मौलाना आज़ाद: एक राष्ट्रवादी मुसलमान के जीवन की झलक

3:34 pm or November 13, 2015
Maulana Azad

——–इरफान इंजीनियर——-

केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने हाल में फरमाया कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ‘‘मुसलमान होने के बावजूद राष्ट्रवादी और मानवतावादी थे’’। यह एक निहायत बेहूदा वक्तव्य था, जो मंत्री महोदय के मुसलमानों के प्रति दृष्टिकोण को दर्शाता है। मंत्रीजी का शायद यह मानना है कि सामान्यतः मुसलमान राष्ट्रवादी या मानवतावादी नहीं होते और दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति इसके अपवाद थे। कुछ लोग कहेंगे कि अब्दुल कलाम इसलिए राष्ट्रवादी और मानवतावादी थे क्योंकि वे मुसलमान थे। हमारे संस्कृति मंत्री को यह जानकारी होनी चाहिए कि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद सहित दुनिया में करोड़ों ऐसे मुसलमान थे और हैं जो मानवतावादी और राष्ट्रवादी इसलिए थे और हैं क्योंकि वे मुसलमान हैं। भारत में लाखों मुसलमानों ने देश के स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदारी की और जेल गए। अन्य धर्मों के भारतीयों के साथ, अशफाकउल्लाह जैसे अनेक मुसलमानों ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को गले से लगाया। तथ्य तो यह है कि हिंदू राष्ट्रवादी और मुस्लिम लीग के सदस्य, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के समर्थक थे। आईए, हम मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के विचारों पर एक नज़र डालें, जो अप्रितम राष्ट्रवादी थे।

मौलाना आजा़द की जयंती 11 नवंबर को मनाई जाती है और इस वर्ष (2015) उनकी 127वीं जयंती मनाई गई। हम किसी भी लिहाज़ से क्यों न  देखें, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, 20वीं सदी के भारत के इतिहास के एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व थे। वे इस्लामिक धर्मशास्त्र के गहन अध्येता थे और उन्होंने स्वाधीनता संग्राम से मुसलमानों को जोड़ने के अभियान को अपना जीवन समर्पित कर दिया। वे कभी भारत के विभाजन को स्वीकार नहीं कर सके।

मौलाना आज़ाद का जन्म 1888 में मक्का में हुआ था और सन 1890 में उनके पिता मौलाना मोहम्मद खैरूद्दीन के कलकत्ता वापिस आने तक वे मक्का में ही रहे। मौलाना की मां अरब थीं। मौलाना और उनके भाई ने मिस्र, तुर्की और ईरान की यात्रा की और इन देशों में प्रजातंत्र और स्वाधीनता के लिए चल रहे क्रांतिकारी संघर्ष का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। सन् 1912 में मात्र 24 वर्ष की आयु में आज़ाद ने ‘‘अलहिलाल’’ नाम से एक साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। इसका उद्देश्य था देश के मुसलमानों में राजनीति के प्रति व्याप्त उदासीनता को समाप्त कर उन्हें साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष से जोड़ना। आज़ाद का तर्क यह था कि गैर-मुसलमानों के लिए स्वाधीनता संग्राम से जुड़ना एक नैतिक कर्तव्य हो सकता है परंतु मुसलमानों के लिए यह धार्मिक कर्तव्य है। आज़ाद, कुरान की आयत 17:80 से प्रेरणा ग्रहण करते थे जो कहती है कि ‘‘मेरे पालनहार, मुझको जहां पर तू ले जा, सच्चाई के साथ ले जा और और जहां से भी निकाल, सच्चाई के साथ निकाल और अपनी ओर से एक सत्ता एवं अधिकार को मेरा सहायक बना दे।’’

आज़ाद का यह दावा कि स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदारी करना मुसलमानों का धार्मिक कर्तव्य है, कुरान की तीन आयतों पर आधारित था:

3:110-‘‘अब संसार में तुम सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र हो जिसे मानवता के मार्गदर्शन के लिए लाया गया है। तुम नेकी का आदेश देते हो, बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो। ये किताबवाले (यहां किताबवालों से आशय यहूदी है) ईमान लाते तो इन्हीं के हक में अच्छा था। यद्यपि इनमें कुछ लोग ईमान वाले भी हैं परंतु अधिकतर अवज्ञाकारी हैं।’’

3:104-‘‘तुम में कुछ लोग तो ऐसे अवश्य ही रहने चाहिए जो नेकी की ओर बुलाएं, भलाई का आदेश दें और बुराईयों से रोकते रहें। जो लोग ये काम करेंगे वही सफल होंगे।’’

