भाजपा भांप चुकी थी हार

2:26 pm or November 9, 2015
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भाजपा की हार के मुख्य कारणों का विश्लेषण कर रहे हैं अतुल गौड़

बिहार  विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद से ही भाजपा अपनी हार का अंदेशा शायद लगा चुकी थी। क्योंकि महागठबंधन तैयार होकर बड़ी चुनौती पेश करने की स्थिति में आ गया था। यहां यह इसलिये कहा जा रहा है कि भाजपा अपनी हार का अंदेशा लगा चुकी थी क्योंकि अमित शाह जो कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। ये दोनों ही राजनीति की हर नब्ज को बारीकि से पकड़ने में महारथ हासिल रखते हैं और इन दोनों ही चेहरेां के पास अपनी इंडीबिजुअल टीम भी है। ऐसे में इस चुनाव में महज जान फूंककर माहौल बदल देने की कोशिशों के साथ यह अंजामे मैदान आ कंूदे थे और चुनावों से पहले बिहार को भारी भरकम पैकेज प्रधानमंत्री मोदी का इसी स्टेजिडी का हिस्सा कहा जा सकता है और इस पैकेज के बाद स्थिति भाजपा के नियंत्रण में कुछ आती भी दिखाई दी। लेकिन इसी दौरान आरएसएस के मोहन भागवत द्वारा दिया गया आरक्षण को लेकर बयान सब कुछ जैसे पानी में डाल गया सा होता प्रतीत हुआ। राजनैतिक रूप से गूढ़ व्यक्ति के तौर पर जाने पहचाने जाने वाले आरजेडी नेता लालू यादव ने इसे बिल्ली के भाग से टूटे हुये छींके के समान लिया और इस आरक्षण वाले आरएसएस के बयान को बिहार की जनता के बीच में खूब भुनाया और नतीजे जिस प्रकार सामने आये हैं। उन्होंने यह साफ कर दिया कि लालू यादव का यह प्रयोग पूरी तरह कामयाब रहा। लेकिन यहां सवाल यह भी खड़ा होता है कि आखिर यह प्रयोग सफल कैसे हो गया। आप देखेंगे कि आरक्षण इस देष में एक तरह से पानी में घुली हुई शक्कर के समान स्थिति में जा पहुंचा है जिसे अलग करना तो दूर उस आरक्षण को लेकर बयानबाजी भी इतनी घातक हो सकती है जितनी कि भाजपा के लिये इस चुनाव में हुई है। बिहार देष का वह हिस्सा है जहां पहले से लोग रोजगार से जूझ रहे और रोजगार की तलाष में दूसरी जगहों का रूख करने के लिये मजबूर हैं। ऐसे में संघ के मोहन भागवत का यह बयान जो आरक्षण से संबंधित था कितना नागवार बिहार की जनता को हो सकता है इसका अंदाजा चुनाव नतीजों में अब मोहन भागवत को बखूबी लग गया होगा। यहां तारीफ लालू यादव की सीधे तौर पर इसलिये बनती है क्योंकि उन्होंने एक कुषल राजनैतिज्ञ होने का परिचय देते हुये बहुत बढ़-चढकर या कहें कि राई का पहाड़ बनाकर इस बयान को जनता के बीच में रखने में ही नहीं बल्कि परबान चढ़ाने तक में कामयाबी हासिल की है। अगर साफ तौर पर यह कह दिया जाये कि आरएसएस के इस बयान का बिहार चुनाव पर भाजपा को लेकर भयंकर विपरीत असर पड़ा तो यह गलत नहीं होगा लेकिन कुछ हद तक यहां यह भी स्वीकार्य करना होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की युगल कैमिस्ट्री भी जिम्मेदार है तो यह भी गलत नहीं होगा। कुछ समय पीछे चलते हैं और दिल्ली के चुनाव की बात करते हैं। भाजपा को उसके द्वारा कराये गये सर्वे से यह साफ हुआ था कि मामला एक तरफा नहीं हैं और भाजपा को अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव किया जाना जरूरी है। यहां कहा जाये कि भाजपा दिल्ली के चुनावों के लिये तैयार ही नहीं थी तो गलत नहीं माना जा सकता और जो रणनीति किरन बेदी को लाकर भाजपा ने ऐन समय पर दिल्ली वालों के सामने लाकर माहौल को अपने पक्ष में करने की कोषिष की उसमें