बिहार में संघ या भाजपा नहीं, नरेंद्र मोदी हारे

2:43 pm or November 9, 2015
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——–जगजीत शर्मा———

अगर यह पूछा जाए कि यह नरेंद्र मोदी की हार है? भाजपा की हार है? संघ की हार है? या फिर मोदी, भाजपा और संघ, इन तीनों की हार है? वैसे तो नरेंद्र मोदी और भाजपा को अलग-अलग करके देखना, उचित नहीं लगता है, लेकिन बिहार में जिस तरह चुनाव लड़ा गया, उससे नरेंद्र मोदी को भाजपा से अलग करना कतई गलत नहीं है? अगर हम मान लें कि नरेंद्र मोदी तो भाजपा के ही एक अंग हैं, उपांग हैं? तो फिर जब मई 2014 में पूर्ण बहुमत भाजपा को मिला था, तो उसका श्रेय भाजपा को न देकर नरेंद्र मोदी को दिया गया। तब कहा गया कि नरेंद्र मोदी के ही करिश्माई व्यक्तित्व के चलते ही भाजपा को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ। लोकसभा चुनाव के कुछ ही महीनों बाद जब दिल्ली विधान सभा चुनाव हुए थे, तो नरेंद्र मोदी को ही आगे करके भाजपा ने चुनाव लड़ा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही दिल्ली चुनाव के दौरान स्टार प्रचारक थे। जब मीडिया और उनके विरोधी आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने यह सवाल उठाना शुरू किया कि क्या दिल्ली चुनाव जीतने के बाद नरेंद्र मोदी दिल्ली के मुख्यमंत्री बनेंगे, तो मजबूरन भाजपा को ‘आपÓ की कभी विश्वसनीय सहयोगी रहीं किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना पड़ा था। भाजपा चुनाव हार गई। चुनाव हारने के पीछे सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी ही महत्वपूर्ण कारक थे। दरअसल, लोकसभा चुनाव के दौरान और उससे पूर्व अपनी नीतियों और चुनावी संसाधनों का उपयोग करके मोदी पूरे चुनावी परिदृश्य को ‘नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधीÓ बना ले जाने में सफल हो चुके थे। इसमें कतई दो राय नहीं है कि राहुल गांधी उस समय भी अपरिपक्व राजनीतिज्ञ नहीं बन पाए थे। आज भी उनमें राजनीतिक परिपक्वता इतनी नहीं है जितनी कि उनसे उम्मीद की जाती है। लोकसभा चुनाव का पूरा फोकस विकास या दूसरे मुद्दों से हटकर नरेंद्र मोदी वर्सेस राहुल गांधी तक सिमट कर रह गया था। उन्होंने राहुल गांधी पर काफी निचले स्तर तक उतर कर हमले किए थे। यही पद्धति उन्होंने दिल्ली चुनाव में आजमाने की कोशिश की।

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल पर जिस तरह निजी हमले किए गए, उनकी खिल्ली उड़ाने की कोशिश की गई, उसकी प्रक्रिया जनता में ठीक उल्टी हुई। तब तक अरविंद केजरीवाल अपनी ईमानदार, लोकपाल बिल और भ्रष्टाचार विरोधी छवि गढऩे में सफल हो चुके थे। नतीजा यह हुआ कि नरेंद्र मोदी द्वारा अरविंद केजरीवाल पर किए गए व्यक्तिगत हमले केजरीवाल के लिए संजीवनी साबित हुए और नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस और भाजपा दोनों को करारी शिकस्त मिली। दिल्ली चुनाव में हारने के बाद भी नरेंद्र मोदी ने कोई सबक हासिल किया हो, ऐसा बिहार चुनाव प्रचार के दौरान दिखाई नहीं दिया।

अब जब बिहार में भाजपा को करारी शिकस्त मिल चुकी है, ऐसे में नरेंद्र मोदी को इस बात पर विचार करना चाहिए कि एक दवा यदि किसी रोग के लिए उपयोग साबित होती है, तो कोई जरूरी नहीं कि वही दवा दूसरे रोगों में भी काम कर जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बस यही गलती हुई कि बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने स्थानीय नेताओं को महत्व देने की अपेक्षा खुद चुनाव की कमान संभाल ली। पोस्टर, बैनर से लेकर चुनावी रैलियों में अपने को ही प्रमुख के रूप में पेश किया। यदि भाजपा किसी स्थानीय नेता को आगे करके चुनाव लड़ती और पीछे से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसको सहयोग देते नजर आते, तो शायद परिणाम कुछ और बेहतर होते। चूंकि पूरे बिहार की चुनावी कमान नरेंद्र मोदी और उनके गुजराती भाई अमित शाह ने संभाल रखी थी, वे ही सारी चुनावी रणनीति तय कर रहे थे, ऐसे में वे किसी और को चुनाव में हुई हार के लिए जिम्मेदार कैसे ठहरा सकते हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव की तरह वे बराबर यह प्रयास करते रहे कि पूरा चुनावी परिदृश्य नरेंद्र मोदी बनाम लालू प्रसाद यादव हो जाए, लेकिन उनके इस प्रयास में हमेशा नीतीश कुमार आड़े आ जाते थे।

नरेंद्र मोदी के व्यक्तिवादी चुनाव पद्धति के अलावा संघ का आरक्षण मुद्दा और बीफ मुद्दा भी भाजपा पर भारी पड़ा। यह एक अजीब संयोग ही है कि जिन दिनों बिहार में चुनाव प्रचार चरम पर थे, उन्हीं दिनों गुजरात में हार्दिक पटेल आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन खड़ा करने में सफल हो चुके थे। ऐसी हालत में गुजरात को बचाने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को आरक्षण के विरोध में बयान जारी करना पड़ा। गुजरात में अगर हालात बिगड़ जाते, तो संघ का एक गढ़ हाथ से निकल जाता, जबकि बिहार में कुछ पाने की बात अभी दूर की कौड़ी थी। यही वजह है कि यह जानते हुए कि आरक्षण के संबंध में संघ का बयान देना बिहार चुनाव परिणाम के नजरिये से भारी पड़ेगा, संघ को बयान जारी करना पड़ा। और जब भाजपा और नरेंद्र मोदी ने सफाई भी दी, तो बिहार की जनता पर उनकी सफाई का कोई असर नहीं हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक और बड़ी गलती बिहार के संदर्भ में की और वह थी नीतीश कुमार के डीएनए को दोगला साबित करने की। नीतीश कुमार इस मुद्दे को ले उड़े और उन्होंने इसे बिहार की अस्मिता से जोडऩे में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने लाखों की संख्या में बिहार की जनता के डीएनए प्रधानमंत्री कार्यालय को इस तरह घेर दिया कि बाद में चुनावी रैली के दौरान अपने ही कहे शब्दों को एक तरह से वापस लेकर बिहारियों को सबसे बुद्धिमान बताने पर मजबूर होना पड़ा। यही क्यों, बिहार की जनता में ध्रुवीकरण के लिए दादरी और फरीदाबाद जैसे मुद्दों को हवा दी गई, बीफ का मुद्दा उछाला गया, ताकि हिंदू मतों का ध्रुवीकरण हो सके। चुनाव तिथि घोषित होने से कुछ दिन पहले जहां झारखंड में दंगे की साजिश रची गई, पूरे देश में गाय के मांस को लेकर एक भय का वातावरण तैयार किया गया, ताकि इसका फायदा बिहार चुनावों में उठाया जा सके, नरेंद्र मोदी और भाजपा, संघ के सारे समीकरण उन्हें उलटे पड़े। बिहार की जनता ने अब जब भाजपा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके प्रमुख सिपहसालार अमित शाह को आईना दिखा दिया है, तो ऐसे में उन्हें विचार करना चाहिए कि उनसे चूक हुई तो आखिर कहां? सारे एक्जिट पोल के अनुमानों को ध्वस्त करते हुए बिहार की जनता ने जो जनादेश दिया है, वह बहुत स्पष्ट है। उसे जातिवादी राजनीति तो स्वीकार है, लेकिन सांप्रदायिकता को वह स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं है। यह एक अजीब किस्म की बिहारी मानसिकता है। बिहार में सवर्ण जातियां दलित उम्मीदवारों को वोट देने से परहेज करती हैं, तो दलित, महादलित और पिछड़े लोग अगड़ी जाति के उम्मीदवारों को वोट देने के बजाय मुसलमानों के पक्ष में चला जाना मंजूर कर लेते हैं। मतलब यह है कि ऐसे मतदाताओं को मुस्लिम उम्मीदवार तो मंजूर हैं, लेकिन भूमिहार, राजपूत या ब्राह्मण स्वीकार्य नहीं हैं। यह बिहार की राजनीति की विशेषता है। इसके बावजूद उसे सांप्रदायिक राजनीति पसंद नहीं है। वह जाति के नाम पर तो लड़ सकती है,लेकिन धर्म के नाम पर उसे कोई लड़वाने की कोशिश करता है, तो वह माकूल जवाब देती है, जैसा कि उसने इस बिहार विधान सभा चुनाव के दौरान दिया है। भाजपा और संघ को बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद समीक्षा करनी चाहिए और उसे अपनी उन नीतियों से बाज आना चाहिए, जो देश को जाति और संप्रदाय के नाम पर बांटते हैं।

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