लक्ष्मी के कई रूप

4:36 pm or November 7, 2015
Lakshmi

——–पारूल भार्गव——–

धन-धान्य,सुख-समृद्धि और खुषहाली देने वाली देवी हैं,लक्ष्मी। पारंपरिक रूप में मुख्य तौर से लक्ष्मी को आठ रूपों में पूजा जाता है। सिद्धि की प्राप्ती कराने वाली इन अश्टलक्ष्मी स्वरूपों का हालांकि कोई मानक तो नहीं है,लेकिन मुख्य तौर से इन्हें निम्न नामों से जाना एवं पूजा जाता है। इसके अतिरिक्त और भी कुछ रूपों में लक्ष्मी को पूजा जाता है। लक्ष्मी के सभी रूपों के साथ मनुश्य की विभिंत्र इच्छाओं की पूर्ति के संदर्भ जुड़े हुए हैं और इसी आधार पर उनके नाम रखे गए हैं।

आदि लक्ष्मी– पौराणिक संर्दभों के अनुसार आदि लक्ष्मी जीवन देने वाली प्रथम जननी है। इन्हें आदि षक्ति के नाम से भी जाना जाता है। देव-दानव,मनुश्य सभी इन षक्तियों के आगे अज्ञानी हैं। ब्रह्म पुराण के अनुसार आदि लक्ष्मी से ही अंबिका विश्णु,लक्ष्मी,ब्रह्मा, सरस्वती और षिव की उत्पत्ति हुई। बाद में आदि लक्ष्मी ने सरस्वती को ब्रह्मा से लक्ष्मी को विश्णु से तथा अंबिका को षिव से वैवाहिक बंधन में बांधा। फिर ये दोनों दंपत्ति ब्रह्मण्ड को बनाने,रचने और स्थिर रखने का कार्य करने निकल पड़े। आदि षक्ति,तीन गुण, रज,तम और सत्व का अविर्भाव लिए होती है। इनमें से रज को महालक्ष्मी,तम को महाकाली एवं सत्व को महासरस्वती के रूप में अवतरित होने की बात कही गई है।

महालक्ष्मी– आदि लक्ष्मी से अलग महालक्ष्मी के स्वरूप को समझ पाना भक्तों के लिए सरल होता है। ये प्रकृति के सौम्य तथा उदार भाव की प्रतिनिधि होते हैं। लक्ष्मी पति विश्णु संसार का पालन करते हैं,जिसमें लक्ष्मी धन,बुद्धि तथा षक्ति द्वारा योगदान देती हैं। यहूदी एवं ईसाई परंपरा के अनुसार दुनिया बनाने वाले ईष्वर ‘येहवाह‘ के प्रज्ञा एवं वैभव का अमूर्त रूप सोफिया या सकीना नामक देवियां भी इस रूप से कफी समानता रखती हैं।

गज लक्ष्मी-कई चित्रों,मूर्तियों आदि में लक्ष्मी के स्वरूप पर जल वर्शा करते दो हाथी नर एवं मादा दिखाई देते हैं। ये हाथी ‘दिग्गज‘ के आठ जोड़ों में से एक होते हैं,जो कि ब्रह्मणड के आठ कोनों पर स्थित रहकर आकाष के आठ कोनों को संभाले हुए हैं। ये लक्ष्मी के कृपा पात्र हैं। गज अर्थात हाथी को षक्ति,श्री तथा राजश्री वैभव से युक्त प्राणी माना गया है। गज को वर्शा करने वाले मेघों तथा उर्वरता का भी प्रतीक माना जाता है। इस तरह से उर्वरता तथा समृद्धि की देवी लक्ष्मी के सहचर हैं। इनके साथ लक्ष्मी का स्वरूप गज लक्ष्मी के नाम से जाना जाता है।