2:143-‘‘और इसी तरह, हमने तुम मुसलमानों को एक उत्तम समुदाय बनाया ताकि तुम दुनिया के लोगों पर गवाह हो और रसूल तुम पर गवाह हों। पहले जिस ओर तुम रूख करते थे, उसको तो हमने सिर्फ यह देखने के लिए किबला ठहराया था कि कौन रसूल का अनुसरण करता है और कौन उल्टा घूम जाता है। यह एक बड़ा परिवर्तन था, सिवाए उन लोगों के लिए जिन्हें अल्लाह का मार्गदर्शन प्राप्त था। अल्लाह तुम्हारे इस ईमान को हरगिज़ अकारथ न करेगा। यकीन जानो वह लोगों के लिए अत्यंत करूणामय और दयावान है।’’

जिस समय मौलाना आज़ाद ने ‘‘अल-हिलाल’’ का प्रकाशन शुरू किया, उस समय मुसलमान स्वाधीनता संग्राम में हिंदुओं की तुलना में कहीं कम सक्रिय थे। सर सैयद ने मुसलमानों को यह सलाह दी थी कि वे राजनीति से दूर रहें। धार्मिक नेता केवल धार्मिक और शरिया से जुड़े मसलों पर समुदाय का पथप्रदर्शन करते थे। राजनीति में रूचि रखने वाले सामंती श्रेष्ठी वर्ग के मुसलमान औपनिवेशिक सत्ता से नज़दीकियां बढ़ाने में जुटे थे ताकि उन्हें कुछ न कुछ लाभ मिल सके। अल हिलाल ने स्वाधीनता संग्राम का ज़ोरदार समर्थन किया और मुसलमानों का आह्वान किया कि वे उसमें शामिल हों। आज़ाद ने लिखा कि मुसलमानों को सीरत अल-मुस्तकीम (सीधा पथ) पर चलना चाहिए और अपने हिंदू भाईयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्वाधीनता के लिए संघर्ष करना चाहिए। बहुत कम समय में अल हिलाल की प्रसार संख्या 26,000 तक पहुंच गई। यह किसी भी उर्दू अखबार के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी। अल हिलाल के पुराने अंकों की इतनी मांग थी कि उन्हें फिर से छापना पड़ा।

औपनिवेशिक सरकार ने प्रेस एक्ट के तहत, 1914 में, अल हिलाल की सुरक्षानिधि को जब्त कर लिया और 20,000 रूपए की अतिरिक्त सुरक्षा निधि जमा करने का आदेश दिया। गांधीजी द्वारा 1919-1922 में शुरू किए गए असहयोग आंदोलन में मुसलमानों ने जमकर शिरकत की। इस आंदोलन को अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई। आंदोलन की सफलता में अली बंधुओं का भी योगदान था।

हिंदू-मुस्लिम एकता

मुसलमानों को सफलतापूर्वक स्वाधीनता संग्राम से जोड़ने के बाद, आज़ाद ने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए काम करना शुरू किया। हिंदू-मुस्लिम एकता की जिस इमारत को मौलाना आज़ाद खड़ा करना चाहते थे, उसकी बुनियाद थी दोनों समुदायों की सांझा संस्कृति और मुसलमानों के धार्मिक विश्वास। सन 1940 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रामपुर अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण देते हुए उन्होंने कहा, ‘‘इस (भारत भूमि पर मुसलमानों का आगमन) से दो अलग-अलग नस्लों की सांस्कृतिक धाराओं का मिलन हुआ। गंगा और जमुना के मिलन की तरह, कुछ दूर तक को दोनों धाराएं अलग-अलग बनी रहीं परंतु प्रकृति ने अंत में उनका संगम कर दिया। यह एकीकरण, इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी।…1100 सालों के सांझा इतिहास में हमने भारत को अपनी सांझा उपलब्धियों से समृद्ध किया। हमारी भाषाएं, हमारी कविता, हमारा साहित्य, हमारी संस्कृति, हमारी कलाएं, हमारा पहनावा, हमारी प्रथाएं और व्यवहार, हमारा दैनिक जीवन, सब पर हमारे इस संयुक्त प्रयास का प्रभाव स्पष्ट नज़र आता है…हमारी भाषाएं अलग-अलग थीं परंतु हमने एक समान भाषा विकसित कर ली; हमारे व्यवहार करने के तरीके और हमारी परंपराएं अलग-अलग थीं परंतु दोनों ने एक-दूसरे पर क्रिया और प्रतिक्रिया की और इससे उभरा एक नया संश्लेषण…यह सांझा सम्पत्ति हमारी मिलीजुली राष्ट्रीयता की विरासत है और हम उसे छोड़कर, उस युग में वापिस जाना नहीं चाहते जब यह संयुक्त जीवन प्रारंभ नहीं हुआ था…1000 सालों से हम साथ रह रहे हैं और हमने एक संयुक्त राष्ट्रवाद का निर्माण किया है…हम चाहें या ना चाहें, अब हम भारतीय राष्ट्र बन गए हैं, जो एक है और जिसे बांटा नहीं जा सकता। कोई फंतासी या कोई कृत्रिम तर्क हमें एक दूसरे से अलग नहीं कर सकता, न हमें बांट सकता है और न हमारी एकता को तोड़ सकता है। हम इतिहास और तथ्य के इस सच को स्वीकार करें और हमारे भविष्य को गढ़ने के काम में जुटें।’’ इसके विपरीत, बिना किसी तार्किक आधार के, मुस्लिम लीग और हिंदू राष्ट्रवादी यह कह रहे थे कि संस्कृति का आधार धर्म है और हिंदू व मुस्लिम संस्कृतियों का मेल संभव नहीं है।

आज़ाद, ‘‘मुत्तहिदा कौमियत’’ (समग्र राष्ट्रवाद) के पैरोकार थे। वे पैगंबर मोहम्मद द्वारा मदीना में स्थापित पहले राज्य का उदाहरण देते थे, जिसमें मदीना के सब लोगों ने एक परस्पर समझौता किया जिसे ‘‘मदीना का अनुबंध’’ कहा जाता है। इस अनुबंध के अनुसार, यहूदी और ईसाई अपने-अपने धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र थे परंतु यदि मदीना पर बाहरी आक्रमण होता, तो वे मुसलमानों के साथ मिलकर शहर की रक्षा करते। आज़ाद के लिए हिंदू मुस्लिम एकता स्वतंत्रता से भी ज्यादा महत्वपूर्ण थी। उनका यह मानना था कि अगर भारत को विभाजित कर स्वतंत्रता हासिल की गई तो वह अर्थहीन होगी। सन 1923 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विशेष अधिवेशन को संबोधित करते हुए आज़ाद ने कहा, ‘‘आज अगर आसमान से उतरकर एक देवदूत कुतुबमीनार पर खड़ा होकर यह घोषणा करे कि ‘हिंदू मुस्लिम एकता को छोड़ दो और 24 घंटे में स्वराज तुम्हारा होगा’ तो मैं हिंदू-मुस्लिम एकता की जगह स्वराज की बलि देना पसंद करूंगा क्योंकि स्वराज हासिल करने में देरी से केवल भारत का नुकसान होगा परंतु यदि हमारी एकता मिट जाती है, तो यह पूरी दुनिया, पूरी मानवता का नुकसान होगा।’’

जब मुस्लिम लीग के नेता मुसलमानों को यह कहकर डरा रहे थे कि अगर भारत एक रहेगा तो हिंदू बहुसंख्यक उन पर वर्चस्व स्थापित कर लेंगे और उनका दमन करेंगे तब आज़ाद ने अल हिलाल में लिखा, ‘‘इस तथ्य कि हिंदू बहुसंख्यक हैं का कोई महत्व नहीं है। तुम अपना विनाश खुद सुनिश्चित कर रहे हो। हिंदुओं से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। तुम्हें ईश्वर से डरना चाहिए। अगर दूसरा समुदाय तुम्हारे साथ ठीक व्यवहार न करे तब भी तुम्हें उसके साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए। बड़ा वह होता है जो छोटों की गलतियों को माफ करता है।’’

आज़ाद ने अपनी पूरी ताकत और योग्यता से पाकिस्तान का विरोध किया। ‘‘ईश्वर की धरती को पाक और नापाक में नहीं बांटा जा सकता’’, उन्होंने लिखा। आज़ाद को देश के विभाजन से बहुत पीड़ा पहुंची और वे उसे कभी स्वीकार नहीं कर सके। कांग्रेस वर्किंग कमेटी में आज़ाद और गांधी जी को हाशिए पर धकेल दिया गया। आज़ाद ने भारत को एक रखने के लिए अपने पूरे राजनैतिक जीवन को दांव पर लगा दिया परंतु वे हार गए। जब 14 जून 1947 को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी ने देश के विभाजन को स्वीकृति देते हुए प्रस्ताव पास किया तब आज़ाद ने एक अंतिम कोशिश करते हुए यह कहा कि अगर इस राजनैतिक हार को स्वीकार करना अपरिहार्य हो तब भी कांग्रेस को यह सुनिश्चित करने की कोशिश करनी चाहिए कि धरती का बंटवारा भले ही हो गया हो, संस्कृति का बंटवारा न हो। उन्होंने कहा कि पानी की धारा के बीच में एक लकड़ी गाड़ देने से पानी बंटता नहीं है।