काफी देर हो चुकी थी। ठीक यही स्थिति बिहार चुनावों को लेकर भाजपा की बनी और चुनाव जब पहले और दूसरे दौर में था तो भाजपा विकास और केंद्र सरकार के साथ मोदी की छवि भुनाने की कोषिष में जुटी थी लेकिन दौर चलते गये और भाजपा को जब अपनी हार का डर ज्यादा सताया तो वह विकास को सर्वोपरि न मानकर स्थानीय, जाति और अन्य बिंदुओं पर खुद को केंद्रित करने मंे जुट गई लेकिन तब तक फिर देर हो चुकी थी और लालू यादव अपना पूरा काम कर चुके थे। इस चुनाव में आपने यह भी देखा होगा कि लालू यादव की राजनैतिक वापिसी हुई है और वह भी इतनी ताकतवर की आने वाले समय में वह नीतीष के लिये परेषानी का सबव बन सकते हैं। यह बड़ी वापिसी केवल और केवल उनके द्वारा खुद को सबसे बड़ा आरक्षण समर्थक साबित कर देने वाली छवि से हासिल हुआ है। चुनाव जब भी होते हैं तो एक दल जीतता है और कई दल हार जाते हैं लेकिन ओवर कॉन्फीडेंस और सपनों को देखकर उन्हें साकार कर देने वाली सोच के साथ ही केवल चुनाव नहीं जीते जा सकते। भाजपा को अब अगर राजनैतिक रूप से प्रदेष चुनावों में फिलहाल अच्छी परफार्मेंस देनी है तो चुनाव से कई महीनों पहले उस राज्य की बारीक से बारीक जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे और जरूरतों का अध्ययन कर खुद को चुनाव मैदान में उतारना होगा और केवल मोदी फैक्टर को कैष करने के अपने विचारों को तिलांजली देकर पार्टी नेतृत्व को सिरे से समीक्षा करनी पड़ेगी। बिहार के इन चुनावों ने सामान्य रूप से भाजपा विरोधी दलों को एक सूत्र दिया है। जिस मोदी सवाल का जवाब अब तक विपक्ष ढूंढने में नाकामयाब था उस भाजपा विपक्षी मोर्चों को सूत्र मिल गया है कि अगर भाजपा को राजनीति में सत्ता से दूर रखना है तो यह नीति यानि विरोधी सब मिल जायें कारगार साबित होगा और 2019 का लक्ष्य भाजपा के लिये अब आसान नहीं रह गया है। एक बात और वह यह कि देष को आगे ले जाना भाजपा की अपनी उपलब्धि हो सकती है लेकिन देष की जनता को अब तक केंद्र की सरकार से कुछ भी लोक लुभावन नहीं मिल पाने के कारण सिर्फ और सिर्फ विदेषों में मोदी की जय-जयकार और एक अच्छी बॉडी लेंग्वेज से कुछ भी नहीं होगा। भाजपा को जीत की पगडंडी पर वापस आना है तो जनता को भाजपा विरोधी दलों की नीति पर काम करना पड़ेगा। यानि साफ है कि भाजपा खेमे के बुद्धिजीवी अपनी जुबान पर लगाम रखें मामला साफ है कि भाजपा ने विकास को मुद्दा बनाकर चुनाव में आना चाहा लेकिन विपक्ष जाति को बजन देकर अपना कैंपियन करता रहा। देष बदलेगा राज्य बदलेंगे और शायद आने वाले कुछ चुनाव जाति आधारित नहीं होंगे लेकिन शायद अभी यह वक्त नहीं आया है। भाजपा की दूसरी सबसे बड़ी भूल यह है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व यह गलत फहमी पाल चुका है कि मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने मात्र से ही देष और राज्य के लोगों की सोच बदल चुकी है और वह अब नया रास्ता देखना चाहते हैं। ऐसा होगा यह अभी तो नहीं कहा जा सकता लेकिन ऐसा हो गया है यह मान लेना गंजे आदमी को कंघा खरीद लेने जैसा ही है और हां संघ को भी यह सोचना होगा कि कब-कहां-कैसी बात करना जरूरी है। अगर वास्तविक रूप से संघ भाजपा का हितैषी है तो।

(अतुल गौड़ लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार  व इलैक्ट्रोनिक एवं प्रिंट मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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