धन लक्ष्मी– भविश्य को सुखी बनाने के लिए प्रत्येक मनुश्य संपदा तथा संपत्ति की कामना करता है। इसी कामना को पूरा करती हैं,धन लक्ष्मी। पौराणिक संदर्भों के अनुसार राजकुमारी पद्मावती जो लक्ष्मी का ही अवतार मानी जाती हैं से विवाह करने के लिए विश्णु को देवताओं के खंचाजी कुबेर से धन उधार लेना पड़ा। कुबेर ने षर्त रख दी कि जब तक विश्णु ब्याज सहित पूरा धन नहीं चुका देते,उन्हें धरती पर ही रहना होगा। इस षर्त से देवता परेषान हो गए,क्योंकि ब्याज काफी ज्यादा था। अतः उन्होंने धन लक्ष्मी से मदद मांगी। धन लक्ष्मी ने मदद की और उसी दिन से विश्णु को दरिद्र नरायण के नाम से भी जाना गया।

धान्य लक्ष्मी– अनाज की कमी को घर से दूर रखने वाली और रसोई घर को हमेषा भरा रखने वाली,जिसे षक्ति के रूप में पूजा जाता है उसे धान्य लक्ष्मी कहते है। द्रोपदी को हमेषा भोजन से भरा रहने वाला पात्र धान्य लक्ष्मी ने ही आर्षीवाद स्वरूप दिया था। धान्य लक्ष्मी हर वर्ग,वर्ण तथा स्तर के मनुश्य की क्षुधा पूर्ति करती हैं। वे उन लोगों से प्रसन्न रहती हैं,जो अन्न का सम्मान करते हैं और भोजन को आदर देकर ग्रहण करते हैं।

राज लक्ष्मी-राजयोग नसीब से मिलता है,ऐसा लोगों का मानना है। लगभग हर धर्म में राजसी वैभव प्रदान करने वाली एक देवी होती है। इस संदर्भ में हिंदू मान्यताओं के अनुसार राज लक्ष्मी को पूजा जाता है। राज लक्ष्मी किसी भी व्यक्ति को षक्ति,वैभव तथा समस्त राजसी सुखों का मालिक बनाती है।

गृह लक्ष्मी– गृह लक्ष्मी का निवास हर घर में होता है। ये मकान में प्रेम तथा जीवंतता का संचार कर उसे घर बनाती हैं। इनकी अनुपस्थिति में घर कलह,झगड़ों,निराषा आदि से भर जाता है। गृहस्वामिनी को इनका प्रतीक माना जाता है। इसीलिए बहू गृह प्रवेष के समय धान के कटोरे को पैर से स्पर्ष कर या कुमकुम से चरण चिन्ह बनाकर प्रवेष करती है। ऐसा करने को समृद्धियों के आने व बुराईयों के घर से विदा हो जाने का प्रतीक माना जाता है। जहां गृहस्वामिनी की कद्र न हो,गृह लक्ष्मी उस घर को त्याग देती है।

सौंदर्य लक्ष्मी-ब्रह्मा की पुत्री ‘रति‘ दिखने में बेहद साधारण थी। कोई भी पुरूश,देवता या दानव उसकी ओर आकर्शित नहीं होता था। अतः उसने सौंदर्य की लक्ष्मी से मदद की गुहार लगाई। सौंदर्य लक्ष्मी ने उसे वारदान स्वरूप सौलह श्रृंगार की जानकारी दी,जिन्हें धारण करते ही रति तीनों लोकों में सबसे सुंदर युवती बन गई तथा प्रेम के देवता ‘मन्मथ‘ का ह्दय जीतने में सफल हुई। इस प्रकार सौंदर्य लक्ष्मी सुंदरता का वरदान देने वाली है।

भाग्य लक्ष्मी-ऐसी मान्यता है कि बच्चे के जन्म के 6 दिन बाद भाग्य लक्ष्मी स्वयं आकर बच्चे के भाल पर उसका भाग्य लिखकर जाती है। इसी मान्यता के चलते भारत के कुछ क्षेत्रों में उस स्थान को जहां नवजात सोया होता है,सफाई कर,रंगोली से सजाकर रखा जाता है। साथ ही वहां स्लेट-चाॅक या काॅपी-पेन भी रखा जाता है,ताकि भाग्य लक्ष्मी बच्चे का भाग्य लिख सके। भाग्य लक्ष्मी मनुश्य की किस्मत बदल सकती हैं। वे राजा को रंक तथा रंक को राजा बना सकती हैं।

