एक दशक में आधा दर्जन के करीब विशेषज्ञ सर्वेक्षण आ चुके हैं और हर तरह की कसरत के बावजूद यह तथ्य अपनी जगह स्थापित ही है कि देश की तीन चौथाई आबादी बेहद गरीब है और इसे सरकारी सहायता की हर हाल में जरुरत है। संप्रग प्रथम द्वारा नियुक्त किए गए प्रख्यात अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्ता की जो रपट वर्ष 2006 में आई थी और जिसके अनुसार देश की 84 करोड़ 60 लाख आबादी की औसत दैनिक आमदनी रु.09 से रु. 19 के बीच में थी, उसे आज तक कोई भी विशेषज्ञ झुठला नहीं पाया है। गरीबी के मानक बदलने के प्रयास बार-बार जरुर किए जाते रहे लेकिन गरीबों की यथास्थिति बनी हुई है। ऐसे में मोदी सरकार अगर सहायता योजनाओं में कटौती करती है तो इसका मतलब यह नहीं कि योजना का लाभ ले रहे अपात्रों को हटाकर कम धनराशि में ही गरीबों की पूरी मदद की जाएगी बल्कि ज्यादा संभावना इस बात की है कि अपात्र अपनी पहुॅच के चलते योजना का लाभ हमेशा की तरह लेते रहेंगें लेकिन गरीबों की भारी संख्या इस तरह के लाभ से वंचित हो जाएगी। एक सुझाव संप्रग सरकार के समय से ही दिया जा रहा है कि गरीबों की सहायता वाली योजनाओं जैसे खाद्यान्न, मिट्टी का तेल, रासायनिक उर्वरक आदि में जो छूट दी जा रही है वह वस्तुओं के रुप में न देकर उन्हे नकदी के रुप में दी जाय। मसलन सार्वजनिक वितरण प्रणाली को बंद करके लाभार्थी के बैंक खाते में सरकार अनुदान की राशि जमा कर दे और लाभार्थी उसका इस्तेमाल करके बाजार से खाद्यान्न खरीदे। ऐसा ही रासायनिक उर्वरकों के बारे में कहा जा रहा है लेकिन आर्थिक विशेषज्ञ और समाजशास्त्रियों का मानना है कि इस तरह से प्राप्त धन का परिवार का मुखिया दुरुपयोग करेगा और परिवार खाद्यान्न से वंचित हो जाएगा। रासायनिक उर्वरकों के मामले में तो ऐसा किया जा सकता है लेकिन खाद्यान्न के मामले में यह कदम ठीक नहीं होगा। बाजार के भरोसे छोड़ देने पर गरीब परिवारों में कुपोषण्ा की स्थिति और भयावह हो सकती है। अवाश्यकता तो इस बात की है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली को चुस्त-दुरुस्त करके इसमें अनुचित लाभ ले रहे लोगों को छॉट कर बाहर किया जाए। ऐसा यदि हो जाय तो वित्त मंत्री जी निश्चित ही कम पैसों में ऐसी योजनाओं का चला सकते हैं लेकिन मौजूदा हालत में अगर कटौती की जाती है तो इसके शिकार सिर्फ गरीब और बेसहारा लोग ही होंगें। अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष किन देषों के इशारे और धन से चलता है इसे सभी लोग जानते हैं। उसके सारे सुझाव और प्रयास अपने आकाओं के हित के लिए ही होते हैं और वह इससे पूर्व भी कई बार ऐसी कटौती करने के सुझाव दे चुका है तथा वह देश में कृषि पर दी जा रही सहायता को बंद कर देने के लिए दबाव बनाता रहा है। ऐसे में गरीबों के पोषण के लिए चल रही केन्द्रीयकृत योजनाओं में किसी भी कटौती का विरोध किया ही जाना चाहिए। केन्द्रीय वित्त मंत्री ने योजनाओं को ‘तार्किक’ ढॅग़ से लागू किए जाने पर खास बल दिया है! सभी लोग जानते हैं कि इस सम्बन्ध में उनका तर्क क्या हो सकता है। यह अकारण नहीं है कि रेल बजट से लेकर आम बजट तक का देश-विदेश के सभी बड़े उद्योगपति तालियाँ बजा-बजाकर स्वागत कर रहे हैं। वे गिध्दों की तरह ‘महाभोज’ की प्रतीक्षा में हैं और यह सरकार उन्हें इसका अवसर देने को प्रतिबध्द लगती है।

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