स्वाधीनता के बाद, जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनी पहली सरकार में आज़ाद शिक्षा मंत्री बनाए गए। स्वतंत्र भारत में उन्होंने शांति को बढ़ावा देने और देश की शैक्षणिक अधोसंरचना का निर्माण करने के कार्य के प्रति स्वयं को समर्पित कर दिया। आज़ाद की यह इच्छा थी कि सरकार को धार्मिक शिक्षा प्रदान करने का इंतजाम करना चाहिए। उनका कहना था कि धार्मिक शिक्षा देने के कार्य को संबंधित समुदायों के धार्मिक नेतृत्व पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए क्योंकि उनका दृष्टिकोण सांप्रदायिक और संकीर्ण होता है। आज़ाद की इच्छा थी कि सभी धर्मों के सांझा मूल्यों को विद्यार्थियों को पढ़ाया जाना चाहिए ताकि वे एक दूसरे के धर्मों के प्रति पूर्वाग्रह न पालें।

धर्म एवं धर्मनिरपेक्षता

मौलाना आज़ाद के धार्मिक विचार, उनकी पुस्तक ‘‘तर्जुमान-उल-कुरान’’ में संग्रहित हैं। उनकी सोच यह थी कि सभी धर्मों का दीन एक ही है। आज़ाद ने वहदत-ए-दीन, सभी धर्मों की एकता, की बात की। कुरान कहती है कि अल्लाह ने हर स्थान और हर युग में 1,24,000 पैगंबर भेजे परंतु उन सब का संदेश एक ही था। शरिया कानूनों में अंतर इसलिए है कि क्योंकि उनका विकास अलग-अलग बौद्धिक और सामाजिक परिस्थितियों में हुआ। कुरान नीतिपरक जीवन जीने और ईश्वर के समक्ष समर्पण पर ज़ोर देती है। कुरान सहिष्णुता की बात करती है और यह कहती है कि धर्म के नाम पर कोई जबरदस्ती नहीं हो सकती। धार्मिक सांप्रदायवाद, सच्चे दीन की राह से भटकने से उपजता है।

आज़ाद की धर्मनिरपेक्षता एक ओर वहदत-ए-दीन के सिद्धांत पर आधरित थी तो दूसरी ओर उसमें मध्यस्थों के लिए कोई जगह नहीं थी। न उसमें मुल्ला मौलवियों के लिए कोई जगह थी और ना ही धार्मिक संस्थाओं के लिए। उनका कहना था कि हर व्यक्ति को नेकी की जिंदगी बसर करने के लिए संघर्ष करना चाहिए। उसे बुराईयों से दूर रहना चाहिए और अच्छाई को अपनाना चाहिए। इस संघर्ष में उसके अनेक पथप्रदर्शक हो सकते हैं परंतु उसे मध्यस्थों से कोई सीख लेने की ज़रूरत नहीं है। आज़ाद किसी एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ मानने या बताते के खिलाफ थे। कुरान (2:148) में कहा गया है कि ‘‘हर एक के लिए एक रूख है जिसकी ओर वह मुड़़ता है। अतः तुम भलाईयों की ओर बढ़ने में अग्रसर हो। जहां भी तुम होगे अल्लाह तुम्हें एक साथ ले आएगा। वह सब कुछ कर सकता है।’’

आज़ाद के अनुसार, धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह नहीं है कि धर्म को घर के भीतर कुछ रस्मों रिवाज़ निभाने तक सीमित कर दिया जाए। धर्म को अपने अनुयायियों को नेकी की राह पर चलने की प्रेरणा देनी चाहिए और सही राह को ढूंढने के लिए उसे परवरदिगार का पथप्रदर्शन लेना चाहिए। उनका कहना था कि हर मनुष्य को अपने धर्म का बेहतर अनुयायी बनने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। मौलाना आज़ाद इस्लामिक कानून को संहिताबद्ध करना चाहते थे और उसमें सुधार भी करना चाहते थे। परंतु 22 फरवरी 1958 को ये दोनों कार्य पूरे किए बगैर उनकी मृत्यु हो गई। भारतीयों को मौलाना आज़ाद जैसे व्यक्तित्वों को याद करना चाहिए और उनके अधूरे कार्य को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए।

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