संतान लक्ष्मी-प्राणियों को उर्वरता तथा वंष वृद्धि का वरदान देती है,संतान लक्ष्मी। संतान लक्ष्मी स्त्री को सृजन का वरदान देती है तथा छोटे बच्चों की बिमारियों से रक्षा करती हैं। बंगाल में बिल्लियों अथवा मादा षेर को इनका प्रतीक माना जाता है,क्योंकि ये दोनों ही अपने बच्चों का पालन-पोशण अकेले के बल पर करती है।

वीर लक्ष्मी-जीवन की हर परिस्थिति या षत्रु का साहस से सामना करने का बल और तेज ये प्रदान करती हैं। इन्हें वैश्णोदेवी के नाम से भी पूजा जाता है। ये षेर की सवारी करती हैं तथा मां दुर्गा के समान अस्त्र-षास्त्रों से सुसज्जित रहती हैं।

गो लक्ष्मी-गाय को भारतीय समाज में मां का दर्जा दिया गया है,क्योंकि एक मां की तरह ही वह भी निस्वार्थ भाव से मनुश्य के पालन-पोशण के लिए ढेर सारी सुविधाएं जुटाती है। इसलिए इन्हें गो लक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है। पुराणों में कामधेनु का भी वर्णन है,जो प्राणीमात्र की समस्त इच्छाएं पूर्ण करती है।

विद्या लक्ष्मी-ज्ञान को धन में बदलने का वरदान देने वाली देवी है,विद्या लक्ष्मी। सरस्वती की ही तरह ये भी विद्या तथा कलाओं की देवी हैं। जहां सरस्वती षुद्ध वैचारिक ज्ञान देने वाली है,विद्या लक्ष्मी ज्ञान द्वारा भौतिक समृद्धि के रास्ते खोलती है।

आरोग्य लक्ष्मी-स्वास्थ्य जीवन का सबसे बड़ा वरदान है और स्वास्थ्य सहित संपन्न जीवन जीने की कामना से पूजा जाता है ‘आरोग्य लक्ष्मी‘ को। समुद्र मंथन में से विश्णु के अवतार तथा आयुर्वेद के जनक धन्वंतरि के साथ निकली आरोग्य लक्ष्मी जीवन को स्वास्थ्य तथा सुखी रहने का वरदान देती है।

कड़क लक्ष्मी- लक्ष्मी जी का यह रूप अधिकांषतः ग्रामीण क्षेत्रों में पूजा जाता है। जब भी समाज में कहीं किसी स्त्री के साथ दुव्र्यव्हार होता है,कड़क लक्ष्मी समाज को अपना कठोर स्वरूप दिखाती है एवं लोगों को व्याधियों तथा परेषानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में भक्त उनकी पूजा-पाठ कर तथा कठोर नियमों का पालन कर उनका को्रध षांत करते हैं। अपनी गलती के लिए माफी मांगकर उसे न दोहराने का संकल्प लेते हैं।

इस प्रकार लक्ष्मी के ये सारे स्वरूप जीव मात्र द्वारा सुख समृद्धि की कामना से पूजे जाते हैं। ये सभी स्वरूप नम्रता, धैर्य, मेहनत, बुद्धिमत्ता, सभ्यता, षांति आदि गुणों को अपने आचरण में उतारने की सीख देते हैं। वे बताते है कि छल-कपट,बुराई,बैर,द्वैश तथा अंहकार जैसी बुराईयों को पालने वाले मनुश्य के लिए उन्नति के सभी रास्ते बंद हो जाते हैं। लक्ष्मी भी ऐसे लोगों के पास नहीं आती। अतः लक्ष्मी का साम्पीय चाहिए तो उपरोक्त गुणों को आचरण में उतारिए